प्रधानमंत्रियों की गरीबी का इंडेक्स, सरोकारों का लेखाजोखा…

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की जिंदगी के चाय-आख्यान के राजनीतिक-लाभांश से अभिभूत कई भाजपा नेताओं को भी अब गरीबी और गुरबत से लथपथ अपना बदनसीब बचपन याद आने लगा है। अपनी गरीबी की गौरव-गाथा के साथ भाजपा नेता यह भी बताते हैं कि वो गरीबी के हर पहलू से भलीभांति वाकिफ हैं। गत सप्ताह जब लंदन के वेस्टमिन्स्टर सेंट्रल हॉल में प्रसून जोशी के भावविव्हल सवालों में मोदी के रेलवे स्टेशन पर चाय बेचने का जिक्र हो रहा था, लगभग उसी समय मथुरा के एक कार्यक्रम में हेमा मालिनी भी बचपन में अपनी गरीबी को लेकर इमोशनल हो रही थीं।
शुक्रवार को गरीबी का एहसास आंखों से लुढ़ककर हेमा मालिनी के गालों पर तैरने लगा, जब उन्हें एकाएक याद आया कि कभी उनकी मां भी बाल्टी से बनी अंगीठी पर कच्चे कोयले जलाकर रोटियां सेंकती थी। जैसे कि मोदी मानते हैं कि चाय बेचने के कारण उन्हें गरीबी का एहसास सभी पूर्व प्रधानमंत्रियों से ज्यादा है, वैसे ही हेमा मालिनी भी गरीबी के एहसास से तरबतर हो रही थीं। मथुरा में हेमा मालिनी प्रधानमंत्री मोदी की उज्जवला योजना के तहत मुफ्त गैस-कनेक्शन बांट कर शायद इसीलिए बहुत अभिभूत थीं। गरीबी के सरोकारों से सराबोर हेमामालिनी ने इस कार्यक्रम के तत्काल बाद पूजा-पाठ करके वृंदावन में अपनी नवनिर्मित आलीशान कोठी में अपने पति धर्मेन्द्र के साथ गृह-प्रवेश का जश्‍न मनाया। इसके पहले स्मृति ईरानी भी बचपन के अपने संघर्षों को लेकर इमोशनल हो चुकी हैं।
मोदी की जिंदगी में चाय बेचने से उद्भूत गरीबी का एहसास ही देश में हर परिवर्तन का मुख्य कारक और हर प्रकार के राजनीतिक विवाद का सबब है। उनके विरोधियों को यह बरदाश्त नहीं है कि एक चाय बेचने वाला पिछड़ा व्यक्ति देश का प्रधानमंत्री बने…। यह शायद मोदी की आत्म-प्रवंचना है कि गरीबी में पले-बढ़े होने के कारण वो देश के सबसे ज्यादा गरीबनवाज प्रधानमंत्री हैं। यह थीसिस आत्ममुग्धता को अभिव्यक्त करती है।
गरीबी और गुरबत के सरोकारों का गरीब होने या गरीबी में जीने से कोई सीधा आनुपातिक संबंध नही है। खुद को प्रस्तुत करने और राजनीतिक रूप से भुनाने के मोदी की अपनी स्टाइल है। उनके पहले देश में चौदह राजनेता देश में प्रधानमंत्री रहे हैं। इनमें कई प्रधानमंत्रियों की जिंदगी की इबारत गरीबी के सिरहाने बैठ कर लिखी गई है। पंडित जवाहरलाल नेहरू के बाद देश की बागडोर संभालने वाले प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के सिर से उनके शिक्षक पिता का साया अल्पायु में उठ गया था। शास्त्रीजी के संस्मरणों में जिक्र है कि पैसे के अभाव में उन्हें स्कूल पहुंचने के लिए तैर कर नदी पार करना पड़ती थी। किसान-आंदोलन के प्रवर्तक चौधरी चरणसिंह ठेठ ग्रामीण परिवेश से आए थे। हापुड़ के छोटे से गांव नूरपुर में चौधरी साहब का जन्म काली मिट्टी की अनगढ़ फूस के छप्पर वाली मड़ैया में हुआ था।
भाजपा के पहले प्रधानमंत्री अटलबिहारी बाजपेई की पैदाइश मामूली से शिक्षक-परिवार में हुई थी। पिता ग्वालियर रियासत में शिक्षक थे। प्रधानमंत्री के रूप में छोटी पारी खेलने वाले चन्द्रशेखर भी बलिया जिले के इब्राहिमपट्टी के भीमपुरा गांव के एक मामूली से कृषक परिवार में जन्मे थे। एचडी देवेगौड़ा भी कर्नाटक के हरदनहल्ली के छोटे से गांव काकुआ से अपनी जिंदगी का सफर शुरू करके देश के शिखर पर पहुंचे थे।
देहाती पगडंडियां नापने वाले इन प्रधानमंत्रियों का राजनीतिक-संघर्ष कमतर आंकना मुनासिब नहीं है। देश के सभी प्रधानमंत्रियों के साथ ऐतिहासिक उपलब्धियां दर्ज हैं। पीवी नरसिंहा राव, इंद्र कुमार गुजराल जैसे नेता भी मध्यम वर्ग का प्रतिनिधित्व करते थे। विश्‍वनाथ प्रताप सिंह भले ही राज-परिवार से जुड़े हों, लेकिन उनके सरोकारों की इबारत मंडल-कमीशन की संवेदनाओं से लिखी है। वैसे ही मनमोहन सिंह की पारिवारिक-पृष्ठभूमि पंजाब के छोटे से गांव से जुड़ी है।
पंडित जवाहरलाल नेहरू ने प्रजातंत्र की जो बुनियाद रखी है, उसी की बदौलत देश आज राजनीतिक नेतृत्व में इतनी विभिन्नताओं को समेटे है। इंदिरा गांधी अथवा राजीव गांधी की राजनीतिक उपलब्धियों और शहादत को इतिहास से मिटाना संभव नहीं है। मोदी को इस खामो-ख्याली से बचना चाहिए कि सिर्फ उन्होंने ही गरीबी से संघर्ष किया है। उनका यहां होना इस बात का परिचायक है कि देश में प्रजातंत्र और उसकी संवैधानिक संस्थाओं की बुनियाद कितनी मजबूत है?
मुद्दा यह नहीं है कि आप किस परिवार की पैदाइश हैं, मुद्दा यह है कि आप कैसे सोचते और आचरण करते हैं? मोदी जब लंदन के वेस्टमिन्स्टर सेंट्रल हॉल में अपना और अपनी सरकार का गुणगान करते हैं, तो सहसा बाकी प्रधानमंत्रियों का चेहरा भी सामने घूम जाता है, जिनके योगदान को भुलाना संभव नहीं है। भारत के ज्यादातर प्रधानमंत्रियों की जीवन शैली सादगी पूर्ण रही है। किसी पर कभी भी दस लाख का कोट पहनने का इल्जाम नहीं लगा है।

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