कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने से क्‍या जयस का एजेंडा कायम रह पाएगा

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जन आदिवासी युवा शक्ति (जयस) के अध्‍यक्ष डॉ. हीरालाल अलावा कांग्रेस के टिकट पर मनावर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ेंगे…। कांगेस की पहली सूची में अलावा का नाम देख उनके ही संगठन के पदाधिकारियों में नाराजी छा गई। जयस एक राजनीतिक लक्ष्‍य लेकर बना संगठन है और उसने अपना एजेंडा पूरा करने के लिए कांग्रेस सहित सभी दलों के लिए अपने दरवाजे खुले रखे थे। फिर ऐसा क्‍या हुआ कि अलावा पर समझौता करने और संगठन को कमजोर करने के आरोप लगने लगे। डॉ. अलावा के बहाने यह सवाल भी उठ रहा है कि अपने तयशुदा राजनीतिक एजेंडे के लिए बने तथा जनसमर्थन पाने वाले संगठनों की भविष्‍य की राह कैसी होनी चाहिए? क्‍या उन्‍हें अपने एजेंडे को छोड़ मुख्‍यधारा की राजनीति में बह जाना चाहिए? क्‍या अब डॉ. अलावा जयस का एजेंडा पूरा करेंगे या कांग्रेस के स्‍वर से अपना स्‍वर मिलाएंगे?

जयस पिछले कुछ सालों में बना संगठन है। उसने निमाड़-मालवा में अपनी पकड़ बनाई। यह वह क्षेत्र है जहां के आदिवासी मंडला-डिंडौरी आदि जिलों आदिवासियों से अधिक सम्‍पन्‍न और राजनीतिक चेतना वाले हैं। यहां जयस नेताओं ने आदिवासी हक की बात की और आदिवासियों को अपने संग किया। उसने नारा दिया कि अब की बार आदिवासी सरकार। संगठन ने आदिवासी मुख्‍यमंत्री जैसी बरसों पुरानी मांग को हवा दी और इस बार आदिवासी मुख्‍यमंत्री की मांग करते हुए विधानसभा चुनाव में गठबंधन के लिए हर दल के लिए दरवाजे खुले रखे। जयस को ताकतवर संगठन माना जाने लगा क्‍योंकि प्रदेश में 47 आरक्षित सीटें हैं जहां वह आदिवासियों में प्रभावी उपस्थिति दिखा सकता है। इसके अलावा प्रदेश में 33 सीटें ऐसी हैं जो आदिवासियों के लिए आरक्षित तो नहीं है, लेकिन उन पर आदिवासियों का वोट निर्णायक होता है।

मप्र की कुल जनसंख्या की लगभग 20 प्रतिशत आबादी आदिवासी है। सामाजिक और  मनोवैज्ञातनक विविधताओं के कारण यह आबादी कभी व्‍यापक राजनीतिक दबाव समूह की तरह पेश नहीं हुई है। मध्‍यप्रदेश में भौगोलिक विभिन्‍नता की तरह ही आदिवासियों के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक अवस्‍थाएं भी अलग-अलग हैं। मालवा-निमाड़ में अधिक राजनीतिक चेतन्‍यता दिखाई देती है तो सहरिया और कोरकू आदिवासियों में ये सजगता अपेक्षाकृत रूप से कम है। समय-समय पर प्रदेश की राजनीति में आदिवासी नेतृत्‍व तेजी से उभरता है और फिर अचानक गायब हो जाता है। ऐसे में जब 2013 में मध्यप्रदेश के बडवानी जिले में पहली फेसबुक आदिवासी पंचायत बुलाई गई, जिसमें करीब ढाई सौ लोग शामिल हुए और बीते वर्ष महाविद्यालयों के छात्र संघ चुनावों में एक तरफा जीत हासिल हुई तो जयस की ओर ध्‍यान आकृष्‍ट हुआ। जयस ने कहा कि आदिवासी सांसद और विधायक अपनी पार्टी का प्रचार करने में व्यस्त हैं। आदिवासी इलाकों में भयंकर भूखमरी, कुपोषण, पलायन, बिजली, बेराजगारी, सड़कें और बदतर स्वास्थ्य सेवाओं जैसे मुद्दे बरसों से कायम हैं। दावा किया गया कि समाज के सक्रिय युवा जयस के जरिए विधानसभा और लोकसभा जैसे नीति निर्माता संस्थानों में पहुंचकर आदिवासियों के अधिकारों की बात उठाएंगे।

तो क्‍या अलावा और उनके संगठन के अन्‍य सदस्‍य कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीत कर विधानसभा में अपनी इन मांगों को आवाज दे पाएंगे? क्‍या बिना किसी खुले गठबंधन के कांग्रेस के साथ आ जाने पर जयस का राजनीतिक एजेंडा खतरे में नहीं पड़ गया है? ऐसे समय में जब तय राजनीतिक लक्ष्‍य वाले संगठनों को अपने कैडर को मजबूत बनाने का काम करना चाहिए सत्‍ता की दौड़ में खो जाना अवसरवादिता नहीं है? क्‍या ऐसे निर्णयों से जनता में नए तैयार होते संगठनों के प्रति अविश्‍वास नहीं उपजेगा?

सौदेबाजी की राजनीति और ऐसे अविश्‍वास के कारण ही लोगों का अब क्षेत्रीय दलों से भी भरोसा उठने लगा है। जयस, सपाक्‍स जैसे संगठन जब राजनीति में आते हैं तो उनसे कई लोगों की उम्‍मीदें जुड़ जाती हैं। वे वैकल्पिक राजनीति का चेहरा बन उभरते हैं लेकिन जब किन्‍हीं मजबूरियों के चलते बड़े दलों का ‘पुर्जा’ बन जाना पड़ता है तो सबसे पहले विकल्‍प की राजनीति ही चोट खाती है। जयस या डॉ. अलावा ने कांग्रेस के साथ क्‍या और किन मजबूरियों में समझौता किया यह जानकारी नहीं है लेकिन जनता का विश्‍वास जीतने के लिए उन्‍हें अभी स्‍वयं को साबित करना होगा।

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