आंकड़ों की हकीकत में भाजपा के लिए गठबंधन क्यों जरूरी?

लोकसभा चुनाव के साल भर पहले विपक्षी दलों की एकता के मद्देनजर एनडीए के सहयोगी दलों के साथ मोदी-सरकार के रिश्तों का राजनीतिक स्टॉक दुरूस्त करने की गरज से भाजपा अध्यक्ष अमित शाह इन दिनों उन समस्याओं को टटोल रहे हैं, जो गठबंधन के आधार को कमजोर करती रही है। भाजपा की रणनीति में गठबंधन की राजनीति के लिए जरूरी लोकतांत्रिक लचीलापन हमेशा गैरहाजिर रहा है। उपचुनाव में चौदह में से ग्यारह सीटें हारने के बाद भाजपा का रुख बदला है, क्योंकि विपक्षी एकता का गणित परिस्थितियों को उलट भी सकता है। इन परिस्थितियों में भाजपा के लिए एनडीए की एकजुटता महत्वपूर्ण हो चली है।
अब गठबंधन को समेट पाना अमित शाह के लिए आसान नहीं है। चार साल तक संसद में भाजपा के 283 सीटों के बहुमत का गरूर झेलने के बाद एनडीए के ज्यादातर सहयोगी दलों का विश्‍वास दरक चुका है। बहुमत के गरूर में मोदी-सरकार अपने सहयोगी दलों को कमतर आंकती रही है। सहयोगी दलों के साथ यह गरूर मोदी-सरकार के खिलाफ विपक्षी दलों की एकता के मद्देनजर अब रणनीतिक दृष्टि से खतरनाक हो सकता है। विश्‍वास हासिल करने की ये कोशिशें अविश्‍वास की दरारों में उलझती नजर आ रही हैं। दिक्कतें भाजपा की खुद की पैदाइश हैं। अभी तक भाजपा ने सहयोगी दलों को सुना नहीं, और अब जब वह उनकी ओर हाथ बढ़ा रही है, तो वो उसका हाथ झटक रहे हैं।
शिवसेना से उसकी तकरार केन्द्र में मोदी-सरकार के गठन के साथ ही शुरू हो गई थी, जबकि बिहार में महागठबंधन तोड़ कर एनडीए में शरीक हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अवहेलना करने में भी मोदी-सरकार कभी पीछे नहीं रही। विशेष पैकेज के सवाल पर तेलुगू देशम का टूटना भी भाजपा के राजनीतिक हठीलेपन और गरूर का परिचायक है। बहुमत के गरूर में डूबी भाजपा अभी तक एक अजीबोगरीब राजनीतिक तहजीब के तहत काम करती रही है। इस रणनीति के तहत भाजपा सहयोगी दलों के साथ मान-मनौव्वल और सिर-फुटव्वल की रणनीति को एक साथ अंजाम देती रही है। राजनीतिक नफे-नुकसान की दृष्टि से वह सहयोगी दलों के साथ मान-मनौव्वल का व्यवहार करती थी, अन्यथा उनके साथ भाजपा की सिर-फुटव्वल चलती रहती थी। नीतीश कुमार और उद्धव ठाकरे से उसके नरम-गरम रिश्ते उसकी सिर-फुटव्वल और मान-मनौव्वल की अजब-गजब राजनीति का हिस्सा हैं। इस राजनीति की बानगी शिवसेना के प्रमुख उद्धव ठाकरे और भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह की ताजा मुलाकात है। एक ओर अमित शाह मान-मनौव्वल की राजनीति को आकार देने के लिए ठाकरे के घर पहुंच रहे हैं, वहीं शिवसेना का मुखपत्र सामना भाजपा से सिर-फुटव्वल की गहराई को रेखांकित कर रहा है। किसी भी राजनीतिक मुलाकात के पहले राजनीतिक शिष्टाचार की इतनी धज्जियां उड़ते कभी नहीं देखी गईं, जितनी कि उद्धव ठाकरे और अमित शाह की मुलाकात में देखने को मिल रही हैं। मुलाकात के पहले शिवसेना के मुखपत्र सामना के संपादकीय में वह तनाव स्पष्ट रूप से झलका, जो उनके बीच खाई बनकर बैठा है। इसी प्रकार अमित शाह बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से भी मिलने वाले हैं। नीतीश कुमार और अमित शाह की मुलाकातों का एजेण्डा तय होने के पहले ही जदयू ने घोषित कर दिया है कि चुनाव के दौरान एनडीए का चेहरा नीतीश कुमार होंगे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कद-काठी के लिहाज से जदयू के इस फैसले ने भाजपा के लिए सांप-छछून्दर की परिस्थितियां पैदा कर दी हैं।
वैसे भी देश में भाजपा की सफलताओं का जितना बड़ा आकार दिखाया जाता है, हकीकत में वह उतना बड़ा नहीं है। भले ही राजनीतिक वस्तुस्थिति को ’मेग्नीफाय’ करके यह बताया जाए कि देश के 29 में से 21 राज्यों में भाजपा का शासन है, जबकि महज 10 राज्यों में भाजपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकारें हैं। मेघालय में उसके 2 विधायक, बिहार में 253 में 53, जम्मू काश्मीर में 87 में 25, गोवा में 40 में से 13 विधायक भाजपाई हैं। देश में कुल 4139 विधानसभा सीटों में बीजेपी के पास 1516 सीटें ही हैं। इसमें भी 950 सीटें भाजपा ने मप्र, उप्र, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, राजस्थान में हासिल की हैं। बाकी 23 राज्यों में उसके पास मात्र 566 सीटें हैं। तमिलनाडु , आंध्र, केरल, पंजाब, बंगाल, तेलंगाना, उड़ीसा, नागालैंड जैसे राज्यों में उसकी गिनती उंगलियों पर हो सकती है। आंकड़ों की यह हकीकत दर्शाती है कि क्षेत्रीय दलों का साथ भाजपा के लिए कितना जरूरी है? अपने गरूर को झटक कर अमित शाह राजनीतिक तालमेल के लिए यूं ही नहीं निकल पड़े हैं?

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