आरटीओ की लापरवाही से ट्रैक्टरों पर नही ध्यान

हरदा । खेतों में काम आने वाले ट्रैक्टर व कृषि उपज परिवहन के लिए बनी ट्रॉलियों का अब भरपूर व्यावसायिक उपयोग हो रहा हैर्। इंट से लेकर, रेत, सरिये, लकड़ी और अन्य सामान का धड़ल्ले से परिवहन कर शासन को करोड़ों को चूना लगाया जा रहा है। हाल यह है कि जिलेभर में हजारों ट्रैक्टर और ट्रॉली आरटीओ में रजिस्टर्ड हैं लेकिन इनमें से कुछ का ही व्यवसायिक पंजीयन हुआ है। बाकी बचे ट्रैक्टरों के साथ ट्रॉलियों को बिना पंजीयन के ही दौड़ाया जा रहा है।


परिहवन विभाग द्वारा मिली भगत से कोई कार्रवाई नहीं होने से शासन तो तगड़ा फटका लग रहा है। स्थिति यह है कि जिले के चाहे जिस प्रमुख मार्ग पर चले जाइए ट्रेक्टर-ट्रॉली का प्रयोग कृषि के अलावा व्यवसायिक सामानों को ढोने में दिख जाएगा। इसके चलते दुर्घटनाओं में लोगों के मरने व घायल होने का सिलसिला नहीं रूकता है।
शासन ने ट्रेक्टर और ट्रॉली को कृषि उपयोग का वाहन मानते हुए इसे कर मुक्त रखा है। इसी बात का जिले में कई व्यवसायी लाभ उठा रहे हैं। जिलेभर में 80 फीसदी ट्रैक्टर और ट्रॉली का उपयोर्ग इंट, रेत, गिट्टी, पत्थर, सीमेंट, सरिये सहित कई तरह के परिहवन के किया जा रहा है जो नियमों के खिलाफ है। इस पर कार्रवाई की फुरसत न तो खनिज विभाग को है और न ही आरटीओ को।
पुलिस के जवान भी दिनभर शहर में ट्रैक्टरों को रेत परिवहन करते हुए देखते रह जाते है, कभी कार्रवाई नहीं होती। रेत से भरे टैकृक्टर-ट्रॉली से लोगों का रास्तों से गुजरना दूभर कर दिया है। एक हफ्ते में शहर और शहर के आसपास कई घटनाएं हुई है। इससे पहले भी वह रेत से भरे ट्रैक्टर-ट्रॉली में लोगों का सुबह के समय आम रास्तों से गुजरना दूभर कर दिया है।
पुलिस और प्रशासन को एक बार फिर से ऐसी ही किसी घटना के होने का इंतजार है। अवैध तौर से रेत परिवहन करने वाले इन टैकृक्टर्स पर पुलिस इसलिए ध्यान नहीं देती क्योंकि उन्हें रेत से भरे इन ट्रैक्टर्स से कोई लेना-देना नहीं है। एक टैकृक्टर्स मालिक ने बताया कि रेत के अवैध परिवहन के दौरान हर समय पकड़े जाने का डर रहता है। जिसके कारण ड्राइवर का ध्यान सड़क से ज्यादा आसपास की गतिविधियों में होता है। वह में एक वजह है कि ट्रैक्टर-ट्रॉली के ड्राइवर रेत सप्लाई को जल्दबाजी मे इसे लापरवाही से चलाते है। वहीं वजह है कि अक्सर इस तरह की घटनाएं सुनने को मिलती है, हालांकि टैकृक्टर-ट्रॉली मालिक यदि अपने वाहन का प्रयोग व्यावसायिक कार्य में ही करना चाहते हैं तो इसके लिए भी पंजीकरण करा सकते हैं, चूंकि व्यावसायिक पंजीकरण कराने पर हर तीन महीने पर करीब चार हजार रू टैक्स, हर साल फिटनेस टेस्ट कराना होता है। साथ ही परमिट, बीमा, रिफ्लेक्टर लोग बगैर टैक्स दिए कृषि कार्य के लिए ही परमिट कराते हैं। इनके पास सड़क पर चलने का परमिट तक नहीं होता।
शासन ने दूसरे वाहनों पर सात प्रतिशत टैक्स लगा रखा है वहीं टैकृक्टर पर महज तीन से छरू फीसदी कर ही है। इसके बाद भी कोई टैक्स जमा नहीं करा रहा है। इसके साथ ही लगभग हर टैकृक्टर के पीछे ट्रॉली लगी हुई है। लेकिन परिवहन विभाग में कुछ एक ट्रॉली ही पंजीकृत है।
लोग ट्रॉली तो बनवा रहे है कि कृषि वाहन के नाम से पंजीकृत टैकृक्टर-ट्रॉली का रेत, गिट्टी, सीमेंट, सरिया परिवहन में उपयोग की जानकारी तो है लेकिन उसका पंजीयन नहीं करा रहे हैं। इन नियमों की आड़ में कई बार कार्रवाई नहीं हो पाती।
आटो मोबाइल सेक्टर से जुड़े पितेश के मुताबिक टैकृक्टर को सड़कों पर दौड़ने के हिसाब से बनाया ही नही गया है। इसके पिछले पहिए ऊबड़-खाबड़ जमीन पर चलने के लिए बने हैं। इसमें शॉकर नहीं होते, जिससे ड्राइवर हमेशा असंतुलित मुद्रा में रहता है। अगर इस टैकृक्टर से वजनदार ट्रॉली जोड़ दी जाए तो वह असंतुलित हो जाते हैं। ट्रैक्टर में न तो पावर बे्रक होते हैं और नहीं अच्छे बे्रक पेड़। वहीं वजह है कि जब टैकृक्टर बे्रक लगाते हैं तो ट्रॉली का वजन ट्रैक्टर को रूकने नहीं देता और सब कुछ ड्राइवर के नियंत्रण से बाहर हो जाता है और हादसे हो जाते हैं।
होती है कार्रवाई-
वर्तमान में लगभग 200 टैकृक्टर-ट्रॉली मालिकों के व्यावसायिक कार्य के लिए पंजीकृत हैं और बिना व्यवसायिक पंजीकरण होने पर समय-समