मोदी नाजायज नजीरों की लकीरों के ‘फकीर’ बनना चाहते हैं?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा-अध्यक्ष अमित शाह 2014 में उन्हें मिले जनादेश के यह मायने भी मानते हैं कि वो पिछले साठ साल के कुशासन की नाजायज नजीरों की लकीरों पर चलकर देश के निजाम को आगे बढ़ाने का काम कर सकते हैं। इस भ्रमित निष्कर्ष के बाद दोनों सत्ता-प्रमुखों ने उन सवालों पर ताला जड़ दिया है, जो सत्ता की अक्षमता, अनैतिकता और अनधिकार चेष्टाओं के जवाब ढूंढते हैं… संस्थागत तानाशाही की ओर इंगित करते हैं… निरंकुशता को एड्रेस करते हैं। सच के नैतिक धऱातल शाश्वत हैं। भ्रष्टाचार या कदाचरण कभी सही नहीं होता है। राज्य-सरकारों को गिराने वाले कांग्रेस के निन्यानवे पुराने पाप मोदी को कर्नाटक में सौंवा नया पाप करने की इजाजत नहीं देते हैं। संविधान की निगाह में सबकी सजा एक है।
भाजपा-प्रवक्ताओं की यह सीनाजोरी डराने वाली है कि कांग्रेस अथवा अन्य लोगों को भाजपा के गुनाहों पर सवाल उठाने का अधिकार इसलिए नहीं है कि उनके हाथ पहले ही इन पापों में सने हैं। सवाल इन दलीलों के परीक्षण का है, कि पूर्व-सरकारों के राजनीतिक-गुनाह मौजूदा सरकार के वर्तमान पापों का कवच कैसे हो सकते हैं? इसके मायने क्या यह हैं कि मोदी-सरकार के हाथों में भी एक बार देश पर आपातकाल अथवा सेंसरशिप थोपने का परमिट है? न्याय-विधान में पुराने फैसलों की नजीर नए गुनाहों की सजा का आकार तय करते वक्त दी जाती है। इस परिप्रेक्ष्य में भाजपा की दलीलों के मद्देनजर क्‍या लोगों को मोदी के संदर्भ में वही फैसला लेना चाहिए जो जनता ने इंदिरा गांधी अथवा अन्य नेताओं के बारे में लिया था?
कर्नाटक में सरकार गिरने के एपीसोड ने पूर्ववर्ती सरकारों के सौ गुनाहों से ज्यादा देश का नुकसान किया है। नरेन्द्र मोदी देश में राजनीतिक परिवर्तन के वाहक बनकर सामने आए थे। उनका मुखौटा टूटने के बाद लोगों में निराशा का भाव है कि क्या देश की यह नियति है? श्रेष्ठता से परे यह देश क्या हमेशा ‘कम बुरे’ या ‘ज्यादा बुरे’ के चक्रव्यूह में फंसा रहेगा? कर्नाटक-एपिसोड ने परिवर्तन की अपेक्षाओं को गहरा धक्का दिया है।
भाजपा नेताओं की गुमराह करने वाली इन दलीलों और सवालों को सुनते-सुनते लोग थकने लगे है। विज्ञान के समान ही लोकतांत्रिक समाज के सवालों का अपना मिजाज, अपनी तासीर, अपना लहजा, अपना कायदा होता है। लोकतंत्र के विधान में सवाल कभी निरुत्तर नहीं रहते हैं। उनके उत्तर भी एक होते हैं। लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सत्ता के नजदीक सवाल-जवाबों का यह शास्त्रोक्त विधान बेमानी है। यहां हर सवाल का उत्तर सत्ता-सापेक्ष अथवा सत्ता के स्वार्थों के सांचे में ढला होता है। नरेन्द्र मोदी और अमित शाह ने देश के राजनीतिक सवालों के जवाब की एक ‘मॉडल आन्सर-बुक’ तैयार की है। इस ‘मॉडल-बुक’ के अनुरूप उत्तर देना सभी के लिए अनिवार्य है। इन जवाबों से असहमत लोगों के लिए ‘पेनल्टी-क्लॉज’ हैं। यदि आप हल्दी-घाटी की लड़ाई में महाराणा प्रताप व्दारा अकबर को हराने वाले उत्तर से मुतमईन नहीं हैं…यदि कांग्रेस के पापों की पुनरावृत्ति के व्दारा देश के पुनरोध्दार के ‘मोदी-प्रयासों’ से सहमत नहीं हैं… यदि सरदार पटेल पर नेहरू के अत्याचारों की मोदी-थ्‍योरी के कथा-वाचक नहीं हैं…यदि नोटबंदी को ब्‍लैक-मनी का इलाज नहीं मानते हैं… यदि संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्ता से जुड़े मसलों में केन्द्र के कदमों की पुष्टि नहीं करते हैं…यदि कर्नाटक में कांग्रेस-जद(एस) व्दारा सरकार बनाने की पहल को गलत नहीं मानते हैं, तो भाजपा के पेनल्टी-क्लॉज के मुताबिक आपका नाम देश-द्रोहियों की सूची में डाल दिया जाएगा।
यूनिवर्सिटी की परीक्षाओं में भी वो पर्चें निरस्त हो जाते हैं, जिनके वस्तुनिष्ठ सवालों में चिन्हित करने के लिए ‘ऑप्शन’ गलत होते हैं। लेकिन, मोदी और अमित शाह सवालों के उन उत्तरों को खारिज कर रहे हैं, जो संविधान में लिखे हैं। इसीलिए लोकतंत्र के परीक्षकों ने कर्नाटक में मोदी-शाह की नाजायज कोशिशों को खारिज कर दिया है। इतिहास की नाजायज नजीरों की लकीरों का फकीर बने मोदी के बारे में यह भ्रम टूटा रहा है कि वो देश की तासीर बदलने के साथ लोगों की तकदीर बदलने का काम करेंगे। किसी भी कीमत पर सत्ता की चाहत लोकतंत्र की कसौटियों के लिए खतरनाक है। 3 दिसम्बर 2016 को मुरादाबाद में नोटबंदी के संदर्भ में आयोजित विकास-रैली में मोदी ने कहा था कि- ‘हिन्दुस्तान की पाई-पाई पर लोगों का हक है। विरोधी लोग ज्यादा से ज्यादा क्या कर लेगें… हम तो फकीर आदमी हैं, झोला लेकर निकल पड़ेंगे। फकीरी ने मुझे गरीबों के लिए लड़ने की ताकत दी है।’ लेकिन कर्नाटक में सत्ता परिवर्तन के तौर-तरीके मोदी की ‘फकीर-फिलॉसफी’ को झुठला रहे हैं। लगता है मोदी कभी भी झोला उठाकर फकीरों की तरह कहीं जाने वाले नहीं हैं। वो आखिरी दम तक सत्ता के लिए पंजा लड़ाएंगे…।

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