2019 : गांधी के 18 सिद्धांतों के सहारे पॉलिटिक्‍स चमकाने की जुगत

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यह राजनीति का ऐसा दौर-ए-तरक्‍की है जब युवाओं के दिमाग में बदलाव की रणनीतियां नहीं बनती बल्कि उनके हाथों में मोबाइल है और वे ट्रोल समूह के सदस्‍य हैं। वे फब्तियां कसते हैं, मौजूं-गैरमौजूं मुद्दों पर हमलावर होते हैं तथा अफवाहों को फैलाने, झूठी सूचनाओं पर हिंसक हो जाते हैं। आक्रामक भीड़ में तब्‍दील होते युवाओं के बीच यदि कोई महात्‍मा गांधी के सिद्धांतों की बात करे तो अचरज होता है। नेशनल एजेंडा फोरम युवाओं के बीच बापू के 18 सिद्धांतों को लेकर पहुंचा है और जानना चाहा है कि वे कैसा नेता चाहते हैं। नरेंद्र मोदी जैसा या राहुल गांधी जैसा, अखिलेश यादव या अरविंद केजरीवाल? वेब पॉलिटिक्‍स यानि इंटरनेट के माध्‍यम से राजनीति को साधने का यह प्रयास जिज्ञासा जगाता है कि क्‍या यह वास्‍तव में गांधी के सिद्धांतों को युवाओं तक पहुंचाने की पहल है या गांधी के नाम पर राजनीति साधन की जुगत?

राजनीतिक रणनीतिकार का दर्जा पाए प्रशांत किशोर द्वारा संचालित कंपनी ‘इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी’ (आई-पैक) ने जून में ‘नेशनल एजेंडा फोरम’ वेबसाइट आरंभ की। इसका मकसद 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए क्रियान्वित होने वाला एजेंडा तैयार करना है। इसके लिए महात्‍मा गांधी के 18 सूत्रीय संरचनात्मक कार्यक्रम जैसे छूआछूत, शराब बंदी, खादी, जातिगत भेदभाव की समाप्ति को आधार बनाया गया है। युवाओं से पूछा गया है कि इनमें या अपनी पसंद के अन्‍य मुद्दों में से वे कोई दस मुद्दे चुनें। साथ ही बताएं कि इन मुद्दों को कौन व्‍यक्ति प्रधानमंत्री बन कर पूरा कर सकता है। इसके लिए ऑनलाइन सर्वे शुरू किया गया। यह ऑनलाइन वोटिंग 14 अगस्त तक होगी तथा 15 अगस्त को परिणाम घोषित किए जाएंगे। इसके बाद चुने गए नेता के साथ युवा वॉलंटियर्स की मीटिंग कराई जाएगी। इस नेशनल एजेंडा फोरम के साथ 273 प्रभावशाली लोग, 332 संगठन,72,817 सहयोगी तथा 39 लाख से अधिक युवा ऑनलाइन जुड़े हैं।

गांधीवादी संगठनों की युवाओं तक पहुंचने की कोशिशों और राजनीतिक उद्देश्‍य से युवाओं के बीच जाने की इस पहल में बहुत बुनियादी अंतर है। यहां गांधी विचार को प्रसारित करना उद्देश्‍य नहीं है बल्कि 2019 की राजनीति को साधने का लक्ष्‍य है। हालांकि, नेशनल एजेंडा फोरम ने पूना में 13 नवंबर 1943 को भारत छोड़ो आंदोलन के समय गांधी जी द्वारा 18 सूत्रीय संरचनात्मक कार्यक्रम पर लिखा गया लेख भी साझा किया गया है। इस लेख में गांधी जी लिखते हैं कि बिना संरचनात्‍मक कार्यक्रम के शासन की अवज्ञा वैसी है जैसे लकवाग्रस्‍त हाथ से चम्‍मच उठाने का जतन करना। इसी लेख में वे लिखते है कि विद्यार्थियों को पार्टीगत राजनीति में हिस्‍सा नहीं लेना चाहिए। वे विद्यार्थी हैं, शोधार्थी हैं,राजनेता नहीं हैं। उन्‍हें किसी पर ‘वंदे मातरम्’ या राष्‍ट्र ध्‍वज किसी अन्‍य पर थोपना नहीं चाहिए। वे अपने सीने पर तिरंगे का बैच लगा सकते हैं मगर ऐसा करने के लिए दूसरों को बाध्‍य नहीं करना चाहिए। विद्यार्थियों को राजनीतिक रूप से सही होना चाहिए तथा महिलाओं के प्रति उनका व्‍यवहार शिष्‍ट होना चाहिए।

गांधी जी की यह बात आज के दौर में बहुत मायने रखती है जब हम विरोधी विचारधारा के कायम रहने की गुंजाइश खत्‍म कर देना चाहते हैं। युवा जब अधिक कट्टर हो रहा है ऐसे में गांधी जी के विचारों को युवाओं तक ले जाने का हर प्रयास उपयुक्‍त ही होगा। लेकिन यहां यह आशंका भी महत्‍वपूर्ण है कि कहीं इस बार भी गांधी के नाम का उपयोग अपना एजेंडा आगे बढ़ाने के लिए तो नहीं किया जा रहा? जो युवा 2019 का एजेंडा और मुद्दे चुन रहे हैं क्‍या उन्‍होंने महात्‍मा गांधी के 18 सूत्रीय संरचनात्मक कार्यक्रम को पढ़ा भी है ? यदि हां तो यह परिवर्तन की दिशा में उम्‍मीद भरा कदम है, अन्‍यथा एजेंडा तय करने से पहले इस कार्यक्रम को पढ़ा जाना चाहिए-
https://www.mkgandhi.org/ebks/construct.pdf

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