कांग्रेस की त्रयी में नाथ-दिग्‍गी ने लंबी खिंची रेखा, सिंधिया क्यों पिछड़े?

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मप्र विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पूरी ताकत एकत्रित कर भाजपा को चुनौती देने में जुटी है। मई में प्रदेश अध्‍यक्ष का पद संभालने के बाद से अब तक कमलनाथ लगातार कह रहे हैं कि यह करो या मरो का मौका है। किसी भी सूरत में भाजपा को सत्‍ता से बाहर करना है। इस काम में वरिष्‍ठ नेताओं को गुटबाजी भूला कर अलग-अलग जिम्‍मेदारियां दी गईं। पूर्व मुख्‍यमंत्री दिग्विजय सिंह को समन्‍वय का काम दिया गया तो मुख्‍यमंत्री पद के प्रमुख दावेदार सांसद ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया को प्रचार की बागडोर सौंपी गई। अब जबकि चुनाव में एक पखवाड़ा शेष है यह बड़ा हतप्रभ करने वाला तथ्‍य है कि सिंधिया मप्र के चुनावी परिदृश्‍य से लगभग गायब से हैं जबकि कमलनाथ और दिग्विजय अपनी कोशिशों को हर संभव तरीके से अंजाम दे रहे हैं।
मप्र कांग्रेस का जिक्र किया आता है तो नाथ, दिग्‍गी और सिंधिया के साथ पूर्व केन्‍द्रीय मंत्री सुरेश पचौरी, अरुण यादव, विवेक तन्‍खा जैसे अन्‍य नेताओें का उल्‍लेख होता है। इन सभी को मप्र के विधानसभा चुनाव में अलग-अलग जिम्‍मेदारियों मिली है मगर हम यहां केवल नाथ, सिंह और सिंधिया की बात कर रहे हैं क्‍योंकि इन्‍हीं तीनों के आसपास कांग्रेस की पूरी रणनीति घूम रही है। कुछ समय पहले तक तीनों नेताओं ने प्रदेश कांग्रेस कार्यालय से दूरी बना रखी थी मगर ज्‍यों ही कमलनाथ अध्‍यक्ष बने, दृश्‍य बदला। दिल्‍ली या अपने क्षेत्र छिंदवाड़ा में रहने वाले नाथ ने धीरे-धीरे भोपाल में सक्रियता बढ़ाई तो दिग्विजय ने सौंपे गए समन्‍वय के काम को पूरा करने के लिए अपनी पूरी टीम को सक्रिय किया। वे विरोधी माने जाने वाले नेताओं के घर भी गए। कांग्रेस से रूठे नेताओं को मनाने का जतन पूरे मनोयोग से किया। वे बार-बार कह रहे हैं कि कांग्रेस जीत रही है और इस बार मध्य प्रदेश की जनता भाजपा को उसी तरह का सबक सिखाने जा रही है जैसा कि 2003 में कांग्रेस को सिखाया था।
दिग्विजय हमेशा अपने कहे और किए से चौंकाते हैं तो वे इस बार भी ऐसा ही कर रहे हैं। वे अपनी सरकार की पराजय पर टिप्‍पणी करते हुए भाजपा को घेर रहे हैंवे उम्‍मीद कर रहे हैं कि वे नाराज खुद लोगों के पास जाएंगे उन्‍हें राजी कर लेंगे। एकतरफ उन्‍होंने मनावर में जयस नेता हीरालाल अलावा के साथ खड़े हो कर उन्‍हें आश्‍वस्‍त किया तो भोपाल में बागी हुए संजीव सक्‍सेना को मना कर कांग्रेस के पक्ष में किया। टिकट कटने से नाराज अपने समर्थक प्रदेश कांग्रेस के कोषाध्यक्ष गोविंद गोयल के घर करीब दो घंटे रूक कर उन्‍हें भी मनाने का जतन किया। दूसरी तरफ, कमलनाथ पार्टी के दीगर कामों को खूबी से अंजाम दे रहे हैं। संजय मसानी के पार्टी में प्रवेश को लेकर चाहे जो राय बनी हो लेकिन नाथ ने किसी तरह भाजपा को घेरने की रणनीतियां तो बनाई।
मगर इस पूरी कवायद में सिंधिया गायब से हैं। मध्यप्रदेश चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष सिंधिया ने प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में कक्ष लिया जरूर लेकिन वे यहां बैठे नहीं। मप्र भी उनका आना कम ही हुआ। जब उन्‍होंने समिति अध्‍यक्ष का पद संभाला था तब कहा गया था कि प्रचार कार्य आरंभ होते ही सिंधिया की सक्रियता बढ़ेगी मगर मतदान के 15 दिन पहले तक वे वैसे ही हैं जैसे एक साल पहले थे। सिंधिया ने अपने समर्थकों को जीत के विश्‍वास के साथ टिकट दिलवाया है। वे जानते हैं कि उन पर अपने इन समर्थकों को जिताने का भी दबाव है। फिर कांग्रेस को भी तो अपने इस स्‍टार प्रचारक का समय चाहिए ही। चुनाव के शीर्ष काल में सिंधिया केवल राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष राहुल गांधी के दौरों के दौरान ही सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। वे 12 व 13 नवंबर को प्रदेश में चुनावी सभाएं लेंगे लेकिन उनमें उस ऊर्जा का अभाव दिखाई दे रहा है जो उन्‍होंने मंदसौर गोलीकांड के बाद उपवास के दौरान दिखाई थी।

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