भाजपा का ‘एटीट्यूड’, हिन्दुत्व का ‘फोल्ड’ तोड़ते दलित-सवाल

 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इर्द-गिर्द दलित राजनीति के कठिन सवालों का फंदा कसने लगा है। सबसे बड़ी दिक्कत दलितों की अस्मिता और आजीविका से जुड़े वो मसले हैं, जो भाजपा के सबसे बड़े रक्षा कवच हिन्दुत्व की राजनीतिक-खोल तोड़ कर बाहर निकल पड़े हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी के सत्तारोहण में दलितों के समर्थन का जबरदस्त योगदान था। जबकि भारत की अर्थ-व्यवस्था की रफ्तार धीमी है, रोजगार के सवाल उफन रहे हैं, सामाजिक न्याय की आवाजें खारिज हो रही हैं, मोदी-सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि हिंदुत्व के फोल्ड में दलितों को कैसे बांधे रखा जाए?
दलित-मसलों पर भाजपा की रणनीति मकड़ी के जालों जैसी उलझनों में फंसी नजर आ रही है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ पनपे उग्र आंदोलन के बाद भाजपा के प्रति दलितों के विश्वास में तेजी से गिरावट आई है। दलित-समाज के युवा प्रदर्शनकारियों के साथ मोदी-सरकार अथवा भाजपा की राज्य-सरकारों के बेरहम सलूक ने दलितों और भाजपा के बीच एक गहरी खाई पैदा कर दी है।
मोदी और उनकी टीम ने आंदोलन की उग्रता के बावजूद मुद्दे को समझने में चूक की है? भाजपा के भीतर दलितों की बेचैनी का लावा फूटने लगा है। भाजपा के दलित-सांसदों के बागी तेवरों में जख्म नजर आ रहे हैं, जो उन्हें मिले हैं। भाजपा के लिए ये बागी तेवर इसलिए गौरतलब होना चाहिए कि सांसद किसी समस्या को लेकर नहीं, बल्कि अपने ही नेताओं के एटीट्यूड और अवहेलना से नाराज हैं। ज्यादा नाराजी उत्तर प्रदेश में सामने आ रही है, जहां दलित-राजनीति सर्वाधिक प्रभावी और निर्णायक है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ दलितों में आक्रोश बढ़ता जा रहा है। उप्र में इस धारणा ने गहरी जड़ें जमा ली हैं कि योगी-सरकार में सिर्फ ठाकुर राजनेताओं और ठाकुर-अधिकारियों का ही बोलबाला है। भाजपा के तीन दलित सांसदों ने योगी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
इटावा के भाजपा सांसद अशोक दोहरे ने चिट्ठी में प्रधानमंत्री मोदी का ध्यानाकर्षण किया है कि भारत-बंद के दरम्यान हिंसा के लिए उप्र में दलित-समाज के युवाओं पर बड़े पैमाने पर मुकदमे दर्ज किए जा रहे हैं। अन्य राज्यों में भी भाजपा-सरकारों का सलूक न्यायसंगत नहीं है। पुलिस अत्याचार पराकाष्ठा पर हैं। दलितों को जातिसूचक शब्दों के साथ जलील किया जा रहा है। रॉबर्ट्सगंज के भाजपा सांसद छोटेलाल खरवार के साथ तो मुख्यमंत्री योगी का व्यवहार कल्पनातीत है। खरवार मोदी को लिखते है कि उनकी कतिपय शिकायतों के संदर्भ में योगी आदित्यनाथ ने उन्हें दो मर्तबा डांट कर भगा दिया। भाजपा की आरक्षण नीति को लेकर कितना भ्रम फैला है कि बहराइच की भगवाधारी भाजपा सांसद सावित्री बाई फूले को अपनी सरकार के खिलाफ संविधान बचाओ और आरक्षण बचाओ महारैली का आयोजन करना पड़ा। सावित्री बाई पहली बार सांसद बनी हैं, और संसदीय-क्षेत्र में घूम-घूम कर अपनी ही सरकार की बखिया उधेड़ रही हैं।
उप्र में दलित-समुदाय की यह नाराजी मोदी-सरकार के लिए खतरे का संकेत है। उप्र की 80 लोकसभा सीटों में सभी 17 आरक्षित सीटों पर भाजपा काबिज है। विधानसभा के लिए आरक्षित 86 में से 76 सीटों पर भाजपा विधायक हैं। समझना मुश्किल है कि दलित-समर्थन की इस गहराई को भाजपा क्यों अनदेखा कर रही है? भाजपा खंडित राजनीतिक सरोकारों और संवेदनाओं के जरिए दलितों के सवालों के समाधान नहीं ढूंढ पाएगी। कांग्रेस मुक्त भारत की तलाश में भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी हर वक्त अपने ‘पोलिटिकल-मसल्स’ का सौष्ठव-प्रदर्शन करते रहते हैं। एससी/एसटी एक्ट के खिलाफ आंदोलन को भी मोदी-सरकार ने चुनाव के चश्मे से देखकर खारिज कर दिया है। भाजपा का संकीर्ण नजरिया हिंसक रास्तों की ओर बढ रहा है। महाराष्ट्र, उप्र, राजस्थान, मप्र, हरियाणा, झारखंड अथवा बिहार में दलित-दशाओं को समझना होगा।
भाजपा ने राममंदिर आंदोलन में दलितों का भरपूर इस्तेमाल किया है। सांप्रदायिकता की घेराबंदी में भी दलित अगुआ रहे लेकिन दलित अब हाशिए पर हैं। गौरक्षा के नाम पर मुसलमानों के साथ दलित भी ज्यानदतियों का शिकार हुए हैं। सामाजिक तिरस्कार का ताजा किस्सा उप्र के हाथरस जिले के बसई बाबस गांव में सुर्ख हो रहा है, जहां आजादी के 70 साल बाद भी ठाकुर दलित दूल्हे की बारात निकालने का विरोध कर रहे हैं। विडम्बना यह है कि सरकार ठाकुरों की इस दबंगई के साथ है। कोर्ट खामोश है और कलेक्टर कानून-व्यवस्था की आड़ में बारात निकालने की इजाजत नहीं दे रहे हैं। सरकार की अनदेखी की ये पराकाष्ठा, छुआछूत के ये जख्म कहते हैं कि आग आसानी से बुझने वाली नहीं है…इस मर्तबा सरकार ने दलितों की पीठ के साथ पेट पर भी लात मारी है।

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