महाभियोग : संसद के बाद न्याय पालिका पर राजनीतिक अंकुश

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राज्यसभा में प्रतिपक्ष द्वारा सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ प्रस्तुत महाभियोग प्रस्ताव खारिज होने के बाद भी न्यायपालिका की फजीहत का दौर थमने वाला नहीं है। उप राष्ट्रपति वेंकैया नायडू द्वारा ’रिजेक्शन’ की फुर्तीली कार्रवाई ने महाभियोग से जुड़ी शंका-कुशंकाओं को नई शक्ल देकर राजनीतिक कुरूपता के स्याह रंगों को गहरा कर दिया है।
नायडू के फैसले के बाद राज्यसभा के सदन तक सिमटी महाभियोग की परछाइयां विकराल होकर सर्वोच्च न्यायालय के कोर्ट रूम में पहुंचने को आतुर हैं। कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने कहा है कि वो राज्यसभा के फैसले के विरूद्घ न्याय दान के लिए सुप्रीम कोर्ट में अपील करेंगे। सिब्बल ने उम्मीद जताई है कि सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं करेंगे। फिर चाहे वो याचिका को सुनवाई के लिए लिस्टेड करने का मामला हो या कुछ और, सुप्रीम कोर्ट इस पर जो भी फैसला देगा, हमें मंजूर होगा। भारत के न्यायिक-इतिहास में यह एक अभूतपूर्व स्थिति होगी जबकि सर्वोच्च न्यायालय के किसी कोर्ट रूम में कोई या कुछ जज मिलकर अपने ही शिखर पुरुष के खिलाफ किसी मसले में आरोपों की सुनवाई करेंगे। राज्यसभा में जो कुछ हुआ, वह अनपेक्षित नहीं था, लेकिन जिस जल्दबाजी में हुआ, वह भी अपेक्षित नहीं था।
सुप्रीम कोर्ट की विश्वसनीयता कई कारणों से कठघरे में है। पिछले दिनों भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के बेटे जय शाह और ’द वायर’ के बीच जारी मुकदमेबाजी में सर्वोच्च न्यायालय ने बिन मांगे यह आश्चर्यजनक समझाइश दी थी कि आप लोग चाहें तो ’आउट ऑफ कोर्ट’ भी समझौता कर सकते हैं। ’द वायर’ ने इसे नकार दिया था। सुप्रीम कोर्ट के ही चार सीनियर जज दीपक मिश्रा की कार्य-प्रणाली पर सवाल उठा चुके हैं। जजों की नियुक्ति के मसलों पर मोदी-सरकार ने ’कॉलेजियम’ की सिफारिशों को हाशिए पर डाल दिया है। दीपक मिश्रा से वरिष्ठता में एक पायदान नीचे जस्टिस चेमलेश्वर ने मोदी सरकार को नेकनीयत साबित करने के लिए कसौटी रखी है। उनका कहना है कि दीपक मिश्रा की निवृत्ति के बाद यदि जस्टिस गोगोई को चीफ जस्टिस नहीं बनाया गया तो उनकी शंकाएं सही साबित होंगी। नरोदा पाटिया को दंगों में माया कोडनानी अथवा मालेगांव विस्फोट के सभी आरोपियों का बरी हो जाना भी शंकाओं के घेरे को कठोर करता है। कोर्ट जांच एजेन्सियों से यह सवाल क्यों नहीं पूछ रही है कि इन दंगों और विस्फोटों के असली गुनाहगार कहां हैं? यह खामोशी दर्शाती है कि कहीं दाल में कुछ काला है।
महाभियोग के रूप में दीपक मिश्रा पर लगे पांच आरोपों पर नायडू का फटाफट फैसला भी सवालों की जद के बाहर नहीं है। राजनीति के आरोप अब सिर्फ कांग्रेस पर नहीं लग सकते। राज्यसभा में जो कुछ हुआ, उसकी स्क्रिप्ट भी कम राजनीतिक नहीं है। इसे भाजपा ने लिखा है। भाजपा और कांग्रेस के बीच टकराव दर्शाता है कि देश में संवैधानिक संस्थाओं के अंग अब गलने लगे हैं। सभी संस्थाओं को पीठासीन अधिकारी का वजूद और विवेक शून्यता के कगार पर खड़ा है। देश में पहली बार सत्तारूढ़ दल ने लोकसभा का सत्र पंद्रह दिन तक महज इसलिए नहीं चलने दिया कि मोदी-सरकार सदन में अविश्वास प्रस्ताव के आरोपों का सामना नहीं करना चाहती थी। केन्द्रीय बजट भी बगैर चर्चा के पारित होने का इतिहास भी इस मर्तबा मोदी-सरकार के कार्यकाल में ही बना है। वेंकैया नायडू का फैसला लोकसभा के बाद राज्यसभा में सरकार के आज्ञापालन का दूसरा नमूना है।
अब इस मुद्दे पर बहस हो सकती है कि सुप्रीम कोर्ट जैसी संवैधानिक संस्था को राजनीति के विवादों में नहीं घसीटना चाहिए। कानून विदों की राय में चीफ जस्टिस के खिलाफ महाभियोग अधकचरा है। राजनीति में नैतिकता के धरातल तलाशने की यह कमजोर कोशिश फिर भी जाया नहीं होगी, क्योंकि महाभियोग के पक्ष-विपक्ष में होने वाले शास्त्रार्थ ने लोगों का ध्यान तो आकर्षित किया है। राजनीतिक समझदारी कहती है कि ज्युडिशियरी की गरिमा को बचाने की खातिर इससे बचना चाहिए था। यहां कांग्रेस और भाजपा राजनीति कर रहे हैं। दोनों दूध के धुले नहीं हैं। लेकिन संवैधानिक संस्थाओं की हिफाजत की ज्यादा जिम्मेदारी सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी की होती है। मोदी-सरकार की प्राथमिकताओं में संवैधानिक संस्थाओं की हिफाजत सबसे नीचे दर्ज है। लोकसभा, राज्यसभा और न्याय-पालिका के ताजा हालात कह रहे हैं कि लोकतंत्र की बुनियाद हिलने लगी है। सरकार में होने के कारण इन्हें बचाना भाजपा की जिम्मेदारी है। सवाल यह है कि वह ऐसा क्यों नहीं कर पा रही है? रचनात्मक राजनीति देश की महाभियोग : संसद के बाद न्याय पालिका पर राजनीतिक अंकुश पहली जरूरत है। समझना मुश्किल है कि राजनीति निकृष्ट होती है या राजनीति करने वाले निकृष्ट होते हैं? निकृष्टता का यह तमगा किसको बांधा जाए?

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