ए वतन, वतन मेरे आबाद रहे तू … : डॉ. मयंक चतुर्वेदी

सामान्‍य परिवार की एक साधारण सी लड़की का अदम्य साहस और असाधारण देशभक्ति को लेकर सच्‍ची कहानी पर फिल्‍मायी गई राजी फिल्म का वैसे तो हर गीत उसकी विषय वस्‍तु के अनुरूप है, किंतु उसमें भी एक गीत ऐसा उत्‍कृष्‍ट तैयार हुआ है कि उसे जितनी बार गुनगुनाएं वह आपको अपने वतन से उतना ही नजदीक से जोड़ता है। वास्‍तव में इस फिल्‍म को मेघना गुलजार ने बहुत ही खूबसूरती से बड़े पर्दे पर उतारा है। आलिया भट्ट की उमदा एक्टिंग है।

ए वतन, वतन मेरे आबाद रहे तू…मैं जहां रहूं, जहां में याद रहे तू…..वस्‍तुत: यह गीत जब फिल्माते हुए बड़े पर्दे पर देखा गया तो इसे देखते ही शरीर का एक-एक रोम खिल उठा। इसे देखने के साथ ही समूचे देश की तस्‍वीर आपके जहन में उतरने लगती है। कश्मीर के उतंग पर्वत श्रंखला से लेकर कन्याकुमारी में विशाल शांत सागर और वह स्वामी विवेकानंद का बीच समुद्र में बना हुआ स्‍वरूप सहज ही आंखों के समक्ष आ जाता है, जहां से भारत की भव्यता के दिव्‍य दर्शन होते हैं। इस गीत के आगे बढ़ने के साथ ही एक ओर से हिमालय का पर्वत और उसकी ठंड का अहसास होता दिखाई देता है तो राजस्थान का वह मरुस्थल भी मस्तिष्क में कहीं दस्तक दे रहा होता है जहां 50 डिग्री सेल्‍सियस पर हमारे सैनिक सीमाओं पर बिना किसी ठंड और गर्मी की परवाह किए हम सभी की सुरक्षा में रात-दिन तैनात हैं। इस गीत के साथ भारत का वह विराट स्‍वरूप भी दृष्‍यमान हो उठता है जोकि देश के जनजन से जगमगाता जन गण मन का निर्माण करता है। जिनके कारण से हम और आप खुली हवा में सुख की सांस ले पा रहे हैं। वास्‍तव में आज ऐसे बहुत से लोग हैं जो हमारे बीच नहीं हैं, और जो हैं भी तो जिंदा होते हुए भी गुमनाम रहकर राष्‍ट्र सेवा में रत हैं। उनका सर्वस्‍व भारत मां की सेवा करते रहना है। इसी के लिए उन्‍होंने अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया है। देखा जाए तो सचमुच में उनके कारण से ही आज भारत एक संप्रभुराष्‍ट्र है।

वास्तव में राजी फिल्‍म के इस गीत के लिए सबसे अधिक बधाई उन्‍हें हैं, जिन्‍होंने इसे संगीत में पिरोया है। यह हमें बताता है कि किस तरह से देश को जीवंत रखने के लिए बलिदानियों की एक लंबी श्रृंखला निरंतर हमारे बीच मौजूद है। यह मूवी ऐसी है कि इसे हर भारतीय को एक बार अवश्‍य देखना चाहिए, उन्हें भी देखना चाहिए जो शिकायत करते हैं अपनी जिंदगी से कि उन्हें जिंदगी ने सब कुछ दिया, लेकिन वक्त नहीं दिया। व्यस्तता बहुत रहती है काम की, उलझने बहुत हैं आराम नहीं जिंदगी । मैं क्या करूं बेबस हूं, इस जिंदगी से। चाह कर भी मैं नहीं दे पाता अपना अपने लिए वह सब कुछ। जो देने की तमन्ना रखता हूं, ख्वाब में सपने देखता जिसके दिन रात में। ऐसे व्‍यस्‍त लोगों के लिए भी राजी फिल्‍म देश भक्‍ति की दिशा में उम्‍मीद की किरण जगाती है और संदेश देती है कि देशभक्‍ति आप जहां हैं जो काम कर रहे हैं, उसी में रमते हुए पूरी तरह से कर सकते हो, बशर्ते आपका मन साफ हो।

