बूझो, तीन माह पूर्व ‘अविश्वास’ पर चर्चा में क्या दिक्कतें थीं…

लोकसभा के मानसून सत्र के पहले दिन ही मोदी-सरकार आश्चर्यजनक तरीके से तेलुगू देशम पार्टी के उसी पुराने अविश्वास प्रस्ताब पर चर्चा करने के लिए तैयार हो गई है, जिसके सहारे उसने पूरे बजट-सत्र को शोरशराबे के हवन-कुंड के हवाले कर दिय़ा था। तीन महीने पहले बजट-सत्र में भी तेलुगू देशम ने यही अविश्वास-प्रस्ताव संसद में पेश किया था। समूचा प्रतिपक्ष इससे सहमत था। लेकिन सरकार मुतमईन नहीं थी इसलिए चर्चा नहीं हो सकी। आज मोदी-सरकार को लगता है कि इस पर चर्चा होना चाहिए, इसलिए स्पीकर ने बगैर किसी हीला-हवाले के अनुमति दे दी।
लेकिन मोदी-सरकार अथवा लोकसभा अध्यक्ष श्रीमती सुमित्रा महाजन से कोई भी यह मौजूं सवाल नहीं पूछेगा कि हूबहू उसी प्रस्ताव पर बजट-सत्र में चर्चा करने में क्या दिक्कत थी? जवाब यह है कि दिक्कत उस वक्त भी नहीं थी और दिक्कत इस वक्त भी नहीं है। सिर्फ ‘सरकार’ के ‘मूड’ का सवाल है। उस वक्त ‘सरकार’ का गरूर इसे कबूल करने के ‘मूड’ में नहीं था, इस वक्त ‘सरकार’ को लगता है कि इसे टालना राजनीतिक रूप से उसकी लोकतांत्रिक-छवि को आघात पहुंचा सकता है। इसे टालने के लिए बजट-सत्र के दरम्यान आजमाए गए राजनीति के दांव-पेंच भारी पड़ सकते हैं। तीन महीनों में राजनीति में काफी पानी बह चुका है। मोदी-सरकार की उपलब्धियों पर सवाल उठने लगे हैं। लोगों के मन में इस धारणा ने जगह बनाना शुरू कर दी है कि संवैधानिक संस्थाओं के प्रति मोदी-सरकार के रवैये में लोकतांत्रिक-उदारता का घोर अभाव है। राजनीति के इन नकारात्मक प्रतिमानों से बाहर आना प्रधानमंत्री मोदी की पहली जरूरत है।
भाजपा ने रणनीतिकारों ने मानसून-सत्र के पहले दिन ही इसे मंजूर कर राजनीतिक नफे-नुकसान के संतुलन को साधना मुनासिब समझा है। रणनीति के तहत ही सभी टीवी-चैनल, वेब-साइट और सोशल मीडिया पर खबरिया भाषा में प्रायोजित खबरें स्क्रोल कर रही हैं। स्क्रोल की हेडलाइन्स हैं- ‘मानसून-सत्र में मोदी-सरकार पर अविश्वास-प्रस्ताव का शिकंजा कसा…सोनिया ने बनाई रणनीति…मोदी अविश्वास का मत हारेंगे या जीतेंगे… सांसदों को व्हिप जारी…अविश्वास पर भारी उठा-पटक…पक्ष-विपक्ष में रस्साकशी…।’ मीडिया की दुनिया में कुछ यूं माहौल बनाया जा रहा है कि अविश्वास मत हारने-जीतने में ही 2019 के लोकसभा चुनाव का भाग्य जुड़ा है। यह अतिरंजित राजनीतिक आकलन है।
अविश्वास प्रस्ताव लोकतंत्र में संसदीय-प्रक्रियाओं का वह इंस्ट्रुमेंट है, जो विपक्ष को अपनी बात, अपने मुद्दों को रखने का अवसर देता है। अविश्वास प्रस्ताव के माध्यम से विपक्ष अपनी बात कहने के अपने जायज संवैधानिक हक का इस्तेमाल कर रहा है। मोदी-सरकार को पता है कि वह अविश्वास प्रस्ताव हारने वाली नहीं है और प्रतिपक्ष भी इस तथ्य से वाकिफ है कि उसके पास इतना संख्या-बल नहीं है कि वह केन्द्र सरकार का कोई नुकसान कर सके।
मोदी-सरकार के मीडिया-मैनेजरों ने अविश्वास प्रस्ताव की संसदीय घटना को मतदान की आंकड़ेबाजी से जोड़ दिया है। कोशिशें यह गफतल पैदा करने की है कि शुक्रवार 20 जुलाई को संसद में मोदी-सरकार प्रतिपक्ष को जबरदस्त पटखनी देने जा रही है। भाजपा को यह नहीं भूलना चाहिए कि सामान्य राजनीतिक चलन में आने वाले अविश्वास प्रस्ताव सरकार को गिराने का जरिया नहीं होते हैं। उनका उद्देश्य सरकार की खामियों को उजागर करना होता है।
भारतीय संसद के सफरनामे में केन्द्र सरकारों के खिलाफ अब तक 26 मर्तबा अविश्वास-प्रस्ताव आ चुके हैं। भारत-चीन युध्द के बाद सबसे पहले पंडित जवाहरलाल नेहरू के खिलाफ आचार्य कृपलानी ने अविश्वास प्रस्ताव रखा था। प्रधानमत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ सबसे अधिक 15 बार अविश्वास प्रस्ताव पेश हुए थे। लालबहादुर शास्त्री और नरसिम्हाराव सरकार के विरुध्द तीन-तीन बार, मोरारजी के विरुध्द दो बार, राजीव गांधी और अटलबिहारी वाजपेयी के खिलाफ एक-एक बार प्रतिपक्षी दलों ने अविश्वास प्रस्ताव ऱखा था।
रूटीन राजनीतिक मामलों में अविश्वास प्रस्ताव जनता की अदालत में लोकतंत्र का मुकदमा जैसी डेमोक्रेटिक-एक्सरसाइज है। यह तभी सफल और सार्थक होती है, जबकि सत्तारूढ़ दल के नेता के मन में लोकतंत्र के प्रति लिहाज हो और विपक्ष के आरोपों को सुनने की धैर्य हो…। जो लोग संसदीय कार्यवाही को नजदीक से देखते-परखते रहे हैं, वो जानते हैं कि ऐसे मौकों पर विपक्ष को बोलने के लिए ज्यादा वक्त दिया जाता है। लेकिन शुक्रवार को ऐसा नहीं हो सकेगा। मोदी-सरकार के खिलाफ कांग्रेस को बोलने के लिए मात्र 38 मिनट मिले हैं। जबकि भाजपा को 3 घंटे 33 मिनट मिले हैं। राहुल गांधी लंबे समय से आरोपों का पुलिन्दा लेकर घूम रहे हैं, जिसमें रफाल-डील से लेकर मॉब-लिंचिग, साम्प्रदायिकता, गरीबी-बदहाली जैसे मुद्दे सूचीबध्द हैं। वैसे लोकसभा में समय का आवंटन सदस्य-संख्या के मान से होता है, लेकिन संसदीय परम्पराओं में यह तकनीकी मुद्दा हमेशा गौण रहा है।

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