सुप्रीम कोर्ट को भी Y ‘बैण्ड-विड्थ’ पर ‘ट्यून’ करने की कोशिशें

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जजों की नियुक्ति के बहाने सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की हस्ती ठुकरा कर मोदी-सरकार ने अपने इरादे साफ कर दिए हैं कि अब वह सर्वोच्च न्यायालय को भी लोकसभा और राज्यसभा की तर्ज पर सरकार की राजनीतिक ‘बैण्ड-विड्थ’ के साथ ट्यून करने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाना चाहती है। अब सुप्रीम कोर्ट को सरकार की मंशाओं के मुताबिक व्यवहार करना होगा…। मोदी-सरकार ने कॉलेजियम की सिफारिशों को खारिज करते हुए उत्तराखंढ के चीफ जस्टिस केएम जोसेफ को सुप्रीम कोर्ट के जज के रूप मे पदोन्नति देने का प्रस्ताव लौटा दिया है। इसके विपरित कानून मंत्रालय ने सीनियर एडवोकेट इंदु मल्होत्रा को शीर्ष अदालत का जज बनाने पर सहमति दे दी है।
कॉलेजियम के आधे प्रस्ताव को मानना और आधे को खारिज करना केन्द्र-सरकार की रणनीतिक पहल है। मोदी-सरकार यह धारणा बनाना चाहती है कि वो कॉलजियम के प्रस्तावों का गुण-दोषों के आधार पर परीक्षण करके फैसले कर रही है। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा कहते है कि सरकार पुनर्विचार के लिए प्रस्ताव लौटा सकती है। प्रथम द्दष्टया लगता है कि सरकार की नीयत में खोट नही है, लेकिन सब कुछ वैसा नही है, जैसा कि दिखाया जा रहा है। वस्तुस्थिति में इंदु मल्होत्रा मोदी-सरकार की पसंद है, जस्टिस जोसेफ के साथ ऐसा नही है। जस्टिस जोसेफ ने पिछले साल उत्तराखंड में लागू राज्यपाल शासन को खारिज करके कांग्रेस के मुख्यमंत्री हरीश रावत को बहाल कर दिया था। वरिष्ठता के अलावा उनका केरल-मूल का होना भी पदोन्नति में बाधक है। हास्यास्पद तर्क यह भी है कि केरल मूल के एक जज पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में पदस्थ हैं। देश के चार उच्च न्यायालयो में केरल मूल के चीफ जस्टिस हैं। मोदी-सरकार की चिंता यह भी है कि सुप्रीम कोर्ट में राजस्थान, गुजरात, कलकत्ता और झारखंड का प्रतिनिधित्व नही हैं । अनुसूचित जाति या जन-जाति का कोई जज नही हैं। कोर्ट-रूम में चुनाव की क्षेत्रीय और जातीय़ जरूरतों के मद्देनजर न्यायमूर्तियों का स्थापना देश के लोकतांत्रिक ढांचे के लिए खतरनाक संकेत हैं।

जस्टिस जोसेफ से नाराजी इस बात में झलकती है कि 2016 में कॉलेजियम ने स्वास्थ्य-कारणों के चलते जोसेफ का तबादला भी उत्तराखंड से आंध्र करने की सिफारिश की थी। जोसेफ आज तक तबादले का इंतजार कर रहे हैं।
कॉलेजिमय से सरकार टकराव पुराना है। 2016 में कॉलेजियम ने 77 जजों के नाम नियुक्तियो के लिए भेजे थे, जिनमें विधि-मंत्रालय ने इनमे से 43 प्रस्ताव खारिज करते हुए 34 सिफारिशो पर अमल किया है। इतने बड़े पैमाने पर कॉलेजियम की सिफारिशों को खारिज करने का काम भी पहली बार हुआ है। केन्द्र सरकार कॉलेजियम के नामों के लेकर असहज होने का उदाहरण सोहराबुद्दीन मामले में सुप्रीम कोर्ट के सहायक जानेमाने कानूनविद गोपाल सुब्रमण्यम की नियुक्ति से जुड़ा है। सुब्रमण्यम के नाम को महज इसलिए खारिज किया गया था कि वो अमित शाह के विरूध्द मुकदमे से जुड़े थे। दिलचस्प यह है कि गोपाल सुब्रमण्यम के स्थान पर यूयू ललित की नियुक्ति को तत्काल हरी झंडी इसलिए मिल गई कि वो अमित शाह की पैरवी कर रहे थे।
कानून मंत्रालय का यह कदम केन्द्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच चार सालो से जारी शीत-युद्द को खुली लड़ाई में तब्दील करने का ऐलान है। सरकार ने देश के न्यायिक-व्यवस्था में राजनीतिक हस्तक्षेप का कूट-युध्द शुरू करने का वक्त चतुराई के साथ चुना है। सुप्रीम कोर्ट की विश्वसनीयता अपने सबसे कमजोर दौर से गुजर रही हैं। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की कार्य-प्रणाली को लेकर न्यायाधीशों के बीच वैचारिक-दरारें गहरी हैं। न्यायाधीशों के बीच दरारो का राजनीतिक-लाभ उठाकर सरकार अपने हित साधना चाहती है। कॉलेजियम के चार वरिष्ठ जजो ने न्याय व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा को जो पत्र लिखा है। सारांश यही है कि लोकतंत्र के प्रथम प्रहरी के रूप में स्थापित लोकतंत्र की न्याय-व्यवस्था को अक्षुण्ण रखना जरूरी है। इससे जुड़े मसलो में चीफ जस्टिस मिश्रा की अनदेखी चिंता का विषय है। राजनीतिक हलके इस अनदेखी में मोदी की मंशाओं को मूर्त होते देख रहे हैं।
आपातकाल की चालीसवीं सालगिरह के मौके पर भाजपा के सूत्रधार नेता लालकृष्ण आडवाणी ने जब यह कहा था कि देश अभी आपात्काल के राजनीतिक-रोगाणुओं से पूरी तरह मुक्त नही हुआ है, तो ज्यादातर लोगों ने आडवाणी के कथन को राजनीतिक रूप से त्याज्य एक बूढ़े नेता का अनर्गल प्रलाप मानकर ऑब्जर्वेशन को खारिज कर दिया था, लेकिन धीरे-धीरे देश की न्याय-व्यवस्था का यह गलना बता रहा है कि उस बूढ़े नेता की नजरें काफी लंबा देख रही थीं। निरंकुशता के काले साये लोकतंत्र के इर्ग-गिर्द लिपटने को आतुर हैं।

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