गाय तुम केवल मुद्दा हो, तुमसे वोटों का दूध मिलता है…

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मप्र में विधानसभा चुनाव की तैयारियों में गाय भी एक मुद्दा है। कांग्रेस के प्रदेश अध्‍यक्ष कमलनाथ ने कहा है कि कांग्रेस की सरकार आने पर प्रदेश की हर पंचायत में गोशाला बनायी जायेगी। उन्होंने कहा कि भाजपा गोमाता को लेकर बातें तो बड़ी-बड़ी करती है, जमीन पर करती कुछ नहीं। सैकड़ों गोमाता रोज मर रही हैं, लेकिन उन्हें इसकी कोई चिंता नहीं है। भाजपा गोमाता के नाम पर केवल राजनीति करती है। हम गोमाता को तड़पते हुए नहीं देख सकते। भाजपा की ओर से जवाब भी आया है। प्रवक्‍ता रजनीश अग्रवाल ने कहा है कि गौचर भूमि को समाप्‍त करने वाली कांग्रेस अब गौशाला खोलने का स्‍वांग रच रही है। आज गाय सड़क पर आने को मजबूर हुई तो उसका कारण चरनोई की जमीन खत्‍म करने की कांग्रेसी मुख्‍यमंत्री दिग्विजय सिंह की नीति रही है। कांग्रेस और भाजपा में ‘गाय’ को लेकर यह जंग पशुपालन की फिक्र का उदाहरण नहीं है बल्कि यह मुद्दों को हथियाने और अपनी लाइन दूसरे से गाढ़ी दिखाने की जुगत है।

गाय पर इस बहस को देख-सुन कर ख्‍यात व्‍यंग्‍यकार हरिशंकर परसाई याद आते हैं। उन्‍होंने लिखा कि – ‘स्वामीजी, दूसरे देशों में लोग गाय की पूजा नहीं करते, पर उसे अच्छी तरह रखते हैं और वह खूब दूध देती है। स्‍वामी जी उत्‍तर देते हैं, – बच्चा, दूसरे देशों की बात छोड़ो। हम उनसे बहुत ऊंचे हैं। देवता इसीलिए सिर्फ हमारे यहां अवतार लेते हैं। दूसरे देशों में गाय दूध के उपयोग के लिए होती है, हमारे यहां वह दंगा करने, आंदोलन करने के लिए होती है। हमारी गाय और गायों से भिन्न है।’

यह प्रसंग इसलिए याद क्‍योंकि मप्र में राजधानी भोपाल के पाश इलाके से लेकर सुदूर ग्रामीण अंचल तक कहीं भी चले जाइए आपको सड़कों पर गाय बैठी हुई मिल जाएंगी। इन गायों की संख्‍या एक-दो नहीं दर्जन भी हो सकती है। भोपाल में दो दिन पहले एक युवक की बाइक से गिर कर मौत हुई क्‍योंकि वह रात के अंधेरे में सड़क पर बैठी गाय को न देख पाया था। सोचिए, क्‍या होता यदि गाय को वाहन से चोट लग जाती? सड़कों पर इतनी गायें अचानक कहां से आ गई? क्‍यों वाहन चलाते डर लगता है कि सड़क के बीचों बीच खड़ी या बैठी गाय अचानक चल पड़ी या सेंट्रल वर्ज पर चढ़ी गाय अचानक उतर गई और किसी वाहन से चोट लग गई या वाहन सवार को गिर गया तो…?

पंचायत में गौशाला बनाने का वचन दे कर कमलनाथ ने भाजपा के हाथ से एक मुद्दा छिनने का प्रयास किया है। साथ ही इस दुखती रग पर भी हाथ रख दिया कि सड़क पर छोड़ दी गई गाय का क्‍या किया जाए? सभी जानते हैं कि काश्‍तकार से लेकर गौपालक तक गाय की सेवा तभी तक करते हैं जब तक वह दूध देती है। उसके बाद गाय को भगवान भरोसे छोड़ दिया जाता है। कई ऐसे स्‍वार्थी लोग हैं जिन्‍होंने हमारी संवेदनाओं की आड़ में गाय को खुला छोड़ दिया है। वह सड़क पर कचरा खाती है। पॉलीथिन खाती है। हमारी लापरवाही से उसकी जान पर बन आती है। गौशालाओं में भी गाय की वांछित देखभाल नहीं हो पाती क्‍योंकि उनकी क्षमता कम है और गाय अधिक। गौशालाओं में गायों के साथ अत्‍याचार और उनके भूख से मर जाने की खबरें भी हमारे ही समाज का हिस्‍सा हैं। हमारी सरकारों की पशुपालन नीति में गाय-भैस के पालन की बातें तो कई हुई लेकिन दूध न मिलने के बाद गाय के साथ होने वाले बर्ताव पर कोई बात नहीं करता। यह ऐसा नासूर है जिसे सब ढंक कर रखना चा‍हते।

जिस तरह गाय एक सियासी मुद्दा है उसी तरह स्‍वास्‍थ्‍य, शिक्षा, सामाजिक तरक्‍की, आर्थिक उन्‍नति भी केवल सियासी मुद्दे ही बन कर रह गए हैं। प्रदेश की सत्ता पर पंद्रह साल से काबिज भाजपा और कांग्रेस भी कमलनाथ के नेतृत्व में लोगों से घोषणा पत्र के लिए सुझाव मांग रही है। यह मौका है तब पार्टियां मप्र के भविष्‍य को रेखांकित कर अपना घोषणा पत्र बनाए। इसमें वास्‍तविकता का आधार हो, लोक लुभावनी घोषणा की चमक नहीं। उसमें मुद्दों को वोट की दुधारू क्षमता वाले मुद्दों पर ही फोकस न हो। तब तो घोषणा पत्र का कोई औचित्‍य होगा अन्‍यथा तो यह कवायद हर चुनाव के पहले होती। और गाय की तरह हमसे जुड़े सभी मुद्दे ऐसे ही ज्वलंत बने रहेंगे।

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