मीडिया-चैट में ट्रोल-आर्मी को झुठलाते राहुल गांधी

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पिछले दो दिनों से राहुल गांधी इंदौर, उज्जैन, धार व झाबुआ के चुनावी दौरे पर थे। प्रवास के दौरान 30 अक्टूबर, 18 को राहुल इंदौर-भोपाल के कुछ चुनिंदा संपादकों और प्रमुख मीडिया-कर्मियों से मुखातिब हुए। घंटे-सवा घंटे की यह अनौपचारिक ’मीडिया चैट’ इस मायने में दिलचस्प थी कि इस दरम्यान राहुल की भाव-भंगिमाओं को नजदीक से ’ऑब्जर्व’ करने का मौका मिला। निदा फाजली का एक शेर है कि- ’हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी, जिसको भी देखना हो, कई बार जाकर देख।’ निदा फाजली के इस शायराना-अंदाज को ’सोशल-साइंस और सायकोलॉजी के जानकार भी एंडोर्स करते हैं कि किसी भी शख्सियत के एक नहीं, अनेक पहलू होते हैं। निदा फाजली के अनुसरण में राहुल के नजदीक पहुंचने पर उनका वह रूप भी उभरता है, जिसे सोशल मीडिया के धुंधलको ने ’ब्लर्ड’ कर दिया है। राहुल के बारे में दिलचस्प पहलू यह है कि व्यक्तित्व की सामान्य कसौटियों से इतर उनकी शख्सियत पर बदरंग राजनीति के धब्बे भी चस्पा हैं, जो धारणाओं को दूषित करते हैं।
अड़तालीस साल के राहुल गांधी की जिंदगी के उतार-चढ़ाव के तमाम किस्से कहानियों में इतना गर्द जमा है कि उसके तह के भीतर की असलियत को देख पाना आसान नहीं है। उनके व्यक्तित्व के कई पहलू भाजपा और उसकी ’ट्रोल-आर्मी’ के राजनीतिक-चश्मे में तरबतर हैं। राहुल गांधी को लेकर ’ट्रोल आर्मी’ का आक्रमण इतना जबरदस्त है कि अच्छे-खासे और धाकड़ समीक्षक भी उनकी मीमांसा करते समय उन प्रायोजित और सुनियोजित खामियों के सिरे पकड़ लेते हैं, जो राहुल के व्यक्तित्व पर खराश बनकर चस्पा हैं। वैसे भी सोशल मीडिया के जमाने में प्रायोजित अवधारणाओं के खिलाफ जाना जोखिम भरा काम हो गया है। फिर मामला मोदी-सरकार के खिलाफ खड़े राहुल गांधी से जुड़ा हो तो यह रिस्क बढ़ जाती है।
मीडियाकर्मियों से बातचीत के दौरान लगा कि मैदानी राजनीति में राहुल गांधी के बारे में अब वो धारणाए पिघलने लगी हैं, जिन्हें भाजपा की ’ट्रोल आर्मी’ ने अथक प्रयासों से गढ़ा है। इसका एक सबूत यह भी है कि भाजपा ने अपने राजनीतिक-आक्रामण के केन्द्र में राहुल गांधी को ही रखा है। शायद इसीलिए कि लोग अब राहुल की बातों को गंभीरता से लेने लगे हैं। वैसे मीडिया-चैट का आयोजन उन सवालों और आरोपों से अछूता नहीं रहा, जो मोदी-सरकार और कांग्रेस की मौजूदा राजनीति का स्थायी भाव हैं, लेकिन उन्हीं में कुछ सवालों के जवाब में लगा कि राहुल वैसे नहीं हैं जैसा कि उन्हें सोशल-मीडिया पर परोसा जाता है। ’मीडिया-चैट’ मे लगा कि राहुल हर प्रकार के सवाल के लिए तैयार है, हर आरोप को सुनने का साहस है। उन्हें यह कहने में दिक्कत नहीं हैं कि उनकी यूपीए सरकार अपने दूसरे कार्यकाल मे लोगों की अपेक्षाओं पर खरी साबित नहीं हो पाई। उनकी ’बॉडी-लेंग्वेज’ और उनके जवाबों में भाजपा के प्रति आक्रामकता और निडरता का भाव उनके अगले राजनीतिक-रोडमेप को स्पष्ट करता है कि वो रुकने वाले नहीं हैं। उन्हें लगता है कि देश की ’डेमोक्रेसी’ से जुड़े बुनियादी सवाल उनकी ’मॉरल-अथॉरिटी’ में इजाफा कर रहे हैं।
चुनावी राजनीति के गूढ़ सवालों के जवाब में भी सरलता, सहजता, नेक-नीयत, साफगोई और पारदर्शिता थी। खड़ूस राजनीति के इस खतरनाक दौर में यह राजनीतिक-व्यवहार अनपेक्षित है। भले ही उनके लिए यह नुकसानदेह हो, लेकिन वो आज भी इस बात पर कायम है कि अपराधियों को टिकट नहीं दिया जाना चाहिए। वो मानते हैं कि इस मुद्दे में कांग्रेस में मतैक्यता नहीं हैं। कई बड़े नेताओं का मत है कि आरोप और अपराध के बीच खींची जाने वाली रेखा काफी महीन है। इसे स्पष्ट करने के लिए उन्होंने कमलनाथ को आगे कर दिया कि वो इस बारे मे अपनी राय रखे। कमलनाथ ने खुलासा किया कि राजनीति का शिकार होने वाले कार्यकर्ताओं को अपराधी करार देना मुनासिब नहीं है। ऐसी ही दलीलों के बीच राहुल ने कहा कि उन्हें भरोसा है कि मप्र के नेता इस कारण का नाजायज फायदा नहीं उठाएंगे। सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश के मामले में राहुल सुप्रीम कोर्ट के फैसले के साथ हैं, लेकिन केरल की कांग्रेस परम्पराओं के साथ खड़ी रहना चाहती है, जिसको वो पसंद नहीं करते हैं। दोनों मसले राहुल के ’डेमोक्रेटिक-एटीट्यूड’ को दर्शाते हैं। कांग्रेस के दीगर नेताओं के लिए यह अच्छा संकेत है कि उनका अध्यक्ष उन पर अपनी पसंद नहीं लाद रहा है। राहुल गांधी अब पक चुके हैं।

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