बुलंदशहर हिंसा:अराजकता समस्या का समाधान नहीं

-सुरेश हिन्दुस्थानी
अभी हाल ही में उत्तरप्रदेश के बुलंदशहर में हुई घटना की जितनी निन्दा की जाए, वह कम ही है। वास्तव में इस प्रकार की हिंसा भारतीय संस्कृति के वातावरण को प्रदूषित करने का काम ही करती हैं। फिर भी घटना के मूल में क्या है? इसका भी ध्यान रखा जाना चाहिए। हमारे देश के प्रचार तंत्र कभी भी घटना के मूल कारणों पर उतना फोकस नहीं करते, जितना उसके बाद हुई घटनाओं पर करते हैं। हम जानते हैं कि भारत का मूल भाव समता मूलक अवधारणा है। वर्तमान में इस अवधारणा को समाप्त करने के कार्य भी किए जा रहे हैं। घटना के मूल में यही है कि बुलंदशहर के स्याना कोतवाली के महाव गांव में गोवंश का अवशेष मिला। इसी की परिणति स्वरुप हिंसा हुई और उसमें नाराज लोगों की भीड़ ने एक पुलिस निरीक्षक की हत्या कर दी। अब यह प्रकरण पूरे देश के वातावरण को खराब करने का प्रयास कर रहा है। वास्तव में इस प्रकार की घटनाएं सभ्य समाज के लिए एक कलंक है। जिसे रोकने के उपाय करना ही चाहिए।
भारत में सभी धर्म और संप्रदायों की आस्था और श्रद्धा का सम्मान करने की सनातन काल से परंपरा रही है। जहां इस प्रकार का भाव समाहित होता है, वहां निश्चित रुप से इस प्रकार की घटनाएं जन्म नहीं लेती हैं। यह सभी जानते हैं कि हर धर्म की अपनी मान्यताएं होती हैं। जब इन मान्यताओं पर हमला किया जाता है तो स्वाभाविक रुप से उसकी प्रतिक्रिया होती ही है। यहां एक बात कहना बहुत ही जरुरी है कि संवेदनशील हृदय में क्रिया की प्रतिक्रिया होती ही है। इसी प्रकार भारत के मानबिन्दुओं से समाज की संवदेनाएं बहुत गहरे तक जुड़ी हैं। जब इन संवदेनाओं को आहत किया जाता है तो उसके बाद ही बुलंदशहर जैसी घटनाओं का जन्म होता है। सर्वधर्म समभाव को बढ़ावा देने वाले हर समाज का यह कर्तव्य है कि वह अन्य समाज की भावनाओं को भी समझने का प्रयास करे, क्योंकि यही भारत का मूल स्वभाव है।
भारत के कई राज्यों में गौहत्या पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा हुआ है, उसके बाद भी यदि गौहत्या होती है तो उसके लिए प्रशासन तो जिम्मेदार है ही साथ ही भारत के नागरिक भी जिम्मेदार हैं। प्रतिबंध एक प्रकार से कानून ही है। इसलिए कानून की अवहेलना करने का अधिकार किसी भी समाज को नहीं है। बुलंदशहर में पहले इस कानून की हत्या की गई और बाद में उत्तेजक भीड़ ने हिंसा का रास्ता अपनाया। यह स्वाभाविक ही है कि पहले की घटना नहीं होगी तो स्वाभाविक ही है कि बाद की घटना पर भी अंकुश लग सकेगा।
बुलंदशहर जैसी घटनाएं निसंदेह प्रतिक्रियात्मक ही होती हैं। ऐसी घटनाओं का अभी ज्ञात इतिहास यही है कि सभी घटनाएं प्रतिक्रिया स्वरुप ही हुई हैं। यह बात सर्वकालीन सत्य है कि गाय भारत के हिन्दू समाज के लिए पूजनीय है, जिसमें सभी देवी देवताओं का निवास है। इस कारण सवाल यही है कि कोई भी धर्म या संप्रदाय किसी अन्य धर्म के देवी देवताओं या गौमाता पर हमला करने की छूट कैसे देता है? कोई धर्म किसी की हत्या को कतई प्रोत्साहित नहीं करता, फिर ऐसी घटनाएं क्यों होती है। जब हम इस बात को जानते हैं कि हिन्दू