अकबर हटे, राजनीति के टर्फ पर मोदी सरकार का ‘सेल्फ-गोल’

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विदेश राज्यमंत्री एमजे अकबर का इस्तीफा एक ऐसा राजनीतिक घटनाक्रम है, जिसके कई पहलू हैं और उसके हर पहलू की मीमांसा राजनीति और समाज के उन अनछुए और अनबुझे कोनों को खोलती है, जहां महिला-सरोकारों से जुड़े सवाल मकड़ी के जालों की तरह उलझे नजर आते हैं। ’मी टू’ मुहिम के अंतर्गत महिला पत्रकारों के यौन उत्पीड़न के मामले में विदेश से लौटने के बाद अकबर ने बड़ा ही फलसफाना बयान दिया कि ’झूठ के पैर नहीं होते, लेकिन उसमें जहर होता है, जिसे उन्माद में बदला जा सकता है। ये बहुत ही तकलीफदेह है। मैं इस पर उपयुक्त कानूनी-कार्रवाई करूंगा।’ इसी तारतम्य में अपने फलसफाना अंदाज को आगे बढ़ाते हुए अकबर ने सियासत के तीर दागते हुए यह सवाल उछाला था कि महिला-पत्रकार चुनाव के पहले ही यह मुद्दा लेकर सामने कयों आई हैं?
अकबर के कथन का पहला हिस्सा भावुकता की गीली कोरो से समाज की धारणाओं के बरगलाना और पिघलाना था। उनकी असली मंशा बयान के दूसरे हिस्से मे झलकती है, जिसमें उन्होंने इस खुलासे के टाइमिंग को लेकर सवाल खड़े किए थे। इस्तीफे के पहले भाजपा-संगठन और सरकार के नाक नीचे अकबर के बचाव में जितनी भी गतिविधिया चलीं, उसकी बुनियाद में सिर्फ राजनीतिक कोण और यह अहंकार था कि किसी भी सवाल को वो अपने मुताबिक तोड़-मरोड़ कर वो अपने राजनीतिक हितों का संवर्धन कर सकते हैं। यह मोदी-सरकार और भाजपा की रणनीतिक चूक थी। भाजपा ने यह समझने में भूल कर दी कि पानी के बुलबुलों को पत्थर के ढेलों में ढालना संभव नहीं हैं। देश की राजनीति का ओछापन भले ही रसातल में हो, फिर भी लोगों की समझ और समाज का मनोविज्ञान इतना नाकारा नहीं हुए है कि महिलाओं की अस्मत और अस्मिता के मुद्दों में वोटों की राजनीति तलाश करे।
अकबर की प्रताड़नाओं की शिकार प्रिया रमानी या गजाला वहाब जब लोकलाज की हदों के पार जाकर उनके साथ होने वाली ज्यादतियों को बयां कर रही थीं, तब वो सेक्स से जुड़ी रहस्य-रोमांस की मनोहर कहानियों के एसाइनमेंट पर काम नहीं कर रही थीं कि कोई व्यक्ति कैसे उनके सीने पर हाथ रख देता था और नितंबों को सहलाता था। यह एक ऐसा सच था, जो तीर की तरह आत्मा को बेधता है। अकबर के इस मंतव्य में ओछापन झलकता है कि महिला पत्रकार अपनी अस्मत और अस्मिता को गिरवी रख कर राजनीति का इंस्ट्रूमेंट बन रही हैं, क्योंकि उन्होंने आरोप लगाने का वक्त चुनाव के इर्दगिर्द चुना है। दिलचस्प यह है कि भाजपा ने भी अकबर के इस कथन को मौन रहकर एंडोर्स किया है। कल्पनातीत है कि देश की प्रबुद्ध महिलाएं राजनीतिक मुद्दा बनाने के लिए अपनी अस्मत और आबरू के दर्दनाक किस्सों को किसी राजनीतिक दल के हवाले कर देंगीं।
राजनीति की ओछी इबारत लिखते समय अकबर इस बात को दरगुजर कर गए कि भले ही झूठ के पैर नहीं हों, लेकिन सत्य का राडार भी बहुत ही बारीक, संवेदनशील और ताकतवर होता है। सच्चाई का राडार छल-प्रपंच और झूठ की महीन से महीन परछाईं को भी पकड़ लेता है। सच कभी भी हारता नहीं है। कह सकते हैं कि अकबर के झूठ के पैर नहीं थे, इसलिए वह लंबा नहीं चल सका और उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। अकबर को इस्तीफे का यह एपीसोड सात दिनों तक यूं ही नहीं चला है। भाजपा ने खेल में आसानी से हार नहीं मानी है। भाजपा पर नैतिक दबाव बनाने के लिए मंगलवार को ही कांग्रेस ने यौन प्रताड़नाओं के आरोपों से घिरे अपने एनएसयूआई के राष्ट्रीय अध्यक्ष फिरोज खान को हटा दिया था। महिला-सशक्तिकरण का दम भरने वाली भाजपा की राहें ’मी टू’ अभियान के चलते सिकुड़ती जा रही थी। भाजपा ने बंद गली के आखिरी सिरे पर पहुंच कर इस्तीफा लिया है। राजनीति के मैदान में मोदी सरकार ‘सेल्फ-गोल’ करके मैदान से हटी है। प्रिया रमानी के समर्थन में एशियन एज की 20 महिला पत्रकारों के बागी रूख ने मोदी सरकार को पीछे हटने को मजबूर किया है। लोगो में यह धारणा बनने लगी थी कि महिला सशक्तिकरण के सरकारी दावे खोखले और दोगले हैं। सबसे बड़ी बात आरएसएस भी इससे नाराज था।

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