‘आप’ के ‘बॉस’ बनने से कुछ नही होगा, क्योंकि ‘बिग-बॉस’ नाराज हैं

भाजपा, कांग्रेस सहित आम आदमी पार्टी के सभी विरोधियों ने तय कर लिया है कि वो दिल्ली-सरकार और उप राज्यपाल के बीच अधिकारों की जंग में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को उन व्याख्याओं के साथ नहीं पढ़ेंगे, जो संविधान पीठ के पांच जजों की मंशाओं को व्यक्त करती है। फैसले के बाद दिन भर की राजनीतिक चर्चाओं को सुनने के बाद लगा कि ‘आप’ विरोधी राजनेता सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक जजमेंट को खुले मन से पढ़ने और उसके अनुसार काम करने को तैयार नहीं हैं। कारण साफ है कि इस फैसले में भाजपा और कांग्रेस को आम आदमी पार्टी की हार-जीत की शक्ल दिखाई पड़ने लगी है, जो उन्हें बेचैन कर रही है। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता में गठित संविधान पीठ के जजमेंट का कार्यकारी निर्देश यह है कि ”केन्द्र-सरकार निर्वाचित सरकार की इज्जत करे। उसे जनादेश के मुताबिक काम करने दे। उप राज्यपाल को कैबिनेट की सलाह पर काम करना चाहिए। दिल्ली-सरकार भी केन्द्र-सरकार के संवैधानिक-अधिकारों एवं दायित्वों का सम्मान करे”।
संविधान पीठ ने सवा दो सौ पेज के फैसले में उस मकड़-जाल को साफ करने की कोशिश की है, जो संविधान की व्याख्याओं में उलझनें पैदा करता रहा है। ‘आम आदमी पार्टी’ के समर्थक और विरोधी इन व्याख्याओं में वो तर्क ढूंढ रहे हैं, जो यह स्थापित कर सकें कि इस फैसले से अरविंद केजरीवाल को कुछ हासिल नहीं हुआ है और कोर्ट ने यथास्थिति को शब्दों का नया जामा पहना कर आम जनता के सामने खड़ा कर दिया है। राजनेताओं का अपना अक्षर-ज्ञान होता है और राजनीतिक पार्टियों की अपनी बारहखड़ी होती है। उनके राजनीतिक-व्याकरण के अपने ‘स्वर’ और अपने ‘व्यंजन’ होते हैं। ‘स्वर’ और ‘व्यंजन’ की आपाधापी में पहले शब्दों की हत्या होती है और उसके बाद अभिव्यक्ति आत्म-हत्या कर लेती है। नतीजतन भावनाएं भूत की सवारी करने लगती हैं। बुधवार को दिल्ली और केन्द्र सरकार के बीच अधिकारों की इस जंग में जैसे ही सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया, टीवी चैनलों की स्क्रीनों पर आजादी के बिगुल बजने लगे, विचारों की दुन्दुभी गूंज उठी और प्रवक्ताओं के वेश में पार्टी के हरकारे सिध्दांतों का झोला उठाकर अपना संदेश देने निकल पड़े। टीवी स्क्रीनों पर इस खबर के विज्ञापनी-शीर्षक ‘दिल्ली का बॉस कौन…?’ सर्फ या टीनोपॉल की चमकार के विज्ञापनों जैसे सितारे फोड़ती इस ब्रेकिंग-न्यूज की हेड-लाइन्स का कुहराम विचारों की श्रृंखला को दहलाता अथवा धमकाता महसूस हो रहा था।
शोर के बीच सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर पार्टियों के बीच विरोधाभास गहराने लगे हैं। कोई भी हार मानने को तैयार नही हैं। अरविंद केजरीवाल भले ही इसे अपनी नैतिक विजय मानें, लेकिन इससे दिल्ली की राजनीतिक स्थिति में कोई सुधार होने वाला नहीं हैं। भाजपा के प्रवक्ता नलिन कोहली की प्रतिक्रिया से साफ है कि फैसले से केन्द्र सरकार के रुख में कोई बदलाव नहीं आएगा। कोहली का कहना है कि ‘समझ से परे है कि दिल्ली सरकार इसे कैसे अपनी जीत बता रही है? भाजपा के रुख को सुप्रीम कोर्ट ने एन्डोर्स किया है। अदलत ने उनके मुख्य मुद्दे को मान्य नहीं किया है कि दिल्ली एक पूर्ण राज्य है। कोर्ट ने इन दलीलों को भी नहीं माना है कि उनके पास विशेष कार्यकारी अधिकार हैं। दिल्ली एक केन्द्र शासित प्रदेश है, जहां केन्द्र को ही भूमिका अदा करनी है।’ कांग्रेस की ओर से दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की ढीली-ढाली प्रतिक्रियाओं की सेण्ट्रल-थीम यह थी कि ‘यदि केजरीवाल उप-राज्यपाल के साथ मिल कर काम नहीं करेंगे, तो दिल्ली की जनता का बड़ा नुकसान करेंगे।’
वैसे आम आदमी पार्टी के लिए यह फैसला जश्न का सबब इसलिए है कि सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार के रोजमर्रा के कामों में उप राज्यपाल का दखल खत्म कर दिया है। उप राज्यपाल को स्प्षट हिदायतें हैं कि वो संविधान प्रदत्त अधिकारों की सीमाओं का उल्लंघन नहीं करें। जरूरत होने पर वो विवादास्पद मसले राष्ट्रपति को प्रेषित करें। सभी जानते हैं कि केन्द्र सरकार उप राज्यपाल के माध्यम से केजरीवाल के हर काम में व्यवधान पैदा कर रही थी। यह रुकावट दिल्ली विधानसभ चुनाव में हार का प्रतिशोध था। भाजपा यह बात पचा नहीं पा रही थी कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पुरजोर कोशिशों के बावजूद उसे यहां हार का मुंह देखना पड़ा था। लगता नहीं है कि हर कीमत पर चुनाव में विजय हासिल करने की चाह पालने वाले नरेन्द्र मोदी या अमित शाह अपनी हार को भुला पाएंगे? यह अतिशय आशावाद है कि दिल्ली के हालात सुधरेंगे और भाजपा ‘डिफेंसिव-मोड’ में आ जाएगी। दिल्ली में राजनीति का यह प्रपंच यूं ही चलता रहेगा…। केजरीवाल के दिल्ली के बॉस बनने के बाद भी अड़चनें खत्म नहीं हुई हैं, क्योंकि बिग-बॉस तो अभी भी नाराज हैं…।

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