सिक्स पैक्स बनाम चौबीस पसली : गरीब बनाता इलाज-खर्च

इन दिनों, जबकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सहित कार्पोरेट जगत की जानी मानी हस्तियां सोशल मीडिया पर एक-दूसरे को चुनौती देते हुए ’हम फिट तो इंडिया फिट’ अभियान के तहत पूरे भारत को स्वस्थ अथवा फिट बनाने में जुटी हैं, हिंदी के महाकवि पंडित सूर्यकांत निराला की पचास-साठ साल पुरानी दो कविताएं ’भिखारी’ और ’वह तोड़ती पत्थर’ मेरे जहन को बरबस कुरेदने लगती हैं। इन कविताओं का स्थायी भाव वह भूख और संघर्ष है, जो जिंदगी की रिक्तताओं में खौलते हुए भाप बनकर लापता हो जाता है।
निराला की यह अतुकांत अभिव्यक्ति हर उस वक्त दिलो-दिमाग को उद्वेलित करने लगती है, जबकि अमीरी की सल्तनत में गरीबी के सवाल मखौल बन जाते हैं। वैसे भी गरीबी और बीमारी समान अनुपात में एक दूसरे से होड़ करते हैं। ज्योतिष की भाषा में गरीबी और स्वास्थ्य शत्रु-ग्रहों के स्वामी हैं।
इस प्रसंग में निराला की भिक्षुक कविता के छंद की यह पंक्ति ’पेट-पीठ दोनों हैं मिलकर एक’ फिटनेस की बासंती फिजाओं में फिल्म स्टार सलमान खान के सिक्स-पैक्स अथवा प्रधानमंत्री के सीने के छप्पन इंचों की गिनती के समानान्तर उन गरीब अल्पपोषित लोगों की चौबीस पसलियों को गिनने पर भी विवश करती है, जो लाइलाज बीमारियों की गिरफ्त में हैं अथवा कुपोषण का शिकार हैं। यदि रेबिन के चश्मों को उतारकर देखें तो पता चलेगा कि फिटनेस के इस ड्रीम-वर्ल्ड की तुलना में कमजोर शरीर की चौबीस पसली वाले करोड़ों कुपोषितों की दुनिया का दर्द, उनकी कमजोरी, उनकी मजबूरी और उनकी बीमारियों का इंडेक्स ज्यादा भयावह और चिंताजनक है।
इससे भी आगे, त्रासदी यह है कि भारत में आम लोगों में इतना सामर्थ्य भी नहीं है कि वो अपने बलबूते पर गंभीर बीमारियों से लड़ सकें और अपना इलाज करा सकें। भारत में स्वास्थ्य के देखभाल की परिस्थितियां दयनीय और डरावनी हैं। भारतीय पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन के तीन विशेषज्ञों द्वारा किए गए एक अध्ययन के मुताबिक हर साल करीब 5.5 करोड़ भारतीय अपनी बीमारियों पर होने वाले खर्च के कारण गरीब होते जा रहे हैं।
अध्ययन के मुताबिक इनमें 3.8 करोड़ लोग महज अपनी दवाइयों पर होने वाले खर्च के कारण गरीबी की रेखा के नीचे आ गए हैं। ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय लोगों के लिए कैंसर, हार्ट-डिसीज और डायबिटीज की दवाइयों पर होने वाला खर्च असहनीय है। कैंसर की बीमारी का खर्च तो इतना भारी है कि एक सक्षम व्यक्ति भी आर्थिक-बदहाली के कगार पर पहुंच जाता है। एक्सीडेंट का शिकार कमजोर तबके के लिए अस्पताल का खर्चा उन्हें जिंदगी से भी ज्यादा भारी महसूस होता है।
देश के करोड़ों लोगों को गरीबी की ओर ढकेलती बीमारियों का यह कच्चा चिठ्ठा केन्द्र और राज्य-सरकारों के उन दावों को झुठलाता है, जो फिटनेस और आरोग्य के नाम पर लोगों के बीच किए जाते रहे हैं। भारतीय पब्लिक हेल्थ फाउण्डेशन ने यह विश्‍लेषण 1993-94 से 2011-12 तक देशव्यापी उपभोक्ता सर्वेक्षणों के आंकड़ों और 2014 में सम्पन्न नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गेनाइजेशन के सामाजिक उपभोक्ता सर्वेक्षण के आधार पर किया है।
यह खुलासा इसलिए भी चिंताजनक है कि सरकारें दवाइयों और स्वास्थ्य पर होने वाले खर्चों को नियंत्रित करने के उपाय लागू करने में असफल सिद्ध हुई हैं। ड्रग मूल्य नियंत्रण आदेश 2013 की प्रभावशीलता सवालिया बनी हुई है। केन्द्र सरकार और राज्य-सरकारों की बड़बोली स्वास्थ्य बीमा योजनाओं का कोई सीधा लाभ लोगों को नहीं मिल पा रहा है। वोट जुटाने के लिये सरकारों द्वारा की जाने वाली लोक-लुभावन घोषणाएं और नीतियां, नियम-कायदों के बीहड़ों में गुम सी हो जाती हैं। ब्यूरोक्रेसी भी इस मामले में काफी गैर-जिम्मेदार सिद्ध हुई है।
सर्वेक्षण के अनुसार सरकार की सबसे महत्वाकांक्षी योजना जन औषधि स्टोर्स का प्रयोग लगभग असफल हो चुका है। योजना के अनुसार जन औषधि स्टोर्स में 600 तरह की दवाइयां उपलब्ध होना चाहिए, लेकिन फिलवक्त मरीजों को बमुश्किल सौ-डेढ़ सौ दवाइयां उपलब्ध हो पा रही हैं। सिक्स पैक्स बनाम चौबीस पसली का यह विरोधाभास केन्द्र और राज्य सरकार की कथनी और करनी को नंगा करता है। इस मुद्दे पर विचार जरूरी है कि मुफलिसी की महामारी के गले में फिटनेस का लॉकेट कितना और कैसे सजेगा? वैसे इंडिया के फिट रहने पर किसी को ऐतराज नहीं है, लेकिन भारत कैसे स्वस्थ रहेगा, यह सोचना भी जरूरी है।

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