कर्नाटक में कटुता की राजनीति और लोकतंत्र का चीर-हरण…?

 

एग्जिट पोल में त्रिशुंक विधानसभा की संभावनाओं के बीच कर्नाटक की राजनीतिक पैंतरेबाजी में ऩए दांवपेंच का खेल शुरू हो गया है। भाजपा किसी भी कीमत पर कर्नाटक की सत्ता चाहती है। पर्यवेक्षकों का मत है कि स्पष्ट बहुमत मिलने पर ही कांग्रेस सरकार बनाने की कल्पना कर सकती है। त्रिशंकु विधानसभा में कांग्रेस के लिए सरकार बनाने के अवसरों पर मोदी-सरकार ने अभी से ही घात लगाना शुरू कर दिया है। इसीलिए बहस शुरू हो गई है कि बड़ी पार्टी होने पर भी क्या कांग्रेस सरकार बना पाएगी? एग्जिट-पोल में किसी ने भाजपा को तो किसी ने कांग्रेस को सबसे ज्यादा सीटें दी हैं। दिक्कत भाजपा के बड़ी पार्टी बनने पर नहीं है। सवाल यह है कि यदि कांग्रेस को भाजपा से ज्यादा सीटें मिलीं तो मोदी-सरकार का रुख क्या होगा? लोगों के जहन में गोवा, मणिपुर और मेघालय की तस्वीरें उभर रही हैं, जहां मोदी-सरकार ने कांग्रेस के सबसे ज्यादा विधायक होने के बावजूद राजनीतिक-जोड़तोड़ करके अपनी सरकार बना ली थी। अब क्या कर्नाटक में भी वही इतिहास दोहराने की तैयारी चल रही है?
मेघालय में मार्च 2018 में सम्पन्न चुनाव में कांग्रेस ने 21 सीटें जीती थीं। फिर भी राज्यपाल ने 19 सीटें जीतने वाली नेशनल पीपुल्स पार्टी को सरकार बनाने का न्यौता भेज दिया था। मेघालय में बहुमत के लिए 31 सीटों की दरकार थी। कांग्रेस गठबंधन के पास 28 विधायकों का समर्थन था। मेघालय में भाजपा ने मात्र दो सीटें जीती थीं। संविधान के तकाजों को ताक में रखते हुए राज्यपाल ने केन्द्र सरकार के इशारे पर सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस की अनदेखी करके नेशनल पीपुल्स पार्टी को मौका दिया।
मेघालय के पहले मार्च 2017 में भाजपा गोवा में जोड़तोड़ का यह फार्मूला आजमा चुकी थी। गोवा में कांग्रेस के सबसे ज्यादा 17 विधायक जीते थे। भाजपा के 13 विधायक चुने गए थे। बड़ी पार्टी होने के नाते सरकार बनाने का न्यौता कांग्रेस को मिलना चाहिए था, लेकिन राज्यपाल ने परम्पराओं को दरकिनार करके भाजपा को बुला लिया। इस बीच तत्कालीन रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर का चेहरा सामने आने के कारण कांग्रेस के समर्थन में खड़ी पार्टियां पाला बदल कर भाजपा के साथ हो गईं।
यही खेल भाजपा ने मणिपुर में खेला था। साठ विधायकों वाली मणिपुर विधानसभा में भी कांग्रेस 28 सीटों पर जीत हासिल करके सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी। भाजपा ने 21 सीटों पर जीत हासिल की थी। भाजपा की जोड़तोड़ के पहले नगा पीपुल्स फ्रंट के चार सदस्यों ने कांग्रेस को समर्थन देने की घोषणा की थी, लेकिन बाद में वो पलट गए। यह बदलाव क्यों हुआ, समझना मुश्किल नहीं है?
मणिपुर और गोवा में भाजपा के राजनीतिक-कृत्यों का बचाव करते हुए तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री वेंकैय्या नायडू ने कहा था कि कांग्रेस ने विगत में कई बार अधिकारों और अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग करके गैर-कांग्रेसी सरकारों को गिराया है। अब यदि भाजपा ने सबसे बड़े दल की सरकार नहीं बनने दी, तो कांग्रेस को आलोचना का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। वेंकैय्या नायडू के बयान को मोदी-सरकार के चार साल के कार्यकाल में घटित राज्य-सरकारों के गठन के अलोकतांत्रिक अध्यायों के साथ पढ़ें तो यह साफ हो जाता है कि भाजपा को कांग्रेस की कार्बन-कॉपी बनने में कोई ऐतराज नहीं है।
कांग्रेस मुक्त या प्रति विचार मुक्त भारत की तलाश में जुटी भाजपा के लिए लोकतंत्र में जायज-नाजायज की कोई सीमा-रेखा नहीं है। उसे लोकतांत्रिक मर्यादाओं की चिंता भी नहीं है। अभी देश के उनतीस राज्यों में से 21 में भाजपा की सरकारें हैं। एक-दो राज्यों में गैर-भाजपाई सरकार होने से मोदी की हैसियत में कोई फर्क नहीं पड़ेगा। हर हाल में चुनाव जीतने की हवस लोकतंत्र के लिए आत्मघाती है। जीतने की हवस और हौसले में फर्क होता है। राजनीति में कर्कशता का गंदा प्रवाह लोकतंत्र को मैला कर रहा है। चार सालों में भाजपा ने इन धारणाओं को बिल्कुल खारिज कर दिया है कि वह देश में कांग्रेस की राजनीति से अलग नया राजनीतिक रोडमैप गढ़ने के लिए सत्ता में आई थी। लोगों का समर्थन भी इसीलिए मिला था कि वह एक अलग राजनीतिक संस्कृति की प्रवक्ता है। एग्जिट-पोल में त्रिशंकु-विधानसभा की संभावनों ने राजनीति की फिजाओं में एक अजीबोगरीब बेचैन खामोशी घोल दी है। मणिपुर, गोवा और मेघालय की तरह लोग कर्नाटक में लोकतंत्र का चीर-हरण देखने को तैयार नहीं है। विडम्बना यह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह इस सिध्दांत के पक्षधर हैं कि युध्द और प्यार में हर चीज जायज है।

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY