सोशल मीडिया: राजनीति का ‘रेड-लाइट’ एरिया, जहां हर चीज बिकती है

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फेसबुक से डाटा चोरी के खुलासे के बाद अब भारत में यह बहस शुरू हो गई है कि देश के किस नेता और कौन से राजनीतिक-दल ने अपने चुनावी हित साधने के लिए सोशल मीडिया का दुरूपयोग किया है? खुलासे के बाद उन लोगों में घबराहट का माहौल है, जो सोशल मीडिया को ’मेन्युपुलेट’ करके समाज की रगो में झूठ, फरेब और वहशीपन का काला खून घोलते रहे हैं। सोशल मीडिया का यह सबसे घिनौना रूप सामने है। ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ और ‘लंदन ऑब्जर्वर’ ने पिछले हफ्ते रिपोर्ट में डाटा चोरी के लिए जिम्मेदार आईटी कंपनी ’कैम्ब्रिज एनालिटिका’ के उन हथकण्डों का खुलासा किया था, जो सोशल मीडिया पर लोगों को प्रभावित करने के अपनाए जाते रहे हैं। ये कंपनियां अपने चुनाव अभियान को आक्रामक और सफल बनाने के लिए किसी भी हद तक नीचे जाकर काम करती हैं। फेसबुक से जुड़े खुलासे ने सोशल मीडिया के गलियारों को उन बिकाऊ रेड-लाइट बाजारों में तब्दील कर दिया है, जहां सत्ता के कौरव-पांडव मिलकर लोकतंत्र का सरेआम चीर हरण करते हैं।
’कैम्ब्रिज एनालिटिका’ के सीईओ निक्स के अनुसार नेताओं को जाल में फंसाने और चुनाव पर असर डालने के लिए खूबसूरत महिलाओं का इस्तेमाल किया जाता है। रिश्वत का लेनदेन तो आम बात है। ’कैम्ब्रिज एनालिटिका’ ने 5 करोड़ से ज्यादा फेसबुक यूजर्स की निजी सूचनाएं हासिल करके उनका गलत इस्तेमाल किया था। यह डाटा फेसबुक ने ’कैम्ब्रिज एनालिटिका’ को उपलब्ध कराया था। इसका इस्तेमाल ट्रम्प के चुनाव प्रचार में किया गया था। सोशल मीडिया के प्लेटफार्म से डाटा चुराना इन कंपनियों के लिए सामान्य बात है। राजनीति में उपयोग के लिए आपकी पसंद और नापसंद के डाटा का विश्लेषण करने के बाद सोशल मीडिया पर कैंपेन चलाया जाता है। कंपनियां नेताओ के भाषण और चुनावी घोषणा पत्रों के मुद्दे भी तय करती हैं।
विरोधी पार्टी के नेताओं को कमजोर करने की गरज से हीनतम हथकण्डे भी अपनाए जाते हैं। विरोधी नेताओं के डर्टी सीक्रेट, सेक्स स्कैण्डल के वीडियो जासूसों से बनवाने का काम भी करती है। इन्हें बाद में सोशल मीडिया पर परोसा जाता है। गुजरात चुनाव में हार्दिक पटेल के सेक्स स्कैण्डल का वीडियो इस मोड्स-ऑपेरेंडी की पुष्टि करते हैं। विरोधी नेताओं को निष्प्रभावी करने के लिए ये हथकण्डे कारगर होते हैं। नेताओं को प्रलोभन दिए जाते है। लड़कियां भेजी जाती हैं। पैसे या प्रॉपर्टी डीलर्स को भेजकर खरीदने की कोशिशें होती हैं। नेताओं को दूसरे देश की लड़कियां सप्लाई करने का काम भी ये कंपनियां करती हैं। गोपनीयती की द्दष्टि से युक्रेन और श्रीलंका की बार-बालाओं का इस्तेमाल खूब होता है।
भाजपा और कांग्रेस एक-दूसरे के रूबरू खड़े हैं। आरोपों के सिलसिले को तथ्यों के तराजू पर तौलना एकदम मुमकिन नहीं है, लेकिन राजनीति की फिजाओं में मौजूद परिस्थितिजन्य साक्ष्य कहते हैं कि जब सवाल उठेंगे तो सबसे पहले लहरें भाजपा के तटों से टकराएंगी। लोकसभा और विधानसभा के चुनावों में सोशल मीडिया के रणनीतिक-उपयोग में भाजपा अन्य दलों से मीलों आगे रही है। सोशल मीडिया की सभी विधाओं में पारंगत प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दुनिया के उन चंद चेहरों में शुमार है, सोशल मीडिया पर जिनका चेहरा सबसे सुर्ख माना जाता है। सोशल मीडिया पर उनकी उपस्थिति को लोगों के सामने सजगता, सक्रियता और तत्परता के रोल-मॉडल के रूप में पेश किया जाता है।
भारत में यह मामला इसलिए गरमाने लगा है कि भारत में डाटा-चोरी के लिए जिम्मेदार कंपनी ’कैम्ब्रिज एनालिटिका’ की सहयोगी कंपनी ’ओवलेने बिजनेस इंटेलीजेंस’ के प्रमुख जनता दल युनाइटेड के नेता केसी त्यागी के बेटे अमरीश त्यागी हैं। दिलचस्प है कि ’कैम्ब्रिज एनालिटिका’ पर आरोप लगने के पहले ’ओवलेने बिजनेस इंटेलीजेंस’ कंपनी की वेबसाइट काम कर रही थी, जिस पर क्लाइंट के तौर पर भाजपा, कांग्रेस और जेडीयू, तीनों का जिक्र था। फिलहाल साइट ब्लाक कर दी गई है।
देश के कानून और आईटी मिनिस्टर रविशंकर प्रसाद ने कांग्रेस पर आरोप लगाया है कि कांग्रेस 2019 के लोकसभा चुनाव में ’कैम्ब्रिज एटालिटिका’ की सेवाएं हासिल करना चाहती थी। वह यूपीए के लिए सोशल मीडिया की स्ट्रेटजी तैयार करने वाली है। प्रसाद ने यह सवाल किया है कि गुजरात और हिमालच के चुनाव में क्या कांग्रेस ने इस कंपनी के सेवाएं नहीं ली थीं?
कांग्रेस ने भाजपा के इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। कांग्रेस के प्रवक्ता सुरजेवाला का कहना है कि मोदी देश के एक मात्र ऐसे प्रधानमंत्री है। जो फेसबुक ऑफिस पहुंच गए थे। भाजपा ’कैम्ब्रिज एनालिटिका’ की क्लाइंट है और 2010 के बिहार चुनाव में उसने इसी कंपनी की सेवाएं ली थी। ’कैम्ब्रिज एनालिटिका’ की वेब साइट के अनुसार कंपनी ने 2010 में बिहार चुनाव का चुनावी विश्लेषण किया था। कंपनी का दावा है कि उसके विश्लेषण के आधार पर बनी रणनीति के अनुसार उनके क्लाइंट को 90 फीसदी जीत मिली थी। उल्लेखनीय है कि 2010 के चुनाव में भाजपा-जेडीयू गठबंधन को जीत मिली थी। जेडीयू को 115 और भाजपा को 91 सीटें हासिल हुई थी।

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