‘अमीरी के लिए ‘बेस्ट-माइण्ड्स’ की खरीद-फरोख्त सबसे बडी चिंता’

जाने माने टेक्नोक्रेट सैम पित्रोदा ने आगाह किया है कि समाज के सामने सबसे बड़ी चुनौती देश के सर्वोत्तम मस्तिष्कों को सामाजिक सरोकारों से जोड़ने की है। रविवार 15 जुलाई, 2018 को कर्णावती विश्वविद्यालय की यूथ-पार्लियामेंट में युवाओं को संबोधित करत हुए सैम पित्रोदा ने कहा कि ‘दुनिया के सामने समस्या यह है कि देश और दुनिया के ‘सर्वश्रेष्ठ मस्तिष्क’ इन दिनो सिर्फ अमीरों की समस्याएं सुलझाने में लगे हैं। यह भविष्य के लिए चिंताजनक है, क्योंकि ‘बेस्ट माइण्ड्स’ की बदौलत जहां अमीरों की दुनिया में हम बहुत अधिक खरबपति पैदा कर लेंगे, वहीं बड़ी आबादी गरीबी की अंधेरी दुनिया में भटकती रहेगी’। सैम का संबोधन युवाओं के लिए ‘रोजगार और उद्यमशीलता’ पर केन्द्रित था। वैसे प्रधानमंत्री मोदी के लिए सैम पित्रोदा की यह थ्योरी इसलिए भी गौरतलब नहीं होगी कि वो ‘प्री-मोदी इरा’ की उन कांग्रेस-नीत सरकारों के प्रतिनिधि हैं, जिन्होंने इस देश की जमीन पर सिर्फ अंधेरे की फसलें उगाई हैं।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सत्तारोहण के बाद देश की विकास-गाथा में एक नये सिध्दांत का प्रतिपादन हुआ है कि विकास के नाम पर जो कुछ दिख रहा है, वो पिछले चार साल की देन है। इसे ‘मोदी-थीसिस’ भी कहा जा सकता है। मोदी-थीसिस कहती है कि ‘प्री-मोदी इरा’ याने 2014 के पहले याने 15 अगस्त 1947 से 26 मई 2014 तक बीते 70 सालों में देश में अंधा-युग था। ‘पोस्ट-मोदी इरा’ याने 26 मई 2014 के बाद ‘पोस्ट-मोदी इरा’ के इतिहासकार नए सिरे से देश के विकास की कहानी लिख रहे हैं। सैम पित्रोदा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के डिजीटल-इंडिया के चंद्रमा पर दाग के समान हैं, जो चंद्र-कलाओं के साथ गहरा होता जाता है। ‘प्री-मोदी इरा’ याने मोदी के पूर्वोत्तर-काल में विकास के अंधे युग में सैम पित्रोदा को डिजीटल-इंडिया का पितामह माना जाता था। उनके साथ यह प्रतिष्ठा भी जुड़ी है कि उन्हें भारतीय सूचना क्रान्ति का अग्रदूत भी कहा जाता है। तथाकथित अंधे युग का प्रतिनिधित्व करने वाले सैम पित्रोदा की यह बात चुभने वाली है कि मंदिर, धर्म और जाति पर होने वाले फसाद से युवाओं के लिए रोजगार के अवसर सृजित नहीं होंगे। इसके लिए तर्कसम्मत वैज्ञानिक-दृष्टिकोण की आवश्यकता होगी।
जाने-माने भारतीय आविष्कारक, कारोबारी और नीति-निर्माता सैम पित्रोदा का नाम राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में अभी तक पूरी तरह नहीं बुझा है। उसकी बौध्दिक-लौ अभी भी प्रज्‍ज्‍वलित है। सब उसका लोहा भी मानते हैं। 4 मई 1942 में उड़ीसा के ततलागढ़ जिले में जन्मे सैम पित्रोदा का पूरा नाम सत्यनारायण गंगाराम पित्रोदा है। सैम पित्रोदा ने हकीकत का आईना समाज के सामने पेश किया है लेकिन मौजूदा सल्तनत हिन्दुत्व की ओट में अपने दागों को पढ़ना नहीं चाहती है। सैम पित्रोदा ने अमीरों की तामीर में जुटे देश के बेस्ट-माइण्ड्स की उपलब्धियों का जब जिक्र किया तो जहन में आए दिनों जारी होने वाली विश्व की वित्तीय एजेन्सियों की वो रिपोर्टें ताजा हो उठीं जिसमें बड़े घमण्ड से यह बताया जाता है कि देश में अरबपतियों की संख्या में इजाफा हो रहा है। न्यू वर्ल्ड वेल्थ की रिपोर्ट ने पिछले साल खुलासा किया था कि भारत की 73 प्रतिशत संपत्ति 1 प्रतिशत लोगों के पास है।
फोर्ब्स इंडिया ने भारत के 2017 के सबसे बड़े अमीरों की सूची जारी करते हुए टिप्पणी की थी कि भले ही देश की अर्थ-व्यवस्था कमजोर हो रही है, लेकिन यहां के अमीर और अमीर होते जा रहे हैं। भारत के 100 सर्वाधिक अमीरो में मुकेश अंबानी का नाम सबसे ऊपर है। मुकेश अंबानी की कुलांचे मारती अमीरी के दूसरे किनारे पर गरीबी की हकीकत डराने वाली है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के मुताबिक अगले तीन सालों में भारत में बेरोजगारों की संख्या तेजी से बढ़ने वाली है। भारत के अंदर दो देश पल रहे हैं, एक अमीर देश है, जिसके आगे स्वर्ग का ऐश्वर्य भी फीका नजर आता है। दूसरी ओर देश के पचहत्‍तर प्रतिशत याने लगभग सौ करोड़ गरीब, किसान, खेतिहर मजदूर हैं, जिनके लिए दो जून रोटी जुटाना भी मुहाल है। रोशनी में बैठी सरकारों के लिए अंधरे में बैठे इन गरीबों की ओर भी देखना जरूरी है।
सैम पित्रोदा अमीरों व्दारा बेस्ट-माइण्ड्स के इस्तेमाल को लेकर यूं ही चिंतित नहीं हैं। देश की मौजूदा सल्तनत इन अमीरों को सर्वश्रेष्ठ मस्तिष्कों की खऱीद-फरोख्त का लायसेंस उपलब्ध करवा रही है। मोदी-सरकार ने हाल ही में जिस अस्तित्वहीन जियो-यूनिवर्सिटी को सर्वोत्कृष्ट संस्थान का दर्जा दिया है, उसे यह अधिकार होगा कि वो दुनिया में कहीं भी टेलेण्ट-हण्ट कर सके और अपने हिसाब से उसका उपयोग कर सके।

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