सांप्रदायिकता की खूनी राजनीति और खुर्शीद का इंसानी-जज्बा

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अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के वार्षिकोत्सव में कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद के ’कांग्रेस के दामन पर भी मुसलमानों के खून के धब्बे’ वाले बयान के बाद कांग्रेस का हड़बड़ाना और भाजपा का चिहुंकना उस वैचारिक खोखलेपन को दर्शाता है, जो भारतीय राजनीति की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार है। देश की मानवीय समस्याओं से जुड़े हर विचार को वोटों की दृष्टि से खंगालने की त्रासद राजनीतिक कोशिशों ने समाज की संवेदनाओं को लगभग भोंथरा कर दिया है। क्या एक राजनेता को एक विचारशील मनुष्य के रूप में खुद को अभिव्यक्त करने का अधिकार नहीं है? सलमान खुर्शीद के एक गंभीर संवाद के साथ यह खिलवाड़ इस बात का ज्वलंत उदाहरण है कि राजनीति के गैर-मानवीय पहलुओं और मीडिया के बिकाऊ इरादों का सम्मिश्रण सोच की दिशाओं को कितना दूषित और भ्रमित कर सकता है? खुर्शीद की इस बात के लिए तारीफ की जाना चाहिए कि कांग्रेस की छुईमुई अल्पसंख्यक राजनीति और भाजपा के उकसाने वाले कट्टर प्रतिक्रियाओं के बावजूद वो एक मनुष्य के रूप में दृढ़ता से अपने विचार पर कायम हैं।
खुर्शीद का बयान देश में होने वाली साम्प्रदायिक राजनीति को गंभीर चिंतन की ओर मोड़ने वाला है। दिलचस्प यह है कि कार्यक्रम के आयोजक छात्र को यह सवाल पूछने से रोकना चाहते थे, लेकिन सलमान खुर्शीद ने पहल करते हुए कहा कि उन्हें सवाल करने दीजिए, क्योंकि उन्हें संवेदनशील सवाल का माकूल जवाब देने के अपने बौद्धिक सामर्थ्य पर भरोसा था। एएमयू के आंबेडकर हॉल में एक छात्र ने पूछा था कि- ’मलियाना, हाशिमपुरा, मुजफ्फरनगर समेत ऐसे स्थानों की लंबी फेहरिस्त है, जहां कांग्रेस के शासनकाल में साम्प्रदायिक दंगे हुए थे। उसके बाद बाबरी मस्जिद का ताला खुलना, और फिर उसकी शहादत, जो कांग्रेस शासनकाल में ही हुई थी, कांग्रेस के दामन पर इन तमाम धब्बों को आप किन शब्दों के जरिए धोएंगे…?’ सवाल गंभीर और राजनीतिक दृष्टि से संवेदनशील था। कांग्रेस के ज्यादातर नेता इस सवाल के जवाब में वैसी शुतुरमुर्गी मुद्रा अख्तियार करते, जैसा कि भाजपा नेता गुजरात दंगों से जुड़े सवालों के बैक-ड्रॉप में करते नजर आते हैं।
खुर्शीद का जवाब भी सवाल जितना ही गंभीर था। उन्होंने कहा कि ’यह राजनीतिक सवाल है। हमारे दामन पर खून के धब्बे हैं। कांग्रेस का मैं भी हिस्सा रहा हूं। तो मुझे मानने दीजिए कि हमारे दामन पर खून के धब्बे हैं।’ उन्होने कहा- ’क्या आप यह कहना चाहते हैं कि चूंकि हमारे दामन पर खून के धब्बे हैं, इसलिए हमें आपके ऊपर होने वाले वार को आगे बढ़कर नहीं रोकना चाहिए? ’ खुर्शीद ने प्रश्नकर्ता की ओर इशारा करते हुए कहा कि- ’हम ये धब्बे दिखाएंगे, ताकि तुम समझ सको कि ये धब्बे हम पर लगे हैं, लेकिन ये धब्बे तुम पर नहीं लगें, तुम इन पर वार करोगे,धब्बे तुम पर लगेंगे। हमारे इतिहास से सीखो और समझो, अपना हश्र ऐसा मत करो कि आप 10 साल बाद जब अलीगढ़ यूनीवर्सिटी आओ तो आप जैसा कोई सवाल पूछता भी नहीं मिले।’
सवाल-जवाब का टेक्स्ट हिन्दू-मुस्लिम मनोदशाओं से विभाजित राजनीति के विभिन्न पहलुओं को रेखांकित करता है। भाजपा के केन्द्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने सलमाल खुर्शीद के गंभीर कथन को वोटों की राजनीति के हिसाब से तोड़ते-मरोड़ते हुए प्रतिक्रिया दी कि कांग्रेस के शासनकाल में 5000 दंगों का श्रृंखलाबद्ध इतिहास है। सलमान खुर्शीद दंगों के अपने इतिहास पर भले ही माफी मांगें, लेकिन देश की जनता उन्हें कभी माफ नहीं करेगी। भाजपा के राज्यसभा सदस्य सुब्रमण्यम स्वामी तो ठुमकते हुए मुख्तार नकवी से आगे निकल गए कि कांग्रेस के दामन पर हर धर्म के खून का धब्बा लगा है। भाजपा की इन प्रतिक्रियाओं की पृष्ठभूमि में गुजरात के दंगों का तांडव भी दिखाई पड़ता है। एक इंसान के रूप में जब सलमान खुर्शीद इतिहास से सीखने की बात करते हैं, तो वह राजनीति की सीमाओं से आगे सोचने को उत्प्रेरित करती है। इंसानियत के तकाजों को भाजपा और कांग्रेस की लक्ष्मणरेखाओं में बांधना मुनासिब नही है। इतिहास में कांग्रेस के शासनकाल के दंगे यदि काली स्याही से लिखे जाएंगे, तो उसमें गुजरात के दंगों की कहानियां भी उतनी शिद्दत से दर्ज होंगी। यदि सलमान खुर्शीद एक ’राजनेता’ की कारगुजारियों को एक ’इंसान’ के पश्चाताप के आंसुओं से धोना चाहते हैं, तो इंसान बनने का यह अवसर भाजपा-कांग्रेस के उन सभी नेताओं के पास भी उपलब्ध है, जिन्होंने जी भर कर सांप्रदायिकता की आग में अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकी हैं।

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