कर्नाटक में भाजपा सरकार, ‘राजनीतिक सदाचार’ की कहानी

पोलिटिकल थ्योरीज अथवा अलग-अलग थीसिस के सारे पन्ने टटोलने, खंगालने और समझने की कोशिशें करने के बावजूद मेरे जहन में कौंधते दो सवालों के बीच मेरे लिए यह तय करना मुश्किल हो रहा है कि इनमें कौन सा सवाल बड़ा और महत्वपूर्ण है और कौन सा सवाल दूसरे नम्बर पर रखा जा सकता है? पहला सवाल यह है कि देश में जब उत्तर से लेकर दक्षिण तक और पूरब से लेकर पश्‍चिम तक भाजपा का परचम फहरा रहा है, भारत के 21 बड़े और समर्थ राज्यों पर शासन करने वाले भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए जोड़-तोड़ और हर प्रकार की लोकतांत्रिक बेईमानियां करके कर्नाटक जैसे एक राज्य में सरकार बनाना कितना जरूरी है? दूसरा सवाल भी इसी मुद्दे से जुड़ा है कि सत्ता के अखाड़े में राजनीतिक दबंगई के इस शिखर-सम्मेलन की सदारत करके उन्हें अथवा उनकी भारतीय जनता पार्टी को कितनी और कौन सी राजनीतिक बढ़त हासिल होने वाली है? दूसरे सवाल का बेचैन करने वाला गौरतलब पूरक प्रश्‍न यह है कि 1990 के बाद अपने बलबूते पर देश के सर्वोच्च शिखर पर पहुंचने वाले वो पहले नेता हैं, जिनके साथ ये उम्मीदें जुड़ी हैं कि वो देश के लोकतंत्र को मजबूत करेंगे, भ्रष्ट राजनीति को सुधारेंगे और प्रशासन के निकम्मेपन को दुरुस्त करेंगे? गोवा, मणिपुर, मेघालय के बाद कर्नाटक में लोकतंत्र का यह मखौल और खिलवाड़ उन जैसे लोकतंत्र के पैरोकारों के राजनीतिक एजेण्डे के कौन से ’क्लॉज’ को अभिव्यक्त करता है?
सवाल इसलिए बेचैन करते हैं कि कोई पच्चीस साल बाद देश की परम्परागत राजनीति को पछाड़ कर नरेन्द्र मोदी ने देश में एक-नए राजनीतिक रोल-मॉडल के रूप में जनता के मन में गहरी पैठ बनाई थी। ये अपेक्षाएं बलवती हुई थीं कि देश में राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक नवाचार की अनेक संभावनाएं नए आयाम अख्तियार करेंगी। ऐसा लगा था कि राजनीति में व्यभिचार के ऊपर सदाचार की मोहर लगाने वाले नेता ने देश की कमान संभाल ली है।
कर्नाटक में भाजपा द्वारा सरकार बनाने की कवायद के दौरान उड़ने वाली धूल ने राजनीतिक सदाचार की नूरानी-चेहरे को गंदला दिया है। जाहिर है इसमें भाजपा को फेयर-प्ले अवॉर्ड नहीं मिलने वाला है। मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर का दावा है कि कर्नाटक में सरकार बनाने की कोई भी कमांड ’रूल-बुक’ के बाहर नहीं होगी। सवाल यह है कि यह ’रूल-बुक’ संविधान की प्रतिच्छाया है अथवा इसकी इबारत दिल्ली के साउथ-ब्लॉक में लिखी जा रही है?
लोकतंत्र में सत्ता का परचम चाहे जितना ऊंचा हो, सत्ताधीशों को एक दिन कई नए सवालों के साथ पुराने मासूम सवालों का जवाब भी देना पड़ता है। सार्वजनिक जीवन में विश्‍वास हासिल करने की जंग लड़ना और जीतना जितना आसान है, उतना ही कठिन और दुरूह यह पता लगाना है कि विश्‍वास हारने का सिलसिला कहां से शुरू होता है? पता ही नहीं चलता कि आप लोगों का विश्‍वास कब हारने लगते हो?  कहना मुश्किल है कि कर्नाटक में भाजपा की सरकार बनाना या बना पाना प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की कितनी बड़ी जीत है?  प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह के प्रति लोगों को भरोसा था कि वो किसी भी कीमत पर कर्नाटक में विपक्ष को सरकार नहीं बनाने देंगे? सवाल यह है कि लोगों के इस विश्‍वास (?) और धारणा को किस श्रेणी में रखा जाना चाहिए? कर्नाटक की सत्ता का घमासान कोई ’फेयर-प्ले’ गेम नहीं है।  विधायकों की खरीद-फरोख्त से जुड़े इस मसले में नैतिकता के धरातल खोखले हैं। ऐसे खेल में मोदी और शाह के बारे में जनता की यह धारणा शुभ संकेत नहीं है कि इसमें वो हर हाल में विजयी होंगे।
कर्नाटक-एपीसोड के दौरान साठ, सत्तर और नब्बे के दशकों में तत्कालीन केन्द्र सरकारों द्वारा राज्य-सरकारों को बनाने-गिराने के कुत्सित किस्सों और उससे जुड़े नेताओं का उल्लेख कई बार होता रहा है। अब मोदी और अमित शाह का नाम भी इन किस्सों की श्रृंखला में जुड़ गया है। सफलताओं के शिखर पर तालियों का शोर-शराबा सही-गलत की अवधारणाओं को दुत्कार कर भगा देता है। लेकिन उस पर विचार तो होना चाहिए कि कर्नाटक में भाजपा का वोट-शेयर 36 प्रतिशत ही है, जबकि कांग्रेस को 38 प्रतिशत मत मिले हैं। गुजरात में भी कांग्रेस भाजपा की बराबरी पर आकर खड़ी हो गई है। क्या ये संकेत नहीं हैं कि कहीं न कहीं और किसी न किसी स्तर पर रिसन तो शुरू हो चुकी है? कई मर्तबा विजय के मंगल-गानों में पराजय के आलाप भी आकार लेते रहते हैं, जो सफलताओं के कोलाहल में सुनाई नहीं पड़ते हैं।

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