यह भी एक सुखद संयोग है कि वर्ष 2014 से 2018 तक पिछले 4 सालों में फिल्‍म इंडस्‍ट्री में अन्‍य सामाजिक विषयों के चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बनने के बाद से लगातार तेजी देखी जा रही है। कभी स्वच्छता अभियान को लेकर फिल्‍म बनती है तो कोई शिक्षा, भाषा और शौचालय की समस्या पर फिल्‍म देखने को मिलती है। उसके बाद अब राजी जैसी एक उत्‍कृष्‍ट मूवी देखने में सामने आई है। वस्‍तुत: इन बीते चार सालों की तुलना में भारतीय हिन्‍दी सिनेमा का वह कोई दौर याद नहीं आता है जब इतने अधिक सामाजिक विषयों पर इतने कम समय में अधिकतम फिल्‍मों का निर्माण संभव हुआ है, यानी इसे यदि देश की राष्‍ट्रीय राजनीति से भी जोड़कर देखा जाए तो अवश्‍य देख सकते हैं, यथा राजा तथा प्रजा की सूक्‍ति यहां सच होती दिख रही है।

इस फिल्‍म को उसकी पटकथा के स्‍तर पर देखें तो मेघना गुलज़ार की ये नई फिल्म ऐसी भारतीय महिला के जीवन पर आधारित है जो अपने पिता के कहने पर एक पाकिस्तानी फौजी परिवार के लड़के से शादी करने के लिए तैयार हो जाती है और अपना घर-परिवार, सुख की ज़िंदगी छोड़कर पाकिस्तान चली जाती है ताकि वहां से वह भारत के हित के लिए जासूसी कर सके। फिल्‍म में आगे ‘सहमत’ (आलिया भट्ट) अपनी सूझ-बूझ और हौसले के दम पर देश प्रेम की यहां एक मिसाल कायम करने में सफल रहती है। वह वहां भय के माहौल में ऐसी गोपनीय जानकारियां भारत भेजने में सफल होती है जिनके कारण से 1971 के भारत-पाक युद्ध में हमारे देश ने बहुत बड़ी सफलता अर्जित की थी । भारतीय सेना ने पाक सैनिकों को घुटने टेकने के लिए मजबूर कर दिया था।

इस फिल्‍म का बड़ा संदेश जो है वह यही है कि देशभक्‍ति से ऊपर व्‍यक्‍तिगत प्रेम भी नहीं होता है। ‘सहमत’ अपना मिशन पूरा कर जब भारत लौटी तो उसने यहां एक बेटे को जन्म दिया, जिसे कि उसने आगे भारतीय सेना में भर्ती कराया। वक्‍त के साथ वह महिला जरूर गुज़र जाती है, लेकिन देशप्रेम का जज्‍बा सभी के दिलों में छोड़ कर जाती है।
कुल मिलाकर फिल्‍म का संदेश यही है कि ऐ वतन, वतन मेरे, आबाद रहे तू… मैं जहाँ रहूँ जहाँ में याद रहे तू…तू ही मेरी मंजिल, पहचान तुझी से..पहुंचू मैं जहां भी मेरी बुनियाद रहे तू…तुझपे कोई ग़म की आंच आने नहीं दूं…कुर्बान मेरी जान तुझपे शाद रहे तू…ऐ वतन, वतन मेरे, आबाद रहे तू मैं जहाँ रहूँ जहाँ में याद रहे तू ऐ वतन.. ऐ वतन.. मेरे वतन.. मेरे वतन.. आबाद रहे तू.. आबाद रहे तू….।

(लेखक, फिल्‍मसेंसर बोर्ड एडवाइजरी कमेटी के पूर्व सदस्‍य एवं वरिष्‍ठ पत्रकार हैं।)

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