लोकसभा चुनाव के लिये सपा-बसपा का गठबन्धन लगभग तय !

लखनऊ, 28 दिसम्बर (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के दो प्रमुख दल समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का लोकसभा चुनाव के लिये गठबन्धन लगभग तय है और इसकी औपचारिक घोषणा पन्द्रह जनवरी को मायावती के जन्मदिन पर हो सकती है।
सपा के एक सचिव और पूर्व मंत्री ने नाम नहीं छापने की शर्त पर शुक्रवार को ‘हिन्दुस्थान समाचार’ को बताया कि उनकी पार्टी का बसपा से समझौता हो चुका है, इसकी औपचारिक घोषणा आगामी 15 जनवरी को बसपा मुखिया मायावती के जन्मदिन पर हो सकती है।
उन्होंने कहा कि गठबन्धन सपा और बसपा का होगा, इसमें कांग्रेस के शामिल होने की कोई सम्भावना नहीं है। कांग्रेस ने मध्य प्रदेश और राजस्थान के मंत्रिमंडल में सपा और बसपा के विधायकों को नहीं शामिल कर दोनों पार्टियों को स्वतन्त्र रूप से सोचने के लिये मजबूर कर दिया। वैसे भी कांग्रेस के अलग चुनाव लड़ने से प्रस्तावित गठबन्धन को फायदा ही होगा। आमतौर पर कांग्रेस और भाजपा को सवर्ण मतदाता का समर्थन हासिल रहता है। कांग्रेस यदि अलग चुनाव लड़ेगी तो भाजपा को ही नुकसान पहुंचायेगी, इसलिये वे चाहते हैं कि प्रस्तावित गठबन्धन में कांग्रेस को शामिल नहीं किया जाये।
दूसरी ओर राजनीतिक प्रेक्षक राजेन्द्र प्रताप का कहना है कि कांग्रेस से गठबन्धन कर सपा और बसपा उसे उत्तर प्रदेश में संजीवनी नहीं देना चाहेगी। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस हाशिये पर है। इस राज्य में सपा-बसपा ही भाजपा का फिलहाल विकल्प नजर आ रही हैं।
बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती कांग्रेस से गठबन्धन के हमेशा खिलाफ रही हैं।हाल ही में सम्पन्न हुये विधानसभा चुनाव में गठबन्धन के मसले पर वह कांग्रेस के रवैये से नाखुश भी हैं। लोकसभा चुनाव में बसपा, कांग्रेस से समझौता नहीं करेगी। हाल ही में दिल्ली में विपक्षी दलों की बैठक में सपा और बसपा ने शामिल नहीं होकर इसका साफ सन्देश दे दिया।
राजनीतिक विश्लेषक और समाजसेवी दिलीप यादव का कहना है कि कांग्रेस ने मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ और राजस्थान में सपा और बसपा से गठबन्धन नहीं किया तो वे उत्तर प्रदेश में उससे समझौता क्यों करेंगे। बहुत होगा तो दोनों दल कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और उनकी मां सोनिया गांधी के खिलाफ उम्मीदवार नहीं खड़ा करें।
वर्ष 2017 में उत्तर प्रदेश विधान सभा का चुनाव कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ चुकी सपा से विधान परिषद सदस्य और अखिलेश यादव के नजदीकी सुनील यादव कहते हैं कि राजनीति में परिस्थितियां बदलती रहती हैं। उस समय कांग्रेस से मिलकर चुनाव लड़ने की जरूरत महसूस की गयी थी तो मिलकर लड़ा गया लेकिन इस बार स्थिति अलग है। सैद्धान्तिक रूप से यह तय कर लिया गया है कि लोकसभा चुनाव में कांग्रेस से समझौता नहीं किया जायेगा। उन्होंने कहा कि जब कांग्रेस ने हाल ही में सम्पन्न विधानसभा चुनाव में सपा को साथ नहीं लिया तो अब चुनाव पूर्व उससे गठबन्धन का सवाल कहां पैदा होता है।
उधर, वरिष्ठ पत्रकार मनोज कुमार कहते हैं कि दोनों का चुनावी तालमेल करना राजनीतिक मजबूरी है। लोकसभा के 2014 में हुये लोकसभा चुनाव में बसपा को एक भी सीट हासिल नहीं हुई थी, जबकि सपा को मात्र पांच सीटों पर जीत हुई थी। इन पांचों सीटों पर मुलायम सिंह यादव के परिवार वाले ही जीते थे, शेष उम्मीदवार चुनाव हार गये थे। लोकसभा में दोनों दलों को अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिये मिलकर चुनाव लड़ना जरूरी है। यही मजबूरी उन्हें चुनावी राजनीति में और नजदीक ला रही है। वैसे भी, सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव कह चुके हैं कि उनकी पार्टी का बसपा से गठबन्धन लगभग तय है।
उत्तर प्रदेश में लोकसभा की सर्वाधिक अस्सी सीटें हैंँ। इस राज्य में ज्यादा सीटें हासिल करने वाली पार्टी के लिये दिल्ली दूर नहीं रह जाती। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा और अपना दल को तिहत्तर, कांग्रेस को दो और समाजवादी पार्टी को पांच सीट मिली थी। बसपा को एक भी सीट नहीं हासिल हुई थी।

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