कर्नाटक का एक मठ ऐसा भी जहां सत्‍ता के लिए राजनेता टेकते हैं माथा

बेंगलूरु (हि.स.) । कर्नाटक राज्‍य में कहने को तो यहां मंदिर और मठों की संख्‍या उंगलियों में गिनने में आने से भी ज्‍यादा है, लेकिन इस विविध पंथ, धर्म एवं दर्शक के प्रदेश में 30 जिलों में 600 से ज्यादा बड़े मठ हैं। जिसमें कि अत्‍यधिक मान्‍य राज्य में लिंगायत समुदाय के 400 मठ, वोकालिगा समुदाय के 150 मठ और कुरबा समुदाय के 80 से ज्यादा मठ हैं। इन सब के बीच एक मठ कर्नाटक का ऐसा भी है जहां लोकसभा, विधानसभा या नगरीक निकाय चुनाव ही क्‍यों न हो, हर राजनेता इस मठ में अपनी सफलता सुनिश्‍चित करने के लिए एक बार माथा टेकने जरूर जाता है।

यह इसकी विशेषता और मान्‍यता ही कही जाएगी कि देश की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक सभी अब तक यहां माथा टेक चुके हैं। वहीं स्‍थानीय स्‍तर पर और वर्तमान राजनीतिक परिदृश्‍य में सोनिया गांधी, रामकृष्ण हेगड़े, राहुल गांधी, अमित शाह, सिद्धरामैया, बीएस येड्ड‍ियूरप्‍पा, एचडी देवेगौड़ा से लेकर कुमारस्वामी तथा ऐसे ही सभी बड़े-छोटे राजनेता यहां नितरोज मठ में स्‍वामीजी का आशीर्वाद लेने आते हैं। येड्यूरप्‍पा जब मुख्यमंत्री थे, तब वे हर हफ्ते मठ का दौरा करते थे और राज्‍य में समाज कार्यों को दिशा देने के लिए महंत से निर्देश लेते थे । यह मठ है कर्नाटक का ‘श्री सिद्धगंगा मठ’, जितना प्राचीन यह मठ है, उसकी परंपराएं भी आज तक उतनी ही अक्षुण हैं। बेंगलुरु के समीप तुमकुर ज़िले में स्थित है ‘श्री सिद्धगंगा मठ’

गोसाल सिद्धेश्वर स्वामी ने की थी स्‍थापना
इस मठ की स्थापना 15वीं ईसवी में विख्यात समाज सुधारक बसवेश्वर के समय के एक प्रसिद्ध आध्यात्मिक विद्यापीठ ‘शून्य सिंहासन’ के गोसाल सिद्धेश्वर स्वामीजी द्वारा की गई थी जोकि श्रीजगज्योति बसवेश्वर के सिद्धान्तों और शिक्षाओं जिसमें कि सिद्धान्‍तत: माना जाता है कि ‘कर्म ही पूजा है’ के आधार पर यहां से जुड़े लोग अपने व्‍यहारिक जीवन को जीते हैं। इस मठ की एक विशेषता यह भी है कि यह जितना प्राचीन है उतना ही अधुनातन है, जैसे कि एक ओर जहां शिवरात्रि का पावन पर्व यहाँ बहुत उत्साह और हर्ष के साथ मनाया जाता है तो दूसरी ओर कई दशकों से, यहाँ आयोजित होने वाली कृषि और औद्योगिक प्रदर्शनियों ने बहुत-से किसानों, छात्रों, उद्योगपतियों और लोगों को नवीनतम प्रौद्योगिकी के विषय में जानने और उसे सीखने में सहायता की है।

डॉ. शिवकुमार स्वामी हैं वर्तमान महन्‍त
इस मठ के प्रमुख, श्री शिवकुमार स्वामीजी आज उस वैदिक मंत्र को भी यर्थाथ रूप देते यथावत दिखते हैं जिसमें कि 100 वर्ष आनंदमयी आयु की कामना की गई है।वास्‍तव में जब अथर्ववेद का ऋषि कहता है कि पश्येम शरदः शतम्, जीवेम शरदः शतम्, बुध्येम शरदः शतम्, रोहेम शरदः शतम्, पूषेम शरदः शतम्, भवेम शरदः शतम्, भूयेम शरदः शतम्, भूयसीः शरदः शतात्, (अथर्ववेद, काण्ड 19,सूक्त 67) तक वह हर मनुष्‍य के लिए कम से कम शतायु जीवन की कामना करता है। अर्थात् हम सौ वर्षों तक आंखों की स्पष्ट ज्योति से देखें, सौ वर्षों तक हम जीवित रहें, वर्षों तक हमारी बुद्धि सक्षम बनी रहे, सौ वर्षों तक हमारी उन्नति होती रहे, सौ वर्षों तक हमें पोषण मिलता रहे, हम सौ वर्षों स्‍वस्‍थ तक बने रहें सौ वर्षों तक हम पवित्र बने रहें, कुत्सित भावनाओं से मुक्त रहें और सौ वर्षों से भी आगे ये सब कल्याणमय बातें होती रहें।

ज्ञान के प्रसार के साथ सेवा ही मठ का मुख्‍य कार्य यहां इस मठ के स्‍वामी आज अपनी 111 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुके हैं। 1 अप्रैल 1907 के पैदा हुए शिवकुमार स्वामी 1930 में लिंगायत साधु बने थे । उसके बाद जब वे इस मठ के प्रमुख हुए तो उन्‍होंने अपनी चली आ रही परम्‍परा का अनुसरण करते हुए अधुनातन का भी समावेशी विकास किया । उनके संरक्षण में मठ के सभी स्वामियों ने प्राचीन वैदिक शिक्षा के साथ आधुनिक शिक्षा का ज्ञान प्राप्‍त किया है। यही कारण है कि अनेक भारतीय भाषाओं के साथ विदेशी भाषाओं का ज्ञान यहां के स्‍वामियों को है। इसीलिए ही यहां से जुड़े सभी सभी स्‍वामी बड़े वि‍द्वान माने जाते हैं।

इतना ही नहीं तो डॉ. शिवकुमार स्वामी ने जो 52 साल पूर्व गरीब बच्चों के लिए मठ में आवासीय विद्यालय आरंभ किया था, वह वर्तमान में बढ़ते-बढ़ते 1100 से अधिक बच्‍चों को शिक्षा देने का मुख्‍य केंद्र बन गया है। इस एक
गुरुकुल से समय के साथ समुचे कर्नाटक और इस राज्‍य के बाहर देशभर में कई स्‍थानों पर नए शिक्षा केंद्र भी आज खड़े हो गए हैं, यदि उनकी संख्‍या भी इससे जोड़कर देखें तो वह कई हजार में पहुंच जाती है।

स्‍वामीजी की प्रेरणा से मठ से जुड़े भक्‍त अपना योगदान चंदे के रूप में देने के साथ ही विविध सामग्री के जरिए और आवश्‍यक तकनीकि उपकरण, सेवा कार्यों में स्‍वयं को समर्पित कर दे रहे हैं। यही कारण है कि यह मठ चहुंओर वैदिक ऋचाओं और आधुनिक शिक्षा के प्रवाह के साथ सफल मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेज भी चला रहा है।

मठ ने रखा है स्‍वयं को राजनीति से दूर कहने को तो राज्‍य में लिंगायत समुदाय के 400 से अधिक छोटे-बड़े मठ हैं, लेकिन अन्य लिंगायत साधुओं की तुलना में ‘श्री सिद्धगंगा मठ’ और इसके प्रमुख डॉ. शिवकुमार स्वामीजी ने अपने को राजनीति से दूर रखा है।
स्वामीजी की रुचि किसी पार्टी में या किसी प्रकार की राजनीति में नहीं है, फिर भी मठ के बाहर संदेश यही है कि जिसे स्‍वामी जी का आशीर्वाद ह्दय से मिल जाए कर्नाटक में सरकार उसी की बनती है।

समुचे कर्नाटक और राज्‍य के बाहर भी इनको मानने वालों का प्रभाव इतना अधिक है कि यदि स्‍वामीजी का आशीर्वाद मिलने का संदेश उनके भक्‍तों तक पहुंच जाए तो उस नेता और उसकी राजनीतिक पार्टी का कर्नाटक में जीतना पक्‍का मानलिया जाता है। अभी हाल में जब लिंगायतों को अल्पसंख्यक का दर्जा देने की बात आरंभ हुई तो स्‍वामीजी ने अपने को इससे अलग रखा। हालांकि उनके कुछ शिष्य साधुओं ने सिद्धरामैया के इस कदम की तारीफ की है लेकिन 600 साल पुराने इस मठ के महंत अपने शिष्‍यों की इस बात से कोई इत्तिफाक नहीं रखते हैं। शायद यही कारण है कि यह मठ और उसके स्‍वामी डॉ. शिवकुमार कर्नाटक में सबसे ज्यादा पूजे जाने वाले महंत भी हैं और कईयों के लिए जीते-जागते भागवान भी हैं।

हिन्‍दुस्‍थान समाचार/ डॉ. मयंक

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