क्या मतलब ऐसी सरकार का, जो कुछ भी सुनने को तैयार नहीं है?

जनता को यह सवाल शिद्दत से पूछना चाहिए कि ‘आखिर मतलब क्या है ऐसी ’सरकार’ का, जिसकी कोई सुनवाई नहीं होती है और मतलब क्या ऐसी ’सरकार’ का, जो कुछ भी सुनने को तैयार नहीं है’? प्रश्‍न का पूर्वार्ध दिल्ली की ’केजरीवाल-सरकार’ की ओर मुखातिब है, जबकि उत्तरार्ध केन्द्र की ’मोदी-सरकार’ को संबोधित करता है। ’बिटविन द लाइन्स’ बूझने और पूछने वाली बात यह है कि क्या देश के लोकतंत्र की गौरवशाली परम्पराओं के रोशन गलियारों में निरंकुशता की प्रेत-छाया ने पैर पसारने शुरू कर दिए हैं?
आगे सवाल यह है कि लोकतांत्रिक बिरादरी को दिल्ली की इस घटना पर कैसे रिएक्ट होना चाहिए कि केन्द्र सरकार द्वारा उप राज्यपाल के रूप में नियुक्त एक अधिकारी देश के चार बड़े राज्यों के मुख्यमंत्रियों की राजनीतिक हैसियत को नजरअंदाज करते हुए उन्हें उनके राजनिवास पर आंदोलनरत एक अन्य मुख्यमंत्री से मिलने की इजाजत नहीं दे? राजनीतिक आंदोलन लोकतंत्र की रक्तवाहिनी है। पक्ष-विपक्ष में आंदोलन की तनावपूर्ण राजनीति ही आम-जनता के मसलों को मुखरित करने का सबसे बड़ा हथियार है। यह तनाव ही लोकतंत्र की कमान को साधता है, आगे बढ़ाता है। बंगाल की ममता बैनर्जी, कर्नाटक के एचडी कुमार स्वामी, आंध्र के एन. चंद्राबाबू नायडू और केरल के पिनरायी जैसी हस्तियों को एक उपराज्यपाल द्वारा खाली हाथ लौटाना संवैधानिक प्रजातंत्र की सारी कसौटियों की नाफरमानी का अभूतपूर्व उदाहरण है। घटना पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की खामोशी असहज करती है। देश की लोकतांत्रिक सेहत के लिए ये अच्छे संकेत नहीं हैं।
केन्द्र सरकार की नाक के नीचे दिल्ली-प्रदेश की तिल जितनी सरकार के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अपने साथियों के साथ सात दिनों से लेफ्टिनेंट गवर्नर अनिल बैजल के दफ्तर में अपनी मांगों की आपूर्ति के लिए धरने पर बैठे हैं, वहीं दूसरी ओर भारत के लोकतांत्रिक महा-साम्राज्य के मालिक नरेन्द्र मोदी तक लोकतंत्र की इस बदहाली का ब्योरा पहुंच नहीं पा रहा है। अरविंद केजरीवाल की मांग है कि लेफ्टिनेंट गवर्नर दिल्ली सरकार की डोरस्टेप डिलीवरी की फाइल पर तत्काल दस्तखत करें। केजरीवाल की दिल्ली-सरकार के अधिकारियों से जुड़ी दूसरी मांग पर भी उप राज्यपाल खामोश हैं। आरोप है कि एलजी के अधीन वरिष्ठ अधिकारी केजरीवाल-सरकार से असहयोग कर रहे हैं। असहयोग के आरोपों में अतिरेक नहीं है। केन्द्र-सरकार की शह के बिना अधिकारियों की जुर्रत नहीं है कि वो इतना लंबा आंदोलन कर सकें।
एक आंदोलन की सुनी-अनसुनी और देखी-अनदेखी के इन विरोधाभासों के बीच सवालों का सिलसिला यों शुरू होता है कि क्या नरेन्द्र मोदी इस आंदोलन के नगाड़ों की आवाज सुन नहीं पा रहे हैं अथवा सुनने को तैयार नहीं हैं? भारतीय लोकतंत्र के पालक-अभिभावक होने के नाते यह बताना मोदी की जवाबदारी है कि वो इन सवालों पर मौन क्यों हैं? सवाल बड़े हैं और दहशत पैदा कर रहे हैं कि देश के नियंताओं के इस आचरण को लोकतंत्र की किन कसौटियों पर जांचा-परखा जाए। लोग अरविंद केजरीवाल पर भी सवाल उछाल रहे हैं, लेकिन सवालों की बड़ी ’बास्केट’ मोदी की टेबल पर रखी है। इनके जवाब सिर्फ उन्हीं के पास हैं। मोदी की चुप्पी हैरान करने वाली है।
दिल्ली को ठप करके आखिर मोदी क्या हासिल करना चाहते हैं? सर्वविदित है कि दिल्ली विधानसभा में भाजपा अपनी हार को अब तक भुला नहीं पाई है। हार का बदला दिल्ली की जनता से लेना भी मुनासिब नहीं है। हार-जीत से ही लोकतंत्र की आत्मा निखरती है। मोदी की इरादतन खामोशी प्रजातंत्र में जरूरी संवादों को पंगु बना रही है। इससे यह भी पता चलता है कि भारत के कर्णधारों की राजनीति कितनी बौनी होने लगी है? दिल्ली में केजरीवाल को असफल सिद्ध करने वाले इन राजनीतिक षड्यंत्रों में जो हथकण्डे अपनाए जा रहे हैं, वो लोकतंत्र के लिए घातक हैं। भाजपा को यह सोचना चाहिए कि केन्द्र में काबिज होने के कारण आज तो ब्यूरोक्रेसी का उपयोग उसको अच्छा राजनीतिक सौदा लग रहा है, लेकिन जब भाजपा सत्ता के बाहर होगी तब क्या होगा? दिल्ली प्रदेश में भाजपा की हार-जीत बहुत छोटा मसला है। बड़ा मसला यह है कि शासन-प्रशासन की लक्ष्मण रेखाएं टूट रही हैं। प्रशासन को राजनीतिक नेतृत्व के खिलाफ बगावत की यह सीख बौनी सोच को उजागर करती है। यह राजनीतिक- आत्मघात है।

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