बाघ के शिकारियों का सात-सात साल की सजा

होशंगाबाद/भोपाल । सीजेएम कोर्ट बाघ के शिकार के एक मामले में 5 आरोपियों को सात-सात साल की सजा सुनाई है। इसके साथ ही अदालत ने एक-एक लाख रुपए का जुर्माना भी किया है, जिसे न भरने पर 6 माह की अतिरिक्त सजा भुगतनी होगी। वन्य अपराधों की दुनिया में अदालत के फैसले को काफी सख्त बताया जा रहा है।

प्रदेश के चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डन कार्यालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार बैतूल जिले में बाघ के शिकार का यह मामला करीब 13 माह पुराना है। 7 अप्रैल, 2017 को बैतूल जिला मुख्यालय से करीब 12 कि.मी.दूर राठीपुर के जटाशंकर नाले में ग्रामीणों ने एक बाघ को निष्क्रिय अवस्था में देखा था। वन अधिकारियों को जानकारी दिए जाने पर बाघ को बैतूल ले जाया गया। यहां सतपुड़ा टाइगर रिजर्व के वन्य प्राणी चिकित्सक डॉ. गुरुदत्त शर्मा एवं अन्य डॉक्टरों ने बाघ की जांच के बाद उसके शरीर के पिछले हिस्से में लकवे की आशंका जताई। इसके बाद उपचार की दृष्टि से बाघ को भोपाल के वन विहार भेज दिया गया। यहां जब बाघ की जांच की गई, तो एक्सरे में उसके शरीर के पिछले हिस्से में गोली फंसी दिखाई दी। ऑपरेशन के बाद बाघ के शरीर से गोली तो निकाल दी गई, लेकिन उसे बचाया नहीं जा सका।

बाघ की मौत के इस मामले की जांच वन विभाग की एसटीएफ की होशंगाबाद यूनिट को सौंपी गई। एसटीएफ ने ताबड़तोड़ कार्रवाई करते हुए तीन आरोपियों सुखचंद पिता नजरू, दीपचंद पिता नजरू एवं सुभाष पिता सूरतलाल को 13 अप्रैल को गिरफ्तार कर लिया। वहीं, मामले के दो अन्य आरोपियों बस्तीराम पिता शंकर तथा गुलाब पिता फागुन को महाराष्ट्र से 12 मई, 2017 को गिरफ्तार किया। कोरकू जाति के ये सभी आरोपी बैतूल जिले के ही कुमारटेक गांव के निवासी हैं। मामले की सुनवाई पूरी होने पर 12 मई, शनिवार को होशंगाबाद जिला न्यायालय के सीजेएम राजेश अग्रवाल की कोर्ट ने सभी आरोपियों को सात-सात साल की सजा सुनाई।

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