कट्टरता के ‘हिम-शिखरों’ से भाजपा के बेस-कैम्पों पर भी खतरा

कट्टरता के हिमशिखरों के विखंडन ने अब भारतीय जनता पार्टी के बेस-कैम्पों में निर्मित उन हवन-कुंडों को तबाह करना शुरू कर दिया है, जिनमें आहुति देकर इन दानव-प्रवृत्तियों का आव्हान किया गया था। नफरत की भीड़ भरी आंधी के साये भाजपा के दरवाजे पर भी दस्तक देने लगे हैं। सात-आठ दिनों से मोदी-सरकार में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज भी ट्वीटर पर क्ट्टरपंथियों की विद्रूपताओं के शिकार से आहत दिखाई पड़ रही हैं। सत्ता के कॉरीडोर में वो बाजारू धमकियों और प्रतिक्रियाओं के आगे अकेले बेबस खड़ी हैं। एपीसोड दर्शाता है कि मर्यादाओं के सारे तटबंध टूट चुके हैं। सुषमा स्वराज पर शाब्दिक हमलों के बीच ‘मॉब-लिंचिंग’ का मसला भी दहाड़ने लगा है। नफरत और उन्माद के चलते पिछले दिनों हिन्दुस्तान के विभिन्न हिस्सों में 28 लोग लिंचिंग याने अराजक भीड़ व्दारा हत्या का शिकार हो चुके हैं। ‘मॉब-लिंचिंग’ की ये घटनाए देश के एक कोने में नहीं घटी हैं, बल्कि महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, झारखंड, त्रिपुरा, गुजरात और राजस्थान तक इन मौतों का आतंक फुंफकार रहा है।
यह महज कांग्रेस, सपा-बसपा अथवा वामपंथियों का राजनीतिक आरोप नहीं, बल्कि समाज के विचारशील तबके कि चिंता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के न्यू इंडिया में कट्टरपंथियों की अराजक भीड़ व्दारा हत्याओं की घटनाओं ने उन लक्ष्मण-रेखाओं को ध्वस्त कर दिया है, जो लोकतंत्र के रक्षा-कवच का काम रही थी। नफरत, अराजकता या जंगलराज जैसी शब्दावली राजनीति को उत्प्रेरित कर इन घटनाओं को सवालिया जरूर बना देती हैं, लेकिन मौजूदा माहौल में इनके उपयोग से बचना संभव नही है। क्ट्टरपंथियों की कुत्सित, कठोर और कुटिल मानसिकता इस कदर बेखौफ हो चली है कि अब उसे केन्द्र सरकार की सत्ता की परवाह नहीं है।
कट्टरपंथियों की निरंकुशता और निडरता का सबब यह भी है कि खुद भाजपा इस मुद्दे पर एकमत नहीं है। सुषमा स्वराज के मसले पर गृहमंत्री राजनाथ सिंह की छोटी सी औपचारिक प्रतिक्रिया इन निष्कर्षों पर मुहर लगाती है कि इन तत्वों को लेकर भाजपा का ‘एटीट्यूड’ ‘सॉफ्ट’ है। ज्यादातर नेताओं के मन में तल्खी नहीं है। यहां यह शक करने की पूरी गुंजाइश है कि सुषमा स्वराज को ट्रोल करने वाले गालीबाज कट्टरपंथियों के ट्वीटर अकाउंट्स भी कहीं उनके अपने लोगों व्दारा प्रायोजित, पोषित और पल्लवित तो नहीं हैं?
सुषमा स्वराज की ‘ट्रोलिंग’ अथवा ‘मॉब-लिंचिंग’ अनहोनी या आकस्मिक घटना नहीं है। भाजपा के अखाड़े में इन मनोवृत्तियों को लाड़-प्यार और दुलार के साथ पाला-पोसा और संवारा गया है। कांग्रेस और ममता बैनर्जी सहित कई विपक्षी नेताओं ने भले ही सुषमा स्वराज के खिलाफ ट्रोलिंग का विरोध किया हो, लेकिन भाजपा के चेहरे इस मुद्दे पर चस्पा अजीबोगरीब, खामोशी में कई राजनीतिक सवाल खिलखिला रहे हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स के एक विश्लेषण के मुताबिक जिन ट्वीटर-अकाउंट्स ने सुषमा स्वराज को ट्रोल किया है, उनके फॉलोअर्स में 41 सांसदों के नाम हैं। इनमें कुछ केन्द्रीय मंत्री भी हैं और कुछ लोकसभा सांसद भी हैं, जो उन ट्वीटर-होल्डर में कम से कम एक अकाउंट को फॉलो करते हैं। खुद प्रधानमंत्री ऐसे आठ ट्वीटर अकाउंट्स को फॉलो करते हैं। सवाल यह है कि जिन ट्वीटर अकाउंट्स को इतनी बड़ी हस्तियां फॉलो कर रही हैं, उनकी राजनीतिक, सामाजिक अथवा बौध्दिक हैसियत क्या है? समाज में कट्टरता के रोगाणुओं के राजनीतिक-निहितार्थ क्या हैं?
अभिव्यक्ति और कट्टरता से जुड़ी अनगिन घटनाओं के दरम्यान प्रधानमंत्री मोदी की खामोशी आम लोगों को हमेशा बेचैन करती रही है। इस बेचैनी में एक आशंका और भय छिपा था, जो अब मॉब-लिंचिग अथवा सुषमा स्वराज जैसी ताकतवर हस्तियों के खिलाफ ट्रोलिंग के रूप में सामने आ रहा है। यह सवाल लगातार उठते रहा है कि मोदी चुप रहकर समाज में उन्माद की कौन सी फ्रीक्वेंसी सेट करना चाहते हैं? यह सवाल उस वक्त भी उठा था, जब दिल्ली हायकोर्ट में वकीलों की भीड़ कन्हैया कुमार को ठिकाने लगाने के लिए टूट पड़ी थी। मोदी-सरकार के चार सालों में अनेक घटनाएं ऐसी थीं, जहां सामाजिक असहिष्णुता, साम्प्रदायिक वैमनस्य और जातीय विभाजन का विस्फोट सामाजिक सौहार्द को नुकसान पहुंचाता रहा है। गौरतलब यह है कि मोदी हर संवेदनशील मौके पर खामोश बने रहे। भीड़ का हिंसक विस्फोट और सोशल मीडिया की अराजकता अब खुद मोदी के कैबिनेट सहयोगियों को निगलने लगी है। भले ही सुषमा स्वराज के मामले को ‘ऑक्युपेशनल-हेजार्ड’ मानकर भाजपा शुतुरमुर्ग की तरह आंधी में सिर छिपाना चाहे, लेकिन तय है कि यह कट्टरता उसके लिए भस्मासुर साबित हो सकती है।

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