प्रसंग राममोहन राय : राजनीतिक मगरूरी में फंसा स्त्री विमर्श

राजा राममोहन राय मेरे जहन में दर्ज काली लकीरों वाला वह रेखाचित्र है, जिसे कभी मैंने बचपन में अपनी स्कूली किताबों में देखा था। एक पत्रकार के रूप में सामयिकता के नाम पर जुगनू की रोशनी जैसे अल्पजीवी ही नहीं, बल्कि क्षण-जीवी मुद्दों पर अनर्गल वक्त जाया करने वाले मुझ जैसे व्यक्ति के जहन में राजा राममोहन राय के बारे में डेढ़-दो पन्नों का वह पाठ ताजा हो उठा, जो हमारे स्कूल की पाठ्यक्रमों का हिस्सा था। स्कूली शिक्षा के बाद उनके बारे में बहस करने या समझने-समझाने जैसी कोई बात मेरी याददाश्त का हिस्सा नहीं है। उनके बारे में केवल यह एक तथ्य याद है कि उन्होंने भारत में सती-प्रथा के उन्मूलन में अपना महती योगदान किया था।
मंगलवार, 22 मई 2018 को गूगल पर राजा राममोहन राय के डूडल देखने के बाद लगा कि हमारे विमर्श में ऐसे महापुरुष नदारद क्यों होते जा रहे हैं? गूगल कई मर्तबा समाज की कमजोर नसों पर हाथ रख देता है। राममोहन राय का प्रसंग खुलासा करता है कि हमारा स्त्री-विमर्श राजनीतिक मगरूरी की गिरफ्त में है।
राजा राममोहन राय की 246 वीं जयंती पर उनका डूडल बनाकर गूगल ने याद दिलाया है कि हमारा स्त्री-विमर्श महज लफ्फाजी या जुमलेबाजी तक सीमित है। राममोहन राय का डूडल यह सवाल करता है कि क्या समाज की महिलाएं दुराचार, अनाचार और अन्याय से पूरी तरह मुक्त हैं? क्या हम पूरी संजीदगी और संवेदना के साथ उनके उत्पीड़न को हम देख या समझ पा रहे हैं? समस्याओं को देखने और समझने का हमारा दृष्टिकोण कितना सही है? महिलाओं की दशा और दिशा से जुड़ा यह सवाल हमें निरुत्तर करता है। राममोहन राय के जन्म के 246 साल बाद भी महिलाएं उतनी ही उत्पीड़न का शिकार हैं, जितनी की उस वक्त थीं। सिर्फ उत्पीड़न के तौर-तरीके बदल गए हैं। आज भारत में हर एक घंटे में चार बलात्कार याने हर 14 मिनट में किसी एक महिला के साथ बलात्कार होता है। संख्या शर्मनाक तरीके से बढ़ रही है। जहां 2012 में देश में 24925 महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ था, वहीं 2016 में यह आंकड़ा 38,210 था। विंग्स 2018 : वर्ल्ड ऑफ इंडियाज गर्ल्स के सर्वेक्षण के अनुसार भारत में हर तीन में से एक लड़की सार्वजनिक स्थानों पर यौन-उत्पीड़न को लेकर चिंतित रहती है। हर पांच में एक लड़की बलात्कार सहित अन्य किस्म के शारीरिक हमलों के डर के साये में जीती है। हाल ही में कठुआ, उन्नाव और सूरत में नाबालिग लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार की घटनाएं समाज की नसों में बहते वहशीपन की कहानी बयान करती हैं। महिलाओं के विरुद्ध अपराध की कहानियां सिर्फ यौन-उत्पीड़न तक सीमित नहीं हैं। बाल-विवाह, दहेज-प्रथा, कन्या-भ्रूण हत्या, घरेलू-हिंसा, महिलाओं की तस्करी जैसे अपराध आज भी हमारी सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा हैं।
समाज में महिला-उत्पीड़न का स्वरूप उतना ही भयावह है, जितना कि सोलहवीं और सत्रहवीं सदी में था। सिर्फ उसका स्वरूप बदला है। 22 मई,1772 में हुगली के राधानगर गांव में जन्मे राजा राममोहन राय के दिमाग में सती-प्रथा के विरोध का बीज उनके पारिवारिक हादसे से जुड़ा है। उन्होंने 1815 में कोलकाता में आत्मीय समाज की स्थापना की थी। उसके बाद 1828 में द्वारिकानाथ टैगोर के साथ मिलकर ब्रह्म-समाज की नींव रखी थी। इसी बीच उनकी भाभी के सती होने के भयावह हादसे ने उन्हें बुरी तरह हिला दिया था। सती-प्रथा के खिलाफ उनकी जंग का सबब यही घटना थी, जिसने देश को कुरीति से मुक्त किया। राममोहन राय ने 1818 में यह संघर्ष शुरू किया। इस क्रूर प्रथा के खिलाफ वे उस वक्त तक जुटे रहे जब तक कि तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बैंटिक ने सती होने अथवा सती करने को अवैध घोषित नहीं कर दिया। बैंटिक का फैसला भारतीय इतिहास में युग-परिवर्तन की दृष्टि से मील का पत्थर है। राममोहन राय ने यह लड़ाई ग्यारह साल तक लड़ी थी। वैसे राममोहन राय सही अर्थों में किसी राज-परिवार से संबंधित नहीं थे। वो एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे। इंग्लैण्ड के दरबार में मुगल शासन के जन कल्याण से जुड़े कार्यों को सही और सकारात्मक तरीके से प्रस्तुत करने के कारण दिल्ली के तत्कालीन मुगल शासक अकबर द्वितीय ने उन्हें राजा की उपाधि से विभूषित किया था।
कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर ने राजा राममोहन राय के बारे में लिखा है कि- ’राममोहन राय के युग में भारत में कालरात्रि-सी उतरी हुई थी। लोग भय और आतंक के साये में जी रहे थे। मनुष्य और मनुष्य के बीच भेदभाव बनाए रखने के लिए उन्हें अलग-अलग खानों में बांट दिया गया था। उस कालरात्रि में राममोहन ने अभय-मंत्र का मंत्रोच्चार किया और प्रतिबंधों को तोड़ फेंकने की कोशिश की।’ मनुष्यों के बीच दरार डालने का यह उपक्रम अभी भी जारी है।

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