कमलनाथ : अधीरता के दौर में ‘बरगद’ के नीचे गुलशन महकाने की आस

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कांग्रेस की सरकार बने 5 दिन हो गए अब तक कर्ज माफी को लेकर कुछ न हुआ…? अब तो अंधेरे में रहने के आदी हो जाइए, कांग्रेस की सरकार जो आ गई है…। अधीरता की कुछ ऐसे ही प्रतिक्रियाओं के बीच कमलनाथ 17 दिसंबर को मप्र के मुख्यमंत्री की शपथ लेने जा रहे हैं। कमलनाथ एक सुलझे हुए, परिपक्व, गंभीर और ‘टू द पाइंट’ बात करने वाले राजनेता है जो लक्ष्य पूरा होने तक विश्राम नहीं करता। वे ऐसे समय में प्रदेश में सत्ता सूत्र संभाल रहे हैं जब उनसे गांवों से लेकर शहर तक कई तरह की उम्मीदें और आस बांध ली गई हैं। बाकी सारी तुलनाएं एकतरफ उनका अपना राजनीतिक कद ही ऐसी चुनौती है कि वे स्वयं निवृत्त मान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की लोकप्रियता से आगे जा कर जनता की उम्मीदों पर खरा उतरे। यहां तक कि उनके मंत्रियों के लिए भी कमलनाथ की राजनीतिक स्टाइल के साथ कदमताल करना खासी चुनौती होगा। यानि, टीम कमलनाथ को मप्र में बरगद के साए में बुलशन आबाद करना है।

यह सोशल मीडिया में फटाफट प्रतिक्रिया का दौर है। यहां बीज के अंकुरित हो पौध बनने में लगने वाले प्राकृतिक समय जितना धैर्य भी अब नहीं रहा। जल्दबाजी इतनी कि क्लिक करते ही परिणाम सामने आना चाहिए। ऐसे अधैर्य के समय में मप्र की कमान कमलनाथ संभाल रहे हैं जिन्हें अपने मुखिया द्वारा किए गए 10 दिन में किसान कर्ज माफी केवायदे को पूरा करना है। इस चुनौती को जानते हुए कि मप्र सरकार पर पहले से ही अधिक कर्ज है। हालांकि, कांग्रेस नेता यह बात उस वक्तर भी जानते थे जब वे कर्ज माफी का वादा कर रहे थे। इसलिए, कर्जमाफी करना चुनौती नहीं है। चुनौती है कि कैसे उन तमाम उपेक्षाओं को पूरा करें जिन्हें जनता ने अपनी नई सरकार से बांध ली है। नाथ की मुश्किल यह है कि केन्द्र में भाजपा की सरकार है। क्या उन्हें केन्द्र से ऐसा साथ मिलेगा जैसा उन्होंने मंत्री रहते हुए मप्र की भाजपा सरकारों को दिया है? ऐसा साथ न मिला तो संसाधनों की कमी उनके लिए बड़ा सिरदर्द साबित होगी। विपरित परिस्थितियों में रास्ता निकालना, तुरंत निर्णय करना, प्रशासनिक मशीनरी को अपने अनुसार साधना तथा ‘पोलाइट और डिप्लोमेटिक’ मुखिया की तरह काम करना कमलनाथ के लिए मुश्किल न होगा। वे तो मंझे हुए राजनेता तथा मंत्री रहे हैं। मगर, उनकी टीम के सदस्यों को अधिक सधा हुआ बर्ताव करना होगा। प्रदेश कांग्रेस के कई कद्दावर नेता यह चुनाव हार गए हैं। दूसरी या तीसरी बार चुने गए विधायकों को शासन का वैसा अनुभव नहीं है जैसा पूर्व मंत्रियों को रहा है। इसलिए, बेहतर होगा कि वे सरकार को विवादों में डालने वाले बयानों और अति उत्साह से बचते हुए केवल अपने मुखिया के इशारों और निर्देशों को समझ उनका पालन करते रहें। आमतौर पर किसी भी व्यक्ति या सरकार को कार्य आरंभ के कुछ दिन रियायत के रूप में मिलते हैं कि वह क्रीज पर आए, माहौल भांप कर कुछ देर जम ले फिर चौके-छक्के मारे। मगर कमलनाथ सरकार को यह ‘हनीमून पीरियड’ नहीं मिलने वाला। उनके सामने लक्ष्य 2019 के आम चुनाव है। यही उनकी परीक्षा भी। यूं तो चुनाव अप्रैल में होंगे मगर आचार संहिता 45 दिन पहले लग जाएगी। इसलिए सरकार के पास काम करने के लिए कुल जमा ढ़ाई माह का समय है। इतने से समय में उन्हें शिवराज की लो‍कप्रियता को धूमिल कर अपनी सरकार की चमक दिखलानी होगी। निर्णयों में तेजी रखते हुए उनके अमल को भी सुनिश्चित करना होगा। ताकि, लोकसभा चुनाव में कांग्रेस अधिक सफल होते हुए भाजपा से ज्यादा मत प्राप्त कर सके। आखिर, राहुल गांधी भी तो कमलनाथ से यही उम्मीद कर रहे होंगे जैसी उन्होंने मप्र कांग्रेस का अध्‍यक्ष बनाते हुए की थी।

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