कर्नाटक चुनाव में सिद्धरामय्या ने खेला भाषायी कार्ड

बेंगलुरु (हि.स.)।  अंग्रेजी भारतीय भाषा नहीं लेकिन इसके पीछे भारतीय राज्‍यों की जो दीवानगी है, वह सभी भारतीय भाषाओं पर तो भारी है ही कई भारतीय भाषाओं के लोगों को भी आपसी शत्रू बना रही है। भारत के स्‍वतंत्रता आंदोन में फिर भले ही देश की एक भाषा के रूप में समूचे देश के जननायकों ने हिन्‍दी को एक साथ सबकी भाषा के रूप में स्‍वीकार्य किया हो लेकिन इस वक्‍त देश के कई राज्‍य अंग्रेजी को अपने सिर पर बैठाए हुए हैं, दूसरी ओर संस्‍कृति से अन्‍य भारतीय भाषाओं की तरह ही उपजी हिन्‍दी से नफरत करते हैं। कर्नाटक में विधानसभा चुनाव के मद्देनजर चुनावी माहौल है, लेकिन यहां के मुख्‍यमंत्री सिद्धरामय्या ने भाजपा के राष्‍ट्रीय महासचिव पी. मुरलीधर राव के एक ट्वीट का जवाब कुछ इस तरह दिया कि एक बार फिर यहां गैर हिन्‍दीभाषी राज्‍य में हिन्‍दी बनाम अंग्रेजी और कन्‍नड़ का मुद्दा गरम हो गया है।  राज्‍य में रह रहे तमाम हिन्‍दी भाषी सिद्धरामय्या के इस ट्वीट से नाराज हैं तो वहीं वे लोग जिन्‍हें राजनीतिक तौर पर अब तक यह बताया गया है कि हिन्‍दी को हम पर जबरदस्‍ती थोपने का प्रयास किया जा रहा है उनके बीच यह एक छोटा सा किया गया ट्वीट आन का मुद्दा बन गया है।असल में बीजेपी के जनरल सेक्रेटरी और कर्नाटक इंचार्ज मुलीधरन राव ने ट्वीट कर मुख्यमंत्री सिद्धारमैया से सवाल पूछते हुए उनपर निशाना साधा जोकि हिन्‍दी में था। इसके उत्‍तर में कन्‍नड़ में सिद्धरामय्या ने यह कि ಕನ್ನಡ ಅಥವಾ ಇಂಗ್ಲಿಷ್ ನಲ್ಲಿ ಟ್ವೀಟ್ ಮಾಡಿ ಸರ್.  ಹಿಂದಿ ಅರ್ಥವಾಗುವುದಿಲ್ಲ लिखा, जिसका आशय है, ‘कृप्या कन्नड़ या अंग्रेजी भाषा में ट्वीट करें क्योंकि मैं हिंदी भाषा नहीं समझता’।  इस ट्वीट पर ही कर्नाटक में रह रहे हिन्‍दी भाषियों को आश्‍चर्य है, वह कहते हैं कि हिन्‍दी आज दुनिया में सबसे अधि‍क बोलनेवाली भाषा है यहां तक कि उसने चीन की भाषा मंदारन को भी पीछे छोड़ दिया है। यह एक महज संयोग है कि जिस हिन्‍दी के नहीं जानने की बात कर्नाटक के मुख्‍यमंत्री सिद्धरामय्या ने कही, उसी राज्‍य में मेंगलूर के डॉ. जयंती प्रसाद नोटियाल ने यह शोध कर बताया है कि चीन की कुल जनसंख्या 1360 मिलियन के भाग में से 70 फीसदी लोग मंदारिन बोलते हैं। यानि कि 950 मिलियन लोगों की यह भाषा है, जिसमें 150 मिलियन दूसरे देशों में भी हैं। इन सभी को जोड़कर अब तक चीनी जानने वालों की संख्या में 50 मिलियन तक की वृद्धि हुई है, लेकिन इसके विपरीत 2012 में हिंदी जानने वालों की संख्या 1200 मिलियन थी। 2015 आते-आते यह बढ़कर 1300 मिलियन हो गई और अब 2018 में इसे जाननेवाले मंदारिन से 200 मिलियन से भी अधिक हैं। कहने का अर्थ है कि हिन्‍दी आज दुनिया की जानने और बोलनेवालों की दृष्टि से प्रथम भाषा बन गई है।  