मोदी के धमकाने पर मनमोहन ने राष्ट्रपति को चिट्ठी लिखी

सोशल मीडिया पर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को लिखा वह पत्र ट्रोल होने लगा है, जिसमें उन्होंने राष्ट्रपति से अनुरोध किया है कि वो प्रधानमंत्री मोदी को अपने भाषणों में कांग्रेस नेताओं सहित अन्य पार्टी के लोगों को डराने वाली भाषा का इस्तेमाल करने से रोकें। लेकिन सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग के जरिए मनमोहन सिंह को ’डिफेंसिव-मोड’ में लाने की कोशिशों के यह मायने कतई नहीं हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री ने जो सवाल उठाए हैं, वो राजनीतिक दृष्टि से महत्वहीन अथवा अतार्किक हैं। मोदी के भाषणों की भाषा और लहजे को लेकर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को लिखे पत्र में कहा गया है कि वो प्रधानमंत्री को कांग्रेस नेताओं या अन्य किसी पार्टी के नेताओं के खिलाफ अवांछित और धमकाने वाली भाषा का इस्तेमाल करने से रोकें। मोदी का व्यवहार और राजनीतिक आचरण प्रधानमंत्री पद की गरिमा के अनुकूल नहीं है। बकौल मनमोहन सिंह हुबली में चुनाव प्रचार के दौरान मोदी ने धमकी भरे लहजे में कांग्रेस को चेतावनी दी थी कि- ’कांग्रेस के नेता कान खोलकर सुन लें, अगर सीमाओं को पार करोगे तो ये मोदी है, लेने के देने पड़ जाएंगे।’ कांग्रेस ने मोदी के भाषण के पुरावे में यू-ट्यूब लिंक भी राष्ट्रपति के सामने प्रेषित किया है।
मनमोहन सिंह ने पत्र में प्रधानमंत्री पद के लिए ली जाने वाली शपथ का जिक्र करते हुए कहा है कि ’अब तक सभी प्रधानमंत्रियों ने पद की मर्यादा का पालन करते हुए अपने दायित्वों का निर्वहन किया है। यह सोचना मुश्किल है कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में पीएम पद पर बैठा हुआ कोई व्यक्ति इस तरह की डराने वाली भाषा का इस्तेमाल करेगा।’ पत्र पर मनमोहन सिंह के अलावा पी चिदम्बरम, अशोक गेहलोत, दिग्विजय सिंह, कमलनाथ, मुकुल वासनिक, मोतीलाल वोरा, अंबिका सोनी, आनंद शर्मा, एके एंटोनी और अहमद पटेल के हस्ताक्षर हैं। कर्नाटक विधानसभा के राजनीतिक कटुता से ओतप्रोत चुनाव के आखिरी दौर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 22 रैलियों को संबोधित किया था। वैसे भी प्रधानमंत्री बनने के बाद विभिन्न प्रदेशों के चुनावों में मोदी की अतिशय भागीदारी और अतिरंजित राजनीतिक भाव-भंगिमाओं और भाषा उनके समूचे राष्ट्र् का प्रतिनिधि प्रधानमंत्री के रास्ते में हमेशा अवरोध बनकर खड़ी रही है। वो हमेशा देश के उन तीस-इकतीस प्रतिशत मतदाताओं के प्रधानमंत्री बने रहे, जिन्होंने 2014 में भाजपा को वोट दिया था।
भारत में यह राजनीतिक घटनाक्रम अभूतपूर्व है कि कोई पूर्व प्रधानमंत्री वर्तमान प्रधानमंत्री की भाषा को लेकर राष्ट्रपति को पत्र लिख कर आपत्ति दर्ज कराए। मनमोहन सिंह ने राष्ट्रपति से अनुरोध किया है कि वो हस्तक्षेप करके मोदी को समझाएं कि सार्वजनिक जीवन में भाषा और भाषण की मर्यादाओं की लक्ष्मण-रेखाएं नहीं लांघें। देश में प्रतिशोध की राजनीति नए तेवर अख्तियार कर चुकी है। विपक्षी दलों में यह अंदेशा गहराता जा रहा है कि 2019 में लोकसभा चुनाव जीतने के लिए मोदी-सरकार और अमित शाह की सल्तनत में वह सब होगा, जो संवैधानिक-व्यवस्थाओं में जायज नहीं है। मोदी की भाषा और लहजे पर मनमोहन सिंह की आपत्ति आकस्मिक नही है। यह विपक्ष के सामूहिक ’ऑब्जर्वेशन’ का हिस्सा है। इसका उल्लेख कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी ने मार्च 2018 के पहले सप्ताह में आयोजित इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में भी किया था। सोनिया गांधी ने मोदी सरकार पर प्रहार करते हुए कहा था कि ’लोगों की स्वतंत्रता निरन्तर खतरे में है, क्योंकि सत्तारूढ़ दल लगातार भड़काऊ भाषणबाजी कर रहा है। यह न तो आकस्मिक है, ना ही भूलवश है, बल्कि एक खतरनाक डिजाइन का हिस्सा है।’
समूचे विपक्ष की धारणा है कि लोकसभा चुनाव जीतने के लिए भाजपा विपक्षी नेताओं को बदनाम करने के लिए सीबीआई और इनकम-टैक्स विभाग का भरपूर उपयोग करने वाली है। मोदी-सरकार के गठन के बाद विपक्षी नेताओं के खिलाफ मुकदमेबाजी में दिनों-दिन वृद्धि हुई है। नेशनल हेराल्ड केस में सोनिया गांधी और राहुल गांधी इस वक्त जमानत पर हैं। इसका उल्लेख मोदी अपने भाषणों में अक्सर करते रहते हैं। पी. चिदम्बरम के विरूद्ध ईडी की कार्रवाई भी राजनीतिक प्रतिशोध की कहानी मानी जा रही है। सुनंदा थुरूर की मौत के चार साल बाद सीबीआई कोर्ट में यह कह रही है कि शशि थुरूर ने अपनी पत्नी को आत्महत्या के लिए उकसाया था। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, हिमाचल के पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह, बंगाल के टीएमसी नेता सुदीप बंदोपाध्याय, बसपा सुप्रीमो मायावती, कांग्रेस के सचिन पायलट, अशोक गेहलोत, बिहार में तेजस्वी यादव और कश्मीर में फारूख अब्दुल्ला समेत दक्षिण भारत के कई नेता मोदी-सरकार के रडार पर हैं। लोकसभा चुनाव के पहले सरकारी जांच एजेंसियों को सक्रिय करके राजनीतिक माहौल को बदलने की यह तैयारी बहुत कुछ कहती है। भयादोहन की यह राजनीति लोकतंत्र को किस मुकाम पर ले जाकर छोड़ेगी, इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है।

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