राष्ट्रवाद के ‘मीटर’ पर मीडिया को कसने के लिए विदेशी कंपनी ?

राष्ट्रवाद के नाम पर सारे देश की राजनीतिक फिजाओं की लय को हिन्दुत्व के ’मीटर’ के साथ बांधने के लिए आतुर मोदी-सरकार ने मीडिया को राष्ट्रवाद की थाप पर थिरकने और नचाने के लिए एक नया मैकेनिज्म विकसित करने की योजना बनाई है। यह ’मैकेनिज्म’ उस सरकारी सर्क्युलर की पुनरावृत्ति है, जो 2 अप्रैल 2018 को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने जारी किया था। उस वक्त तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री स्मृति ईरानी ने एक आदेश जारी किया था, जिसके अंतर्गत फर्जी खबरों के लिए पत्रकारों के ब्लैक-लिस्ट करने के प्रावधान थे। देश के ज्यादातर पत्रकारों और उनके संगठनों ने इस आदेश की मंशाओं पर सवाल उठाते हुए कहा था कि यह अप्रत्यक्ष रूप से मीडिया पर शासकीय-नियंत्रण कायम करने की सरकारी कोशिश है। पत्रकारों के विरोध के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस मसले पर सीधा हस्तक्षेप करते हुए सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का यह आदेश वापस लेने के निर्देश दिये थे।
उपरोक्त घटना के पचास-साठ दिनों के भीतर ही मीडिया पर निगहबानी की यह नई पहल सामने आई है। इंडिया टुडे समूह के हिन्दी चैनल ’आज तक’ ने मीडिया पर अंकुश की खामोश कोशिशों का खुलासा किया है। ’आज तक’ ने यह खबर अंतर्राष्ट्रीय मीडिया ब्लूमबर्ग के हवाले से जारी की है। ब्लूमबर्ग के अनुसार  सूचना मंत्रालय ने ऑन लाइन टेंडर जारी किया है। इसके अनुसार भारत-सरकार एक ऐसी मीडिया कंपनी तलाशना चाहती है, जो सोशल मीडिया की निगरानी के लिए एक सॉफ्टवेयर समेत कम से कम 20 लोगों की विशेष टीम के साथ केन्द्र सरकार को एक रियल टाइम न्यू मीडिया कमांड रूम की सुविधा दे सके।
विज्ञापन में कंपनी से सरकार ने जिन सेवाओं की अपेक्षा की है, उनका ब्योरा दिलचस्प है। विज्ञापन के अनुसार कंपनी को ट्वीटर, यू-ट्यूब, लिंक्डइन समेत तमाम इंटरनेट फोरम और ईमेल की ’मॉनिटरिंग’ करते हुए इन प्लेटफार्म्स पर संवेदनशील पोस्ट्स की पहचान करनी होगी। कंपनी के दायित्वों में फेक न्यूज की पहचान करते हुए केन्द्र सरकार के नाम पर ’पोस्ट्स’ और ’मैसेज’ का संचार करना भी शुमार होगा। केन्द्र-सरकार की मंशा है कि कंपनी संवेदनशील और फेक न्यूज कंटेंट रोकने के साथ-साथ ऐसे पोस्ट का संचार भी करे, जिससे देश की अच्छी छवि बनाने में मदद मिल सके। मोदी-सरकार की इस पहल का फिलहाल कोई नतीजा नहीं निकला है। टेंडर के मामले में उठने वाले सवालों को लेकर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने फिलहाल चुप्पी साध रखी है।
बहरहाल, इस पर बहस शुरू हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि मोदी-सरकार को एक मास सर्वेलेंस टूल की जरूरत है, जो राष्ट्रवाद के नाम पर खबरों और खबरनवीसों पर निगरानी रख सके। मोदी-सरकार का यह कदम भारत के लोकतंत्र के सामने कड़ी चुनौती है। इसमें संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों के हनन की संभावनाएं भी अन्तर्निहित हैं।
वैसे भी, दो महीने पहले फेक न्यूज के नाम पर जारी सर्क्युलर पर मीडिया ने जो आशंकाएं जताई थीं, वही आशंकाएं सूचना प्रसारण मंत्रालय के नए टेंडर में भी सामने आ रही हैं। सवाल यह है कि राष्ट्रवाद के पैमानों पर खबरों की कसौटियां क्या होंगी? उन्हें कौन निर्धारित करेगा? केन्द्र सरकार की आलोचना, भ्रष्टाचार  या राजनीतिक टिप्पणियों को किस श्रेणी में रखा जाएगा? राष्ट्रभक्ति का तमगा बांटने वाले भाजपा, बजरंग दल या उसके सहयोगियों की सूची में नई विदशी कंपनी जुड़ जाएगी। फर्जी या राष्ट्रद्रोही खबरों की मनमाफिक व्याख्या करने का एक ऐसा तंत्र विकसित हो जाएगा, जिसका संचालन विदेशी कंपनियों के हाथों में होगा। उनके निहित-स्वार्थों की रखवाली यह मोदी-सरकार कैसे करेगी?
देश में मीडिया को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त कानून और न्याय-पालिका है। यह सही है कि मीडिया हर सरकार के लिए मुसीबत का सामान होता है। ज्यादातर सरकारें मीडिया से नाखुश रहती हैं। भाजपा उन संगठनों में शरीक है, जो इंदिरा गांधी की सेंसरशिप के सबसे बड़े आलोचक थे। सरकार के रूप में भाजपा-नेताओं का बर्ताव भी वैसा ही है। राजस्थान की वसुन्धरा-सरकार द्वारा मीडिया को नियंत्रित करने वाला कानून किसी से छिपा नहीं है।
’रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ की ताजा रिपोर्ट के अनुसार भारत में मीडिया की आजादी का इंडेक्स लगातार नीचे खिसक रहा है। 180 देशों के तुलनात्मक अध्ययन में भारत में प्रेस की आजादी का इंडेक्स पिछले साल की तुलना में 2108 में दो स्थान नीचे खिसक कर 138 वें स्थान पर आ गया है। राष्ट्रवाद के नाम पर तथ्यों एवं तर्कों को नियंत्रित करने की पहल प्रेस की आजादी की राह में सबसे बड़ा अवरोध है।

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