प्रणव-प्रसंग (3) : ‘घर के चिराग’ ही कहीं जला न डालें कांग्रेस का आशियाना

जवाहरलाल नेहरू के राजनीतिक अवमूल्यन के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल के समकक्ष खड़े करना जहां संघ-जनित-भाजपा के एजेण्डे का पहला पाठ है, वहीं संघ के मंच पर प्रणव मुखर्जी को खड़ा करके गरजती तोपों की तरह उनका मुंह कांग्रेस की ओर मोड़ देना दूसरा पाठ है। राजनीति में सक्रिय, निष्क्रिय और तटस्थ, सभी किस्म के लोगों की मनोवैज्ञानिक स्थितियों को भुनाना गहरे सोच की अपेक्षा रखता है। संघ और भाजपा ने इसे भुनाने के मामले में काफी परिपक्वता का परिचय दिया है। प्रणव दा की कुंठाओं को समझने के लिए गहरे शोध की जरूरत नहीं है। आत्म-कथा के दोनों संस्करणों में प्रणव दा ने खुलकर अपना दर्द बयां किया है।
वैसे भी पच्चीस-तीस सालों के दरम्यान कांग्रेस की रीति-नीतियों में पले-पगे राजनेताओं की पकी कहानियों का सिला कुंठाओं और अन्याय की धारणाओं से परिपूर्ण है। प्रणव मुखर्जी ही नहीं, शरद पंवार, माखनलाल फोतेदार, नटवर सिंह जैसे नेताओं की आत्मकथाओं में भी गांधी-नेहरू परिवार के प्रति एक कसक और कसैलेपन के कटु मनोभावों की सिसक-सी सुनाई पड़ती है। इन नेताओं की नियति कांग्रेस थी, इसलिए ये लोग सत्ता के आकाश-दीपों के इर्दगिर्द परवानों की तरह कांग्रेस के ’ऑर्बिट’ में ही उड़ान भरते रहे। राजनीतिक अरमानों के इम्तिहान में ये नेता कृपांक जरूर पाते रहे, लेकिन पीएमओ में दाखिले की पात्रता कभी भी हासिल नहीं कर पाए।
राजीव गांधी के सत्तारोहण के वक्त भी प्रणव दा प्रधानमंत्री बनना चाहते थे। इस मुद्दे पर राजीव गांधी के साथ मतभेदों के कारण प्रणव दा को कांग्रेस से भी बाहर होना पड़ा था। उनके मन में प्रधानमंत्री बनने की तमन्ना उनके राष्ट्रपति बनने तक अंगड़ाई लेती रही। प्रणव दा ने अपनी किताब ’द कोलिशन इयर्स (1996-2012)’ में मंजूर किया है कि 2004 में प्रधानमंत्री बनने की उनकी महत्वाकांक्षाएं पूरे परवान पर थीं। उन्हें लगता था कि सरकार और संगठन चलाने की राजनीतिक योग्यता और अनुभव के कारण प्रधानमंत्री पद के लिए वो सोनिया गांधी की पहली पसंद होंगे। उन्हें भरोसा था कि सोनियाजी मनमोहन सिंह को राष्ट्रपति और उन्हें प्रधानमंत्री बनाएंगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। दिलचस्प यह है कि ’द कोलिशन-इयर्स’ के विमोचन समारोह में खुद मनमोहन सिंह ने यह स्वीकार किया कि प्रणव दा प्रधानमंत्री बनने के मामले में उनसे ज्यादा योग्य थे।
इसी प्रकार अपनी किताब ’द एक्सीडेंटल प्राइम-मिनिस्टर’ में मनमोहनसिंह के मीडिया सलाहकार संजय बारू ने भी लिखा है कि सोनिया गांधी की जिद के कारण प्रणव मुखर्जी दो बार प्रधानमंत्री बनते-बनते रह गए। संघ और भाजपा प्रणव दा के इस दर्द को जानते हैं कि प्रधानमंत्री बनना उनकी राजनीति का एजेण्डा था।
नेताओं के मनोभावों में अन्याय की अनुभूति उन्हें विरोधियों का ’सॉफ्ट-टारगेट’ बना देती है। उनके खंडित आत्म-सम्मान को सहलाने वाले सभी अवसर उन्हें विगलित अथवा भ्रमित कर देते हैं। प्रणव मुखर्जी के आसपास सद्भावना की घेराबंदी का उदाहरण वह पत्र भी है, जो प्रधानमंत्री मोदी ने उनकी राष्ट्रपति पद से निवृत्ति के वक्त लिखा था। यह पत्र खुद मुखर्जी ने जारी किया था। मोदी ने उन्हें पितातुल्य संबोधित करते हुए लिखा था कि- ’’जब मैं दिल्ली आया तो बाहरी था। इस चुनौतीपूर्ण दौर में आप मेरे लिए पिता और मार्गदर्शक रहे।’’ पत्र के भावपूर्ण कंटेंट से अभिभूत मुखर्जी ने पत्र जारी करते हुए लिखा था कि ’इस पत्र ने मेरे दिल को छू लिया है।’
सिद्धांतों और राजनीतिक कर्म की भावभूमि पर अपने धुर विरोधी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी की सार्वजनिक जुगलबंदी ने कांग्रेस के आंगन में खदबदाती महत्वाकांक्षाओं को संगठनात्मक चुनौतियों में तब्दील कर दिया है। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी का राजनीतिक तजुर्बा कसौटी पर है कि वो कैसे उन नेताओं की उड़ान को दिशा देंगे, जो यह मानते हैं कि उन्हें उनका जायज राजनीतिक प्रतिसाद नहीं मिल पा रहा है? भाजपा ऐसे कांग्रेसियों की मौन महत्वाकांक्षाओं को मुखरता देने की राजनीति कर रही है। उम्रदराज कांग्रेस इस वक्त अपेक्षाकृत कम अनुभवी और कम-उम्र नेतृत्व में आगे बढ़ रही है। भाजपा के लिए यह अनुकूल राजनीतिक समय है, जबकि वह कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की ’ऑफ द रिकॉर्ड’ कुंठाओं को, अफवाहों, अनुमानों और अंदेशों की धुंध को गहरा करे।
प्रणव-प्रसंग में भाजपा को आरएसएस की खुली मदद के मायने गहरे और दूरगामी हैं। स्वतंत्रता आंदोलन में कांग्रेस के योगदान को लोगों के जहन से मिटाना संभव नहीं है। कांग्रेस की धुरी नेहरू-गांधी परिवार है। धुरी को अस्थिर करने के लिए कांग्रेस की जमीन में अविश्‍वास और अन्तर्विरोधों की सुरंगें बिछाई जा रही हैं। राहुल गांधी को सतर्क रहना होगा कि उनके घर के चिराग ही कहीं उनका आशियाना नहीं जला डालें…? (समाप्त)

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