सिद्धरामय्या के सार्वजनिक मंच पर इस तरह की बात कहने के बाद कर्नाटक के हिन्‍दी प्रेमियों ने हिस को अपनी प्रतिक्रिया से अवगत कराया है। प्रो. बीडी  हेगड़े पूर्व आचार्य मैसूर विश्‍वविद्यालय ने कहा‍कि कर्नाटक में बहुतायत में लोग हिन्‍दी समझते और टूटीफूटी बोल भी लेते हैं। वास्‍तव में यह भारतीयों की त्रासदी है कि हम 25 से अधिक भाषाओं को बोलते हैं फिर भी हम अंग्रेजी को सिर पर लेकर चल रहे हैं। कर्नाटक में जो यह हिन्‍दी न जानने या इसका विरोध दिखाई देता है वह पड़ौसी राज्‍य तमिलनाडु के प्रभाव के कारण से है। वह कहते हैं कि यूरोप में ऐसी समस्‍या नहीं जबकि वहां फ्रांस में फ्रेंच, इंग्‍लेण्‍ड में अंग्रेजी, जर्मन में जर्मनी और स्‍वीजरलैण्‍ड में स्‍वीस जैसी तमाम इन देशों की अधिकारिक भाषाएं हैं लेकिन भारत में ऐसा अब तक नहीं हो सका है जो गलत है। भारत की भी अपनी एक राष्‍ट्रभाषा हो सकती है तो वह आज के समय में अधिकारित तौर पर हिन्‍दी है। महात्‍मा गांधी जैसे कई अहिन्‍दी विद्वान एवं स्‍वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने कई वर्ष पहले ही इस बात को स्‍वीकार कर लिया था। यदि प्रदेश में सिद्धरामय्याजी को हिन्‍दी नहीं समझ आती ऐसा वो कहते हैं तो घोर आश्‍चर्य है।  कर्नाटक के हुबली से डॉ. मनोरंजनी एस. कोटेमने ने कहा कि कर्नाटक में अधिकतर लोग हिन्‍दी जानते हैं, यहां से रोज पी-एचडी हो रही हैं। सिद्धरामय्या सिर्फ राजनीति से प्रेरित होकर हिन्‍दी का विरोध कर रहे हैं, वास्‍तव में हिन्‍दी तो उन्‍हें भी आती है। बीजेपी जब सत्‍ता में आई थी तो उसने हिन्‍दी और संस्‍कृत को बढ़ावा दिया था, इस बात को ये सरकार अच्‍छे जानती है, पर कन्‍नड़ अस्‍मिता आंदोलन खड़ा करके कांग्रेस यहां सिर्फ वोट बैंक की राजनीति कर रही है और कुछ नहीं। यहां शिवमोग्‍गा से संगमेश नानन्‍नवर जो एक शिक्षक भी हैं का कहना है, सभी को कामचलाऊ हिन्‍दी तो आती है, कांग्रेस नेता मल्‍ल‍िकार्जुन संसद में हिन्‍दी बोलते हैं। यहां स्‍कूली शिक्षा में भाषा का त्री-स्‍तरीय पाठ्यक्रम लागू है, आंग्रेजी मीडिम में अंग्रेजी प्रथम और कन्‍नड़ दूसरी हिन्‍दी तीसरी भाषा है और कन्‍नड़ विद्यालयों में पहले स्‍थान पर कन्‍नड़ फिर हिन्‍दी-अंग्रेजी है।   