शिक्षा विभाग के अधिकारी पहले भी दे चुके हैं ड्रेस घोटाले को अंजाम

शिवपुरी । शिक्षा विभाग में इन दिनों स्कूली बच्चों की गणवेश खरीदी की प्रक्रिया का मामला सुर्खियों में है। शिवपुरी में गणवेश खरीदी की प्रक्रिया का मामला वर्ष 2011 में भी विवादों में रहा था। वर्ष 2011 में शिक्षा विभाग के कई अधिकारी व शिक्षकों ने डे्रस माफिया के साथ इस खरीदी में लाखों के बारे न्यारे किए थे। वर्ष 2011 में डे्रस खरीदी के नाम पर शिक्षा विभाग के कुछ अधिकारियों ने ड्रेस सप्लायरों से घटिया कपड़े की गणवेश खरीदी जो बाद में जांच के दौरान फेल पाई गई। इस मामले में तत्कालीन कलेक्टर राजकुमार पाठक ने कार्रवाई करते हुए 11 फर्मों का भुगतान रोक दिया था। बुराहनपुर हैंडलुम में इस ड्रेस के कपड़े की जांच कराए जाने के दौरान अधिकतर सप्लायर फर्मों का कपड़ा घटिया निकला था। जिस पर कलेक्टर राजकुमार पाठक ने कार्रवाई करते हुए सप्लायरों का 25 से 40 प्रतिशत तक भुगतान रोक दिया था। बताया जाता है कि उस समय शिक्षा विभाग के डीपीसी कार्यालय में पदस्थ रहे कुछ अधिकारियों की ड्रेस सप्लायरों से मिलीभगत रही थी और इसी मिलीभगत के चलते टेंडर में कपड़ा कुछ लगाया गया था और बाद में घटिया कपड़ा ड्रेस में लगाया गया लेकिन बाद में एक शिकायत के बाद जब कपड़े की जांच हुई तो यह सैंपल फेल पाए गए।
बदली पॉलिसी का फायदा उठाना चाहते हैं शिक्षा विभाग के अधिकारी
वर्ष 2011 में खरीदी प्रक्रिया विवादों में रहने के बाद शासन ने गणवेश वितरण की पॉलिसी में परिवर्तन करते हुए छात्रों व पालकों के खातों में ही ड्रेस की राशि डालने का का काम शुरू कर दिया। इसके बाद इस साल फिर से सरकार ने इस पॉलिसी में परिवर्तन करते हुए राज्य आजीविका ग्रामीण आजीविका मिशन की गरीब महिलाओं को रोजगार देने के उद्देश्य से इस पॉलिसी में परिवर्तन किया जिसमें महिला समूहों से निर्माण के बाद गणवेश खरीदी जाना है लेकिन इस पॉलिसी से शिक्षा विभाग और ड्रेस माफिया के हित नहीं सध रहे हैं। इसलिए इस बार महिला समूहों के गणवेश निर्माण की प्रक्रिया को विवादों में ला दिया गया है। सूत्रों ने बताया है कि शिक्षा विभाग के अधिकारी चाहते हैं कि महिला समूहों की बजाए फिर से डे्रस माफियाओं से ही पूरी खरीदी हो जाए और इन्हें कमीशन मिल जाए। आजीविका समूह की महिलाओं से इन्हें कोई कमीशन मिलने वाला नहीं इसलिए पूरी प्रक्रिया को ही विवादों में ला दिया गया है। जबकि भाजपा सरकार की मंशा है कि ज्यादा से ज्यादा महिलाओं को इसके जरिए रोजगार मिल सके।
मामला फिक्स नहीं हुआ तो विवादों में लाई गई प्रक्रिया
शिवपुरी में शिक्षा विभाग में पदस्थ रहे एक अफसर की प्लानिंग थी कि एक साथ ही कुछ डे्रस सप्लायरों से समूहों के नाम पर गणवेश खरीदी कर अपना कमीशन ले लिया जाए लेकिन यह खरीदी प्रक्रिया में अपना मामला फिक्स नहीं कर सके। इसलिए पूरी प्रक्रिया को ही विवादों में ला दिया गया। इस पूरे खेल में गणवेश का काम करने वाले कुछ डे्रस सप्लायर भी हैं जो अपने धंधे को देखते हुए इस खेल को विवादित बना रहे हैं।
पूर्व में इन फर्मो का रोका गया था पेमेंट
शिवपुरी में पूर्व में जो घटिया क्वालिटी की गणवेश सप्लाई हुई उसमें तत्कालीन कलेक्टर ने सांखला क्लॉथ कॉरपोरेशन शिवपुरी, सूरत साड़ी सेंटर भिंड, शांति सेल्स कॉपोरेशन शिवपुरी, संजय प्रिंटर्स दतिया, बृजेश कुमार, सुभम टे्रडर्स दतिया, सुनीत तलवानी दतिया, दुर्गा टे्रडर्स मुरैना, ओम कटपीस, अंबेडकर टे्रडर्स शिवपुरी नामक फर्मों का पेमेंट कटौती कर किया गया था।
क्या कहते हैं डे्रस सप्लायर
यह सच है कि हमारी फर्म का पेमेंट रोका गया था लेकिन जो डे्रस सैंपल हमारे लिए गए थे वह हमारे सामने नहीं लिए गए थे। जो सैंपल फेल हुए थे उसके खिलाफ हमने आपत्ति भी लगाई थी।
अजय सांखला
डे्रस सप्लायर शिवपुरी
मेरे कार्यकाल के दौरान जो गणवेश सप्लाई हुई थी उस डे्रस के कपड़ों की हमने जांच कराई थी। जांच में कई फर्मों के कपड़े की क्वालिटी घटिया थी। इसमें कुछ शिवपुरी के डे्रस सप्लायर भी शामिल थे। हमने कार्रवाई करते हुए इनका पेमेंट रोक दिया था और कटौती भी की थी।
राजकुमार पाठक, तत्कालीन कलेक्टर शिवपुरी

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