समाज की आस्था गाय से जुड़ी है तो अन्य समाज ऐसे कार्य क्यों करता है, जिससे समाज की भावनाएं आहत हों। आस्था और श्रद्धा का सम्मान सभी को करना चाहिए। अगर ऐसा नहीं होगा तो स्वाभाविक रुप से सवाल यही उठता है कि क्या ऐसे कृत्य सामाजिक समरसता के भाव को समाप्त करने के लिए ही किए जा रहे हैं। हमारे देश की विसंगति देखिए गौहत्या करने वालों को भी राजनीतिक संरक्षण प्राप्त हो जाता है तो वहीं उसके बाद होने वाली हिंसा को भी प्रोत्साहन मिल जाता है। फिर ऐसे प्रकरणों पर राजनीति भी होने लगती है, तब यह गृह युद्ध जैसी स्थिति को निर्मित करने जैसा ही लगता है।
गोवध पूरी तरह से निषेध होने के बाद भी गोवंश काटे जाने की घटनाएं सरकारों के लिए खुली चुनौती है। ऐसी घटनाओं के बाद जनता का आक्रोषित होना भी समझ में आता है, लेकिन इसका तात्पर्य यह बिलकुल भी नहीं है कि उसके विरोध स्वरुप मानवीयता की सीमाओं को लांघते हुए अराजक स्थिति पैदा कर दी जाए और ऐसी अराजकता में किसी की जान चली जाए तो यह अक्षम्य अपराध ही माना जाएगा।
हालांकि यह सच है कि जो समाज गाय को पूजनीय मानता है, वह निश्चित रुप से गौहत्या का विरोध करेगा। बुलंदशहर की घटना में हो सकता है कि भीड़ में कुछ असामाजिक तत्व भी शामिल हो गए हों, क्योंकि भीड़ तो भीड़ ही होती है, उसमें किसी की पहचान नहीं हो सकती। हो सकता है कि गौरक्षकों की छवि खराब करने के लिए ही असामाजिक तत्वों ने यह उत्पात मचाया हो। इस सब जांच का विषय है, लेकिन घटना का मूल तत्व तो यही है कि गौहत्या के बाद ही यह हिंसा हुई। ऐसा लिखकर हम किसी भी प्रकार से हत्यारों को बचाने का प्रयास नहीं कर रहे हैं, बल्कि सच यही है कि गौहत्या नहीं होगी तो गौरक्षक कभी आक्रोषित नहीं हो सकते। प्रशासन को पहले गौ हत्यारों पर कार्यवाही करना चाहिए।
जहां तक गौहत्या की बात है तो इस बात के पुख्ता प्रमाण हैं कि गाय काटने वाले इसकी तस्करी भी करते हैं, वहीं झूठे कागजों के सहारे तस्करी की गई गायों को भारत के कई राज्यों में भेजा जाता है। इतना ही नहीं खबर तो यह भी है कि भारत की गायें बांग्लादेश तक जाती हैं। इस पर सवाल यह आता है कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है। संविधान की मर्यादा को बचाने के लिए जो व्यक्ति गौरक्षक बनकर सामने आया है वह, या फिर गौहत्या करने वाला समाज। गौरक्षा के नाम पर भीड़ द्वारा जो आक्रोष व्यक्त किया जाता है, उसके कारण जो वास्तविक गौरक्षक हैं, समाज उन पर भी सवालिया निशान लगा देता है। बुलंदशहर की हिंसा में शामिल भीड़ की बारीकी से जांच की जानी चाहिए, हो सकता है कि इसमें भी असामाजिक तत्व शामिल हों।
ऐसी घटनाएं समाज पर विपरीत असर डालती हैं और सामाजिक सद्भाव भी बिगड़ता है। बुलंदशहर घटना की उच्च स्तरीय जांच कर दोषियों को दण्डित किया जाना चाहिए। यह भी देखने की बात है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गोहत्या की घटनाएं थमने का नाम क्यों नहीं ले रही हैं? यह ध्यान रखने की बात है कि ऐसी घटनाओं से समाज और राष्ट्र की छवि को ठेस पहुंचती है।

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