डॉ. उमा हेगड़े ने हिस से कहा कि यहां आर्य-द्रविड़ भाषा के रूप में भ्रम फैलाकर लोगों को बांटने का काम पिछले कुछ समय से शुरू हुआ है। वोट बैंक की राजनीति है, सिद्धरामय्या इस प्रदेश के सम्‍मानीय मुख्‍यमंत्री है, वे हिन्‍दी नहीं जानते, ऐसा मानने का कोई कारण नहीं, फिर भी वह इस तरह का ट्वीट कर रहे हैं तो यह उनका व्‍यक्‍तिगत प्रश्‍न अधिक है। मैसूर से डॉ. नामदेव एस. गौड़ा इस बात से इत्तेफाक रखते हैं कि कर्नाटक में 70-80% लोगों को हिन्‍दी आती है लेकिन हिन्‍दी के प्रति माहौल खुले तौर पर विरोध का है। हिन्‍दी अन्‍य भारतीय भाषाओं में अग्रणी है इसलिए विरोध नहीं होना चाहिए। एक लीडर को सभी भाषाएं साथ लेकर चलना चाहिए, जिसमें कि फिर हिन्‍दी तो आज दुनिया में सबसे ज्‍यादा लोगों की बोलनेवाली भाषा बन चुकी है।  उधर, प्रो.टीआर भट्ट जिनकी अपनी विद्यता में समूचे कर्नाटक में प्रतिष्‍ठा है ने धारवाड़ से कहा है कि तमिलों के प्रभाव चलते यहां भी भाषा का कन्‍नड़ का अभियान चलाया जा रहा है और कन्‍नड़ में से छांट-छांट कर संस्‍कृत के शब्‍द हटाए जा रहे हैं। कांग्रेस और जनता दल एस यहां एक जैसी भावना लेकर चल रही है, जबकि इस विषय में भाजपा से ही उम्‍मीद की जा सकती है। उसमें राष्‍ट्रवाद का मूल विचार अधिक दिखाई देने से स्‍वत: ही वह हिन्‍दी प्रेमी हो जाती है। 80 वर्षीय विद्वान प्रो. भट्ट ने कहा कि एक समय था इसी कर्नाटक में जब मुख्‍यमंत्री सदानन्‍द गौड़ा, रामकृष्‍ण हेगड़े, वीरेंद्र पाटिल अच्‍छी हिन्‍दी बोलते थे अब तो यहां स्‍थ‍िति कम से कम हिन्‍दी के लिए अच्‍छी नहीं है। कर्नाटक में संस्‍कृत और हिन्‍दी को सरकारी प्रोत्‍साहन नहीं तो नौकरियां नहीं है, इस कारण से महाविद्यालय और विश्‍वविद्यालयों के इसके पूर्व खुले विभाग भी एक के बाद एक बंद किए जा रहे हैं। मुख्‍यमंत्री सिद्धरामय्या का अपना काम करने का स्‍लाइल है। वास्‍तव में केंद्र के कार्यालयों के कारण से ही कर्नाटक में हिन्‍दी जीवित है। उन्‍होंने कहा है, यहां वर्तमान सरकार बहुत भ्रष्‍ट है, इसमें बदलाव की जरूरत है, हो सकता है कि नई सरकार आए तो इस बनते भाषायी वैमनस्‍यता के माहौल को कुछ ठीक करे।  देखाजाए तो कर्नाटक में कुल मिलाकर मुख्‍यमंत्री के एक ट्वीट ने कर्नाटक के ही हिन्‍दी प्रेमी निवासियों को आक्रोशित कर दिया है। उनकी सरकार में ही राज्‍य में मैट्रो से हिन्‍दी नाम हटाए गए हैं और कहीं भी हिन्‍दी साइन बोर्ड नजर नहीं आता है। ऐसे में यह सच है कि उत्‍तरभारत या भारत के कई हिस्‍सों से आनेवाले लोगों को जिन्‍हें अंग्रेजी भी नहीं आती रोजमर्रा के जीवन में काफी मशक्‍कत करनी पड़ती है। दूसरी ओर कांग्रेस नेता सिद्धरामय्या को लगता है कि वे इस तरह से अपनी बात करेंगे तो कर्नाटक प्रदेश की कन्‍नड़भाषी बहुतायत जनता भाषा के नाम पर उनके समर्थन में आएगी और इस तरह से एक बड़ा जनसमर्थन उन्‍हें फिर एक बार सत्‍ता में पहुंचाने का कारण बनेगा।  
हिन्‍दुस्‍थान समाचार/ डॉ. मयंक चतुर्वेदी

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY