सत्ता की थाप पर थिरकती ‘डर्टी-पोलिटिक्स’ से पस्त लोकतंत्र

पता नहीं, आम लोग खुद से और सत्ता के सूत्रधारों से यह सवाल क्यों नही पूछते कि एक भूतपूर्व मुख्यमंत्री क्या इतना कंगाल हो सकता है कि उसे अपना बंगला खाली करते वक्त उसके नलों की टोटियां और टाइल्स भी उखाड़ कर ले जाना पड़े अथवा क्या इस सामान का दुबारा उपयोग हो सकता है? मीडिया के गलियारों में उत्तर प्रदेश सरकार का यह प्रचार जबरदस्त सुर्खियां बटोर रहा है कि राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अपना पुराना बंगला खाली करने के पहले उसमें तोड़फोड़ करके काफी सरकारी सामान ले उड़े हैं। यह अच्छी बात है कि अखिलेश यादव बंगले में तोड़फोड़ और चोरी के इन आरोपों के खिलाफ खम ठोक कर मैदान में उतर आए हैं। किसी भी राजनेता को बदनाम करने वाली इन हरकतों का मुकाबला पूरी शिद्दत के साथ करना चाहिए।
यह सवाल बड़ा है कि एक पूर्व मुख्यमंत्री पर नल की टोंटी चुराने, टाइल्स उखाड़ने अथवा एअर कंडीशनर के तार और पाइप चुराने के इन आरोपों को राजनीतिक-गुणवत्ता की किस पायदान पर रखा जाए? एक सोशल वेबसाइट कह रही है कि उस मुख्यमंत्री निवास पर सौ एयर-कंडीशनर लगे थे। टीवी स्क्रीन पर समाजवादी नेता पर यह आरोप भी लग रहे हैं कि वो 21 करोड़ का सरकारी फर्नीचर भी अपने साथ उठा ले गए हैं। बंगले के रखरखाव पर उप्र सरकार ने 42 करोड़ रुपए खर्च किए थे।
बंगले में तोड़फोड़ और चोरी-चकारी के इन आरोपों को सिलसिलेवार ऱखा जाए तो यह साफ हो जाएगा कि अखिलेश यादव पर आरोपों का यह पुलिंदा योगी-सरकार का प्रायोजित कुप्रचार है। इसका दिलचस्प पहलू यह है कि उप्र के राज्यपाल राम नाइक ने चिट्ठी लिखकर मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी को हिदायत दी है कि बंगलों की देखरेख का काम करदाताओं के पैसे से होता है। बंगले को नुकसान पहुंचाने का यह कृत्य गंभीर है। इस पर कड़ी कार्रवाई होना चाहिए।
इन आरोपों पर अखिलेश यादव का जवाब है कि सरकार के इशारे पर कुछ अधिकारी यह कुप्रचार कर रहे हैं। सरकार उन चीजों की इंवेन्ट्री दे, जो सरकारी तौर पर बंगले में लगाई गई थीं। यदि उस सूची में कुछ गायब है तो वो उसके लिए जिम्मेदार होंगे। वो अपने निजी सामान के अलावा बंगले का कोई भी सरकारी सामान नहीं ले गए हैं। यह आरोप भी हास्यस्पद है कि उन्होंने स्वीमिंग-पूल को मिट्टी से भर दिया। अधिकारियों पर अखिलेश यादव ने कटाक्ष किया कि जो अधिकारी योगी-सरकार को खुश करने के लिए नलों की टोंटियां ढूंढकर ला रहे हैं, वही हमारी सरकार आने पर चिलम ढूंढ कर मीडिया के सामने पेश कर देंगे। फूलपुर और गोरखपुर की हार से बौखलाई भाजपा-सरकार उन्हें बदनाम करने के लिए ये आरोप लगा रही है।
आरोपों का गहन परीक्षण इसलिए जरूरी है कि यह मसला राजनेता और राजनीति की विश्वसनीयता से जुड़ा है, जो लोकतंत्र की बुनियाद है। हाल ही में सम्पन्न विधानसभा और लोकसभा चुनाव के मद्देनजर यह सवाल मौजूं हो चला है कि भारतीय राजनीति कौन सी स्थितियों से गुजर रही है? सत्ता के डमरू पर कठपुतलियों की मानिन्द नाचती राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्थाएं लोकतंत्र के लिए कितनी हानिकारक है? उसके दूरगामी परिणाम क्या होने वाले हैं?
देश के कर्णधारों को इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करना होगा कि सोशल मीडिया पर कुलांचे भरती ‘डर्टी-पोलिटिक्स’ का अंतिम मुकाम अथवा ‘डेड-एण्ड’ कहां है और वह कब आएगा? देश के राजनेता अब राजनीतिक सिध्दांतों पर शास्त्रार्थ करते कदाचित ही नजर आते हैं। पहले तो चुनाव अभियान के दौरान घपले और घोटालों के नाम पर निम्नस्तरीय बयानबाजी सुनने को मिलती थी। इन दिनों चरित्र हत्या राजनीति का सामान्य व्यवहार होता जा रहा है। पहले पक्ष-विपक्ष के नेता एक-दूसरे पर ‘बिलो-द-बेल्ट’ हिट करने में संकोच करते थे, जबकि इऩ दिनों चरित्र-हनन राजनीति का मुख्य हथियार बनता जा रहा है। चरित्र हत्या की यह राजनीति नेताओं के लिए तालियां बटोरती है, टीवी चैनलों के लिए टीआरपी जुटाती है, आम जनता के लिए ‘क्राइसेस’ परोसती है…। सत्ता की हवस में चरित्र हत्या की डर्टी पोलिटिक्स का सिलसिला खतरनाक होता जा रहा है।

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