दिल्ली में संविधान की कसौटियां और राजनीतिक अड़ीबाजी

‘बिग-बॉस’ नाराज हैं…इसलिए वित्त मंत्री अरुण जेटली के ब्लॉग के जरिए भाजपा-सुप्रीमो की ओर से यह राजनीतिक एडवायजरी जारी हो गई है कि ‘दिल्ली के बॉस’ मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की सरकार के साथ केन्द्र सरकार का सलूक क्या और कैसे रहने वाला है? जेटली ने सुप्रीम कोर्ट की गौरतलब व्याख्याओं को राजनीति के गुरुत्वाकर्षण के बाहर शून्य में कुछ ऐसे उड़ा दिया है कि हकीकत की जमीन पर उनकी वापसी असंभव हैं। याने राजनीतिक कुचक्रों का यह चक्र हवा में यूं ही सनसनाता रहेगा। जेटली के ब्लॉग की ब्रीफ यह है कि ”फैसले से दिल्ली-प्रदेश या केन्द्र सरकार के अधिकारों में न तो इजाफा हुआ है और ना ही कटौती हुई है। फैसला निर्वाचित सरकार के महत्व को प्रतिपादित करता है। दिल्ली संघ शासित प्रदेश है, इसलिए इसके अधिकार केन्द्र सरकार में अन्तर्निहित हैं। आमतौर पर लोकतंत्र और संघीय राजनीति के हित में उप राज्यपाल को राज्य-सरकार के काम करने के अधिकार को स्वीकार करना चाहिए। लेकिन वो विभिन्न प्रकरणों में सही वजहों से असहमत हो सकते हैं, मामले को राष्ट्रपति को भेज सकते हैं। ऐसे मामलों में केन्द्र का निर्णय सबको मानना होगा। इस तरह केन्द्र की राय सबसे बढ़ कर है।”
जेटली के ब्लॉग के राजनीतिक संकेत साफ हैं कि अरविंद केजरीवाल के ऊपर केन्द्र सरकार की राजनीतिक अड़ीबाजी पूर्ववत जारी रहेगी। इसकी पहली बानगी यह है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों से उत्साहित दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया व्दारा जारी अधिकारियों की पद-स्थापनाओं के आदेशों को दिल्ली के सर्विसेज-विभाग के आला नौकरशाहों ने देर रात यह कह कर लौटा दिया है कि केन्द्र सरकार के नोटिफिकेशन के तहत पद-स्थापनाओं के अधिकार अभी भी उप राज्यपाल अथवा मुख्यह सचिव में निहित हैं। आला अधिकारियों की यह नाफरमानी तकनीकी है, लेकिन इसकी भावनाएं और संदेश घोर राजनीतिक और अलोकतांत्रिक हैं।
दिल्ली के अधिकारों की यह जंग पेचीदा और संवेदनशील मसला रहा है। इसके विभिन्न आयामों को संविधान के दायरे में बांधकर राह बनाना आसान नहीं था। सुप्रीम कोर्ट ने राजनीति के हर पहलू को ध्यान में रखते हुए आगे बढ़ने के लिए सम्मानजनक मध्य मार्ग तैयार किया था। विडम्बना यह है कि केन्द्र को यह रास्ता रास नहीं आ रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने भले ही निर्वाचित सरकार के अधिकारों को लोकतंत्र की दृष्टि से सर्वोच्चय माना है, लेकिन यह सोचना बेमानी है कि मोदी-सरकार सुप्रीम कोर्ट की मंशाओं का सम्मान करेगी या संविधान की अवधारणाओं का सम्मान करेगी। लचीलापन केन्द्र की मौजूदा सरकार के स्वभाव का हिस्सा नहीं है।
दिल्ली और केन्द्र सरकार के टकराव की कहानी पुरानी है। अरविंद केजरीवाल से पहले 1952 में भी शासन-प्रशासन के मसलों पर कांग्रेस के मुख्यमंत्री ब्रह्मप्रकाश और तत्कालीन चीफ कमिश्नर के बीच लंबा विवाद हुआ था। इसकी परिणति 1955 में मुख्यमंत्री के इस्तीफे से हुई थी। 1956 में दिल्ली से राज्य का दर्जा छीन लिया गया था। दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग भाजपा प्रमुखता से उठाती रही है। संविधान में 69 वें संशोधन के जरिए दिसम्बर 1991 में दिल्ली को आंशिक राज्य का दर्जा दिया गया था। लेकिन राजनीतिक दल इससे संतुष्ट नहीं थे। 2003 में वाजपेयी सरकार के समय तत्कालीन केन्द्रीय गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी व्दारा दिल्ली को पूर्ण राज्य बनाने के लिए संशोधन प्रस्ताव में भी पुलिस और कानून-व्यवस्था को केन्द्र के अधीन ही ऱखा गया था। यह संशोधन पारित नहीं हो पाया था।
साठ सालों से यह विवाद जारी है। दिल्ली को राज्य बनाने के मामले में कांग्रेस या भाजपा के रुख में कभी एकरूपता और स्थायित्व नहीं रहा है। केन्द्र सरकार में पदारूढ़ होते ही ये दल अपना रुख बदल कर दिल्ली को पूर्ण राज्य बनाने के मामले में कदम पीछे खींच लेते हैं। जैसे आज भाजपा इस मांग के विरोध में खड़ी है। केजरीवाल और मोदी-सरकार के बीच राजनीतिक प्रतिशोध की मौजूदा दास्तान लोकतंत्र के लिहाज से खतरनाक है। चुनाव लोकतंत्र का स्वभाव है, लेकिन लोकतांत्रिक हार-जीत में प्रतिशोध का यह पदार्पण चौंकाने वाला है। टकराव दिल्ली की राजनीति का स्थायी भाव नहीं बने, इसके लिए सुनिश्चित करना जरूरी है कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया भी जा सकता है या बिल्कुल ही नहीं दिया जा सकता है? इन परिस्थितियों में कौन सा मॉडल मुआफिक होगा कि दिल्ली में विरोधी दल की सरकार होने के बावजूद वह केन्द्र सरकार की राजनीतिक अड़ीबाजी का शिकार नहीं बन सके?

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY