महापौर : यह कुर्सी लगा कर बैठने का नहीं, कान खींचने का वक्त …

0
8

यह तो होना ही था। बुधवार रात हुई बारिश के बाद शहर के कई इलाकों के जलमग्न होने की जानकारी कोई आपदा नहीं है। यह तो वह हकीकत है जो हर वर्ष सामने आती है। गुरुवार सुबह जब जलभराव की शिकायतें मिलीं तो महापौर आलोक शर्मा शहर भ्रमण पर निकले। हालात से तंग महापौर भोपाल टॉकीज के पास पानी से भरी सड़क पर कुर्सी लगाकर धरने पर बैठे गए। नाले के पानी में बैठे आलोक ने वहीं से फोन लगा अधिकारियों पर गुस्सा उतारा। इसके बाद उन्होंने लोक निर्माण विभाग के मंत्री रामपाल सिंह से बात की। मंत्री से कार्रवाई का आश्वासन मिलने के बाद वो धरने से उठे।
कोई और जनप्रतिनिधि होता तो यह उसकी प्रशंसा होती लेकिन आलोक शर्मा तो महापौर हैं। उस पार्टी के प्रतिनिधि जिसकी मप्र में बीते 15 सालों से सरकार है। वे सत्ता में अपने संपर्कों से चाहे जो करवा सकते हैं फिर ऐसा क्या हुआ कि नालों की सफाई के मामले में देश के दूसरे नंबर के स्वच्छ शहर भोपाल की सूरत आज तक न सुधर पाई? कहा गया कि यह नाला लोक निर्माण विभाग का है। और लोक निर्माण विभाग किसका है?
महापौर अखबार तो पढ़ते ही होंगे, न पढ़ते होंगे तो उन तक खबरें पहुंच रही होंगी। पिछले एक माह से लगातार अखबारों में यह समाचार कई दफा प्रकाशित हुआ कि शहर में नालों की सफाई नहीं हो रही। अधिकांश काम कागजों पर हुआ है। अतिक्रमण है। वे अपनी जन चौपाल में आई शिकायतों पर अधिकारियों को तलब भी करते रहे। समीक्षा भी करते रहे, लेकिन अंतत: हुआ क्या? नगर निगम का कहीं भी जलभराव नहीं होने का दावा विफल हो गया। नए-पुराने शहर की करीब दर्जनों बस्तियों में नाले का पानी भर गया।
सवाल यह है कि क्या महापौर इस बात से अनजान हैं कि शहर के नालों पर अतिक्रमण है। गंदगी से पटे नाले जरा सी बारिश में मुसीबत बन सकते हैं। जानकारी तो यह है कि नगर निगम ने चार साल पहले नालों पर अतिक्रमण का सर्वे किया था। हर जोन में हुए सर्वे का डाटा अब तक कम्पा्इल भी नहीं किया गया है। साधनों के ये हाल हैं कि जोन 5 के वार्ड 22 में सफाईकर्मी के बिना साधनों के नाले में उतर कर सफाई करने के फोटो वायरल हुए थे। क्या महापौर इस जानलेवा कार्य परिस्थिति से भी अनजान हैं?
गुरुवार को वे नाराज हो कर धरने पर बैठ गए कि सेफिया कॉलेज के पास से गुजर रहे नाले पर पीडब्ल्यूडी का पुल है और पीडब्ल्यूडी के अधिकारी इस नाले को लेकर कोई कदम नहीं उठा रहे हैं। उन्होंने आनन-फानन में पीडब्ल्यूडी मंत्री से बात की। सवाल यह है कि जो बात अब की गई क्या वह चार दिन पहले नहीं की जा सकती थी?
लेकिन महापौर शर्मा को या तो जानकारी नहीं दी गई या उन्हें पता ही नहीं है कि निगम कैसे और कितना काम कर रहा है। महापौर का धरना अपनी ही सरकार के खिलाफ धरने की तरह है। उन्हें समझना होगा कि विधानसभा चुनाव करीब हैं। वे खुद भी चुनाव लड़ना चाहते हैं तो यह वक्त कुर्सी डाल कर बैठने का नहीं दोषियों के कान खींचने का है।

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY