‘हवा सख्त है, अश्कों के परचम उड़ नहीं सकते, लहू के सुर्ख परचम…’

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कठुआ और उन्नाव के बलात्कार के बैक-ड्रॉप में दिलो-दिमाग को भीतर तक भिगो देने यह स्याह शब्द-चित्र फिल्म ‘डेढ़ इश्किया’ के स्क्रिप्ट राइटर दाराब फारूखी ने ’द वायर’ में लिखा है- एक लड़की जमीन पर पड़ी है। शायद पूरी नंगी या कुछ फटे कपड़ों से ढंकी हुई, उसके जिस्म पर हर जगह चोटें हैं, उसका चेहरा सूजा हुआ है, उसकी फूली आंखे खून जैसी लाल हो चुकी है, भौंहों पर हल्का सा कट भी है, उसके स्तनों पर दांतों के काटने के निशान भी हैं…। उसके कटे हुए होंठों पर खून जम चुका है, उसके बालों का गुच्छा उसके पास ही पड़ा है, जो इतनी जोर से खींचा गया था कि सर की खाल से टूट के अलग हो गया, उसके गुप्तांगों से खून रिस रहा है। शब्द-चित्र के जरिए कठुआ और उन्नाव की दर्दनाक हादसों से रूबरू होना भीतर तक हिला देता है।
इन दोनों घटनाओं के नजदीक जाकर महसूस करें तो आपको लगेगा कि यह शब्द-चित्र महज एक कल्पना नहीं है, शब्दों की तफरीह नहीं है, बल्कि एक दर्दनाक सच्चाई के नजदीक खड़ी हकीकत है, जो हमारे इर्द-गिर्द कभी राजनीति के झरोखों से झांकती है, तो कभी सिस्टम की दरारों के बीच रिसती नजर आती है। हमारी अपनी मिट्टी की तासीर पर हिकारत फेंकती है, जिसने हमारे शरीर को गढ़ा है। कश्मीर के कठुआ में आठ साल की निर्बोध लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार के बाद जघन्य हत्या और यूपी में योगी-राज में उन्नाव के बलात्कार की घटनाओं से उभरे सवाल जहन को छलनी कर देते हैं कि औरत के जिस्म को मजहब से तौलने वाले भारत के निजाम ने कैसी सूरत अख्तियार कर ली है? हमारे कानों के परदे कितने मोटे और बेरहम हो चुके हैं कि बलात्कार की चीत्कारें और चीखें हमारे दिलो-दिमाग तक पहुंचने में महीनों, और कभी-कभी बरसों भी लग जाते हैं। जम्मू के कठुआ की लड़की की लाश जनवरी के पहले सप्ताह में कभी मिली थी। कोई तीन महीने बाद राहुल गांधी के कैंडल मार्च के बाद सरकार को उसकी चीखों का एहसास हुआ है, जबकि उन्नाव के बलात्कार कांड की पीड़ित महिला जून 2017 से दर-दर ठोकरें खा रही है, अब उसके पिता की हत्या के बाद सरकार को लगा कि मामले में कुछ गड़बड़ है।
दो लड़कियों के साथ बलात्कार के बाद लहूलुहान शब्द आमजनों से माफी मांग रहे हैं कि वो अपनी भाव सत्ता खो चुके हैं, क्योंकि सत्ता के गलियारों में पसरे पथरीलेपन में कोई भी नमी पैदा करने में वो असमर्थ है। सत्ता की आसुरी-मूरत के आगे अर्थ खो चुके रूआंसे शब्दों का यह आत्मसमर्पण समाज की संवेदनाओं और सोच को बेध रहा है कि अच्छे दिनों के रोशनदानों से उतरने वाले अंधेरों का इस कारवां का सफर कब और कहां थमेगा? हिन्दू-पुनरुत्थान और राष्ट्रवाद के नए सफर में यह कौन सा मुकाम है, जहां लोग बलात्कार के अधर्म पर धर्म की ध्वजाएं फहराने लगे हैं, अथवा जात-पांत की देहरी पर रेप के अलाव सुलगाने लगे हैं। यह एक त्रासदी है कि दहशतगर्दी का मजहब तय करने के बाद हिन्दुस्तान में अब राष्ट्रवाद की ओट में बलात्कार का मजहब भी तय होने लगा है।
देश की राजनीति के लिए कितना आसान है यह कह देना कि बलात्कार करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा… समाज के पहरेदारों के लिए कितना आसान है बलात्कार के खिलाफ मोमबत्ती लेकर सड़कों पर निकल पड़ना कि सरकार बलात्कार के मामलों पर गंभीर नहीं है…मीडिया के लिए कितना आसान है बलात्कार की कहानियों को हिज्जे-हिज्जे में तोड़कर खबरों की स्क्रिप्ट में राजनीति का तड़का लगाना…राष्ट्रवादियों के लिए कितना आसान है बलात्कारियों के बचाव में तिरंगा लेकर रैली के रूप में निकल पड़ना…कितना आसान है बलात्कार की शिकार मुस्लिम लड़की की लाश पर जय-घोष करना…। राजनीति और समाज का यह रूप डराने वाला है कि सत्ता हर स्तर पर पथरीली हो चली है। हवाओं में जब जहर घुल चुका है, आबोहवा में कांटे उग आए हैं। समाजवाद की नुमांइदगी में मशहूर शायर अली सरदार जाफरी ने कोई पचास साठ साल पहले एक शेर लिखा था- हवा है सख्त, अब अश्कों के परचम उड़ नहीं सकते, लहू के सुर्ख परचम ले के मैदानों में आ जाओ…। वो वक्त आ गया है, जबकि आप अपने जहन और जमीर में उठने वाले सवाल का उत्तर ढूंढने निकल पड़ें…।

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