मानसून सत्र: भाजपा-कांग्रेस के बीच ‘हिट एंड रन’ की राजनीति

कांग्रेस और भाजपा नेताओं के बीच कांग्रेस के वरिष्ठ प्रवक्ता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री आनंद शर्मा के इस बयान पर तलवारें खिंच गई हैं कि ‘कांग्रेस के बारे में प्रधानमंत्री मोदी जिस प्रकार के अनर्गल आरोप लगा रहे हैं, वह उनकी बीमार मानसिकता प्रतीक है’। केन्द्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कांग्रेस के आरोप को शर्मनाक और हताशा का प्रतीक बताया है। वैसे आनंद शर्मा का यह कथन एकदम खारिज करने योग्य है कि ‘प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मानसिक रूप से अस्वस्थ है’। 18 जुलाई से प्रारंभ होने वाले लोकसभा के मानसून सत्र के पहले कांग्रेस की राजनीतिक रणनीति का खुलासा करते हुए आनंद शर्मा ने यह बात कही थी।
राज्यसभा में काग्रेस के उपनेता आनंद शर्मा का यह आक्षेप राजनीतिक-शालीनता के दायरों के पार ‘बिलो द बेल्ट’ हिट करने वाली श्रेणी में आता है। यह राजनीतिक रूप से अतिरंजित और अशालीन है। अपरिपक्वता से कांग्रेस को बचना चाहिए। नरेन्द्र मोदी जैसा चतुर वक्ता केवल इसी मुद्दे के सहारे मानसून-सत्र के दरम्यान उठाए जाने वाले लोक महत्व के सभी मुद्दों को हाशिए पर ढकेल सकता है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता, गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान, कांग्रेस के निष्कासित नेता मणिशंकर अय्यर के उस बयान का हश्र नही भूले होंगे, जिसने आखिरी सप्ताह में चुनाव का रुख बदल दिया था। अय्यर के कथन ‘मोदी नीच किस्म की राजनीति करते है’ के अंशों को अपने ऊपर ओढ़कर मोदी ने चुनाव की फिजा को ही बदल दिया था कि कांग्रेस मुझे निचली जाति का बताकर दलितों का अपमान कर रही है।
इस कथन के आगे-पीछे आनंद शर्मा ने जो कुछ कहा, उसकी राजनीतिक-मीमांसा जरूर होना भी चाहिए। शर्मा ने मोदी की मानसिक अस्वस्थता के आरोप के समर्थन में जो कारण नत्थी किये हैं, उनमें एक यह है कि प्रधानमंत्री आदतन झूठ बोलते हैं। शर्मा के इस कथन में यह संशोधन हो सकता है कि मोदी आदतन नहीं, इरादतन झूठ बोलते हैं। तोल-मोल कर बोलते हैं और खम ठोककर बोलते हैं। वैसे शर्मा का यह सोच जायज है कि आदतन अथवा इरादतन, चाहे जो हो, प्रधानमंत्री का इस तरह झूठ बोलना अथवा लोगों को गुमराह करना राष्ट्र की चिंता का विषय होना चाहिए। मोदी को यह सोचना चाहिए कि वो सिर्फ भाजपा के नहीं, पूरे देश के प्रधानमंत्री हैं। उन्हें देश और पद की गरिमा का ध्यान रखना चाहिए। वो देश को गुमराह करने और झूठे बयान देने से बचें।
कांग्रेस की नाराजी का सबब यह भी है कि प्रधानमंत्री मोदी केवल राष्ट्रीय मुद्दों पर देश और जनता को गुमराह नहीं कर रहे हैं, वो कांग्रेस के बारे में भी लगातार गलतबयानी कर रहे हैं। मोदी का यह आरोप गलत है कि कांग्रेस तीन तलाक से संबंधित विधेयक को रोकना चाहती है, जबकि यह विधेयक प्रवर समिति के विचाराधीन है। इसी तारतम्य में प्रधानमंत्री को कांग्रेस को मुस्लिमों की पार्टी बताने के लिए भी कांग्रेस से माफी मांगना चाहिए। मोदी ने आजम गढ़ में तीन तलाक के मुद्दे पर कांग्रेस पर विरोध करने का आक्षेप लगाते हुए पूछा था कि क्या कांग्रेस सिर्फ मुस्लिम पुरुषों की पार्टी है?
मानसून सत्र के पहले राजनीति के बादलों में बिजली की यह गड़गड़ाहट कह रही है कि सदन में संवाद कम, शोर ज्यादा होने वाला है। हंगामे की आशंकाओं के बीच जहां सत्ता पक्ष प्रतिपक्ष से सहयोग मांग रहा है, वहीं राहुल गांधी चिट्ठी लिखकर स्पीकर से यह सुनिश्चित करने का अनुरोध कर रहे हैं कि बजट-सत्र की तरह यह मानसून-सत्र भी बरबाद नहीं हो जाए। सत्ता पक्ष की ओर से सदन को सुचारू चलाने की यह पहल दिखावा ज्यादा है। वैसे भी लोकसभा का संवैधानिक गांभीर्य अथवा संसदीय-संवाद मोदी-सरकार के एजेण्डे का हिस्सा नहीं रहा है। पिछला बजट-सत्र इसका जीता-जागता सबूत है। जो सरकार बजट-सत्र जैसे महत्वपूर्ण अवसरों पर होने वाली कार्यवाही को कोरे-कागज का हिस्सा बना सकती है अथवा अविश्वास प्रस्ताव को हवा में उड़ा सकती है, वह सरकार प्रतिपक्ष की राई जैसी मामूली भूलों को पहाड़ बना सकती है। हो सकता है कि मानसून सत्र के पहले दिन ही सदन में यह विवाद होने लगे कि मानसिक रूप से प्रधानमंत्री को अस्वस्थ कहने के मामले में पहले कांग्रेस माफी मांगे…। कोई कुछ भी कहे, मानसून-सत्र का नाटकीय अंदाज निराला ही रहने वाला है।

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