शिवराज : रहे न मलाल कुछ, इस शिद्दत से काज कीजिए… 

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मप्र के मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान 5 मार्च को 59 वें वर्ष में प्रवेश करने जा रहे हैं। अपने नेता के जन्‍मदिन को मप्र भाजपा सेवा दिवस के रूप में मनाने जा रही है। जन्‍मदिवस के एक दिन पूर्व मीडिया ने जब मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से पूछा कि वे जन्‍मदिन पर प्रदेश को क्‍या तोहफा देने जा रहे हैं तो चौहान ने कहा कि मेरा तो पूरा जीवन ही सेवा के लिए हुआ है। हालांकि, इस चर्चा के दौरान उन्‍होंने पिछले दिनों दो उपचुनाव में पार्टी की हार पर मलाल जरूर जताया। चौहान ने कहा – ‘‘कोलारस- मुंगावली में चुनाव नहीं जीत पाने की कसक है, क्योंकि हम जीतने के लिए लड़े थे। लेकिन हमने इरादे नहीं हारे हैं।’’ चुनाव मैदान में मिली इस शिकस्‍त से वे मायूस नहीं है। तो क्‍या वे ऐसा ही कुछ अपने मुख्‍यमंत्री कार्यकाल के बारे में भी सोचते हैं? जाहिर तौर पर इसका जवाब कुछ भी हो, मगर जन्‍मदिवस के जश्‍न से फुर्सत पा जब वे एकांत में होंगे तो इस प्रश्‍न का सही उत्‍तर उन्‍हें मिल जाएगा। हम उम्‍मीद कर सकते हैं कि एकांत के इस संवाद से प्राप्‍त ज्ञान ही उनके अगले राजनीतिक कदमों का आधार बनेगा।
यह संवाद इसलिए आवश्‍यक है क्‍योंकि हम जन्‍मदिन, वर्षगांठ जैसे अवसरों पर गुजरे कल तथा अपने कार्यों का आकलन कर उस समीक्षा से मिले अनुभवों से आगत को रचने का जतन करते हैं। उम्र के इस पड़ाव में प्रवेश करते समय एक राजनेता को तो अपने कार्यों का आकलन करना ही चाहिए, खास कर तब जब वह 12 सालों से एक राज्‍य का मुखिया हो। तब भी जब वह स्‍वयं नवाचार करने को उत्‍सुक हो तथा परिश्रम के लिए ऊर्जावान महसूस करता हो। इतनी लंबी शासन अवधि के बाद मुख्‍यमंत्री चौहान में अधिक साहसिक निर्णय लेने का सामर्थ्‍य आ चुका है। उनकी पार्टी को बीते तीन चुनावों में जनता ने भरपूर मत देकर यह निर्णय लेने का साहस दिया है। जैसे, 2003 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 230 में से 173 सीटें मिली थीं। तब पार्टी को 44.83 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए। 2008 में पार्टी को 143 सीट और 36.81 प्रतिशत वोट मिले। 2013 में 44.87 प्रतिशत वोट के साथ 165 सीटें प्राप्‍त हुईं।
छात्र राजनीति से लेकर 12 वर्षों के प्रदेश के मुख्‍यमंत्री रहते हुए उन्‍हें इतना समय तो मिला है कि वे अपने मन से नीतियों को गढ़ सकें तथा उन्‍हें ‘फ्री हेण्‍ड’ से क्रियान्वित कर सकें। लाड़ली लक्ष्‍मी, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, कन्‍यादान, भावांतर, शिक्षा तथा कौशल उन्‍नयन के लिए ऋण, छात्रवृत्ति तथा आर्थिक सहयोग की अनेक योजनाएं उनके खाते में दर्ज हैं। इस बार के बजट में भी किसान और युवाओं पर अधिकांश राशि का प्रावधान है फिर भी यही वर्ग है जो सबसे अधिक संकट में हैं। इसके अलावा भी कई मुद्दे हैं, मसलन, मप्र में किसानों की आत्‍महत्‍याएं रुक नहीं रहीं, बल्कि बढ़ रही हैं। युवाओं के पास रोजगार का संकट है। सरकार नर्मदा नदी के संरक्षण के लिए पूरी ताकत से जुटी है जबकि नर्मदा कई इलाकों में सूख रही है। प्रदेश में गहरा जल संकट दस्‍तक दे चुका है। कर्मचारी नाराज हैं। वे आए दिन प्रदर्शन कर रहे हैं। जिनके लिए घोषणा की गई है वे भी मुतमईन नहीं हैं कि यह घोषणाएं कब पूरी होंगी।
इस माहौल में, शिवराज के सामने अगला बड़ा ‘टास्‍क’ विधानसभा चुनाव है। ये चुनाव नवम्बर 2018 के पहले होना है। यानि 6 या 7 माह का समय बचा है। इतने दिनों में वे बची रह गईं अपनी योजनाओं को पूरा कर सकते हैं ताकि जब वे अगली बार जनता के सामने वोट मांगने जाएं तो किसी बात का मलाल न रहे। शिवराज को भरोसा है कि जनता उन्‍हें फिर जनादेश देगी और वे प्रदेश की सेवा का अपना अनुष्‍ठान अनवरत रखेंगे।

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