संत कबीर के प्रति भाजपा के ‘राजनीतिक-ममत्व’ के मायने

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राम की अयोध्या से तुलसी की राम-धुन के साथ बनारस में कबीर की निर्गुण भजनों की जुगलबंदी को सुनिश्‍चित करके उप्र में भाजपा ने लोकसभा चुनाव का आगाज कर दिया है। उप्र में भाजपा के चुनाव-प्रबंधों को अमलीजामा पहनाने के लिए मोदी ने मगहर में कई योजनाओं की घोषणा की है। समाज की नैसर्गिक कुरूपताओं और स्वाभाविक विरोधाभासों के खिलाफ नसीहतों की अखंड ज्योति की तरह प्रज्वलित महान कवि संत कबीर की निर्वाण स्थली मगहर में उनके 500वें निर्वाण दिवस पर मोदी ने कबीरदास अकादमी की शिलान्यास करके कबीर-पंथ के लाखों फॉलोअर्स को समेटने की कोशिश की है। गोरखपुर और लखनऊ के बीच पड़ने वाले मगहर की सीमाएं मोदी के निर्वाचन क्षेत्र वाराणसी से भी सीधी जुड़ी हैं।
संत कबीर नगर के जिला मुख्यालय से पांच किलोमीटर दूर बसा यह छोटा सा कस्बा बुनकर बहुल क्षेत्र है। कबीर ने वाराणसी में निधन के बाद मुक्ति से जुड़ी वर्जनाओं को तोड़ने के लिए अपने अंतिम संस्कार के लिए मगहर को चुना था। उस वक्त यह किंवदंती प्रचलित थी कि मगहर में  देह त्यागने वाले लोगों को कभी भी मोक्ष नसीब नहीं होता है। उन्हें नरक ही मिलता है। इस वजह मगहर को नरक का द्वार भी कहा जाता था।
कबीर के प्रति प्रधानमंत्री मोदी के मन में छलक रहा राजनीतिक ममत्व उनके साहित्यिक-रूझान का प्रतिसाद नहीं है। कबीर जाति से जुलाहे थे और बनारस के लगे लल्लापुर, अलईपुर, बजरडीहा जैसे कस्बों में चौंतीस हजार बुनकर केन्द्र विभिन्न समस्याओं से जूझ रहे हैं। केन्द्र और राज्य की भाजपा सरकारें जुलाहों अथवा बुनकरों के सवालों का हल करने में लगभग असफल सिद्ध हुई हैं। यह असफलता चुनाव में भाजपा को भारी पड़ सकती है। मोदी के लिए यह क्षेत्र इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उनके लोकसभा क्षेत्र वाराणसी के मतदाताओं में जुलाहों की संख्या को नजर अंदाज करना खतरनाक है। जुलाहों  की बिरादरी वाराणसी के अलावा भी कई विधानसभा क्षेत्रों पर असर रखती है। चौबीस करोड़ की लागत से बनने वाली कबीर रिसर्च इंस्टीट्यूट की नींव के पीछे की राम कहानी यही है कि किसी भी तरीके से देश भर में फैले कबीरपंथियों को भाजपा के झंडे तले इकट्ठा किया जाए। इन राजनीतिक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए प्रधानमंत्री मगहर में  स्पिनिंग मिल को दुबारा शुरू करने के लिए 400 करोड़ रूपए के प्रोजेक्ट मंजूर कर चुके हैं।
कहना मुश्किल है कि प्रधानमंत्री मोदी के राजनीतिक एजेण्डे पर कबीर का आना कबीर के मुरीदों के लिए खुशखबर है अथवा खुशखबर नहीं है, क्योंकि इन्सानी जज्बे से जुड़े कबीर का फलसफा भाजपा के सोच-विचार से मेल नहीं खाता है। कबीर ताउम्र हिंदू-मुसलमानों के बीच मेल की बात करते रहे। समाज के इस विभाजन को हमेशा पाटने की कोशिश करते रहे। भाजपा अपने राजनीतिक एजेण्डे में मुसलमानों को लगभग खारिज कर चुकी है। यह सवाल अपने उत्तर ढूंढ रहा है कि कट्टरता की राहों पर चलने वाली भाजपा अपने राजनीतिक व्यवहार में कबीर के विचारों के साथ कैसे सामंजस्य बिठा पाएगी?
मोदी ने इस बहाने उप्र के राजनीतिक-समीकरणों में उफनते जातीय उन्माद और सामाजिक विभाजन के उन मुद्दों के एड्रेस करने की कोशिश की है, जो लोकसभा चुनाव में भाजपा के लिए मुश्किलें पैदा कर सकते है। मगहर का अपना राजनीतिक वजूद है। मोदी ने भाषण में कबीर के जीवन-दर्शन को अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की शब्दावली में ढाल कर विपक्ष पर प्रहार किये। कबीर की अभिव्यक्तियों की साफगोई किसी को भी यह इजाजत नहीं देती है कि वह उनका पुनर्वाचन कर सके। कबीर की फिलॉसफी का यह राजनीतिक तर्जुमा हैरान करता है कि जो राजनीति कबीर के नाम पर शुरू हुई है, वह उनकी मीमांसाओं को कहां ले जाकर छोड़ेगी? कबीर के अंदाजे-बंया में राजनीतिक घालमेल चिंताजनक है। राजनीति के दुष्चक्र में फंसे कबीर कहीं यह नहीं कहने लगे कि ’कबीरा खड़ा बाजार में, सबकी नहीं, खुद की मांगे खैर…।’  कबीर के निर्वाणोत्सव में  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का यह कथन गहन अन्वेषण की मांग करता है कि  ’उनके सपनों के न्यू इंडिया की संरचना कबीर के उस समतामूलक समाज का मूर्त रूप है, जो उनकी वाणियों मे ध्वनित होता रहा है।’ राजनीति से अलग दुनियादारी के बाजार में अकेले खड़े कबीर को शायद ही यह आभास रहा होगा कि पांच सौ साल बाद एक ऐसा दौर भी आएगा, कि कबीर वाणी का इस्तेमाल राजनीति की तिजारत के लिए किया जाएगा।

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