गठबंधन के रोडमेप मे क्षेत्रीय-राजनीति के स्पीड-ब्रेकर

कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस की संयुक्त सरकार के मुख्यमंत्री के रूप में एचडी कुमारस्वामी और उप मुख्यमंत्री के नाते जी परमेश्वर के शपथ ग्रहण समारोह के साथ ही देश की राजनीति इलेक्शन मोड में आ गई है। कांग्रेस-जेडीएस के इस गठबंधन के बीज में 2019 के लोकसभा चुनाव में गठबंधन छिपा है। इस पहल को समूचा विपक्ष 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव में भाजपा सरकार के राजनीतिक विकल्प के रूप में देख रहा है। इसी के साथ विपक्षी एकता की राजनीतिक प्रक्रियाओं के बीच टीवी चैनलों पर बहस शुरू हो गई है कि भाजपा के खिलाफ यह राजनीतिक गठजोड़ कितना स्थायी और देश के लिए हित में होगा? भारत में गठबंधन सरकारों के अनुभव मिले-जुले रहे हैं। भाजपा अगले लोकसभा चुनाव में मजबूत सरकार, मजबूत राष्ट्र के एजेण्डे पर और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का चेहरा आगे रख कर चुनाव अभियान संचालित करना चाहती है। गठबंधन सरकारों की अस्थिरता और अनिश्चितता के सवाल मोदी को सूट करते हैं। इसीलिए गठबंधन सरकारों की औचित्य उपयोगिता और स्थायित्व को लेकर बहस का नया सिलसिला शुरू हो गया है।
बहरहाल विपक्षी नेता इस अवसर को हर हाल में भुनाने पर उतारू हैं। वैकल्पिक राजनीति का रोडमैप तैयार करने का उत्साह शपथ के पहले और बाद स्पष्ट दिखाई पड़ रहा था। भाजपा की नजर में गठबंधन की उम्मीदों का यह उफान पानी के बुलबुलों की तरह हवा में उड़ जाएगा, जबकि विपक्षी नेता मान रहे हैं कि मोदी-सरकार के सिंहासन के लिए यह खतरे का संकेत है। कुमारस्वामी के शपथ समारोह में 10 से अधिक विपक्षी दल के नेताओं ने शिरकत की है। बंगाल, दिल्ली, आंध्र, पुद्दुचेरी और केरल के मुख्यमंत्रियों के अलावा कांग्रेस की ओर से सोनिया गांधी और राहुल गांधी, समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव, बसपा की सुप्रीमो मायावती, एनसीपी के शरद पवार जैसे नेताओं की भागीदारी राजनीति की नई केमेस्ट्री विकसित करने के प्रयासों की ओर इशारा करती है।
भाजपा मानती है कि यह एकता स्थायी नहीं होगी, लेकिन शपथ ग्रहण समारोह के फोटो-सेशन में मौजूद नेताओं की बॉडी-लेंग्वेज कह रही थी कि वो पुरानी कटुताओं को भूल कर एकत्रित हुए हैं। मंच पर बिहार के तेजस्वी यादव का ममता बैनर्जी के पैर छूना दर्शाता है कि राजनीति के तेवर बदल रहे हैं। सोनिया गांधी, ममता बैनर्जी और मायावती के बीच खिलखिलाता सखा भाव राजनीतिक इबारत बदलने को आतुर नजर आ रहा है। फोटो शूट के दौरान दो-तीन मर्तबा सोनिया गांधी द्वारा नेताओं की कतार में पीछे खड़ी मायावती को खींचकर आगे करना दर्शाता है कि राजनीति का रुख कितना लचीला रहने वाला है?
अभी तय नहीं है कि विपक्षी दलों के गठबंधन का स्वरूप क्या होगा? बुनियादी सवाल यह है कि क्षेत्रीय दलों के अपने समीकरणों के बीच कांग्रेस का राजनीतिक मूल्य कैसे निर्धारित होगा? ममता बैनर्जी या चंद्रबाबू में टकराव भले ही नहीं हो, लेकिन उत्तर प्रदेश में सपा, बसपा और कांग्रेस के बीच तालमेल की धुरी कैसे बनेगा, यह सवाल भी राजनीतिक चर्चाओ में सुलग रहा है। ऐसे कई सवाल समय के साथ आकार लेंगे, जिसके आधार पर भाजपा को भरोसा है कि यह गठबंधन कारगर नहीं हो पाएगा। वो इस तर्क को भी हवा दे रहे हैं कि बेमेल राजनीतिक गठबंधन की अष्टावक्र सरकार देश के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती है।
गठबंधन सरकारों की मजबूती और गुणवत्ता पर लोगों की राय भी मिली जुली है। अटलबिहारी बाजपेई की राजग-सरकार ने शानदार तरीके से अपना कार्यकाल पूरा किया था। यूपीए के दस सालों में भी मनमोहनसिंह की सरकार ने कई ऐतिहासिक काम किए हैं, जिसकी बुनियाद पर मोदी-सरकार अपने कामों को आगे बढ़ा रही है। नब्बे के दशक में देवेगौडा, आई.के. गुजराल या चंद्रशेखर की गठबंधन सरकारों की अस्थिरता के कारण माहौल बना था कि गठबंधन की राजनीति से निकले राजनेता स्थिर और निर्णायक सरकार नहीं दे सकते हैं। 2014 में भाजपा ने विभिन्न दलों के साथ मिलकर राजग-सरकार बनाई थी। लेकिन भाजपा खुद बहुमत में होने के कारण परिस्थितियां बदल गईं। मोदी-सरकार से शिवसेना और तेलुगुदेशम के विवाद जग जाहिर हैं। गठबंधन सरकारों पर बहस दिनोदिन घमासान होने वाली है। लेकिन यह प्रयोग रुकने वाला नहीं है, क्योंकि उत्तर प्रदेश में फूलपुर और गोरखपुर सीट पर सपा-बसपा की संयुक्त जीत के बाद इस धारणा को बल मिला है कि विपक्ष की एकजुटता मोदी-सरकार को लोकसभा चुनाव में हरा सकती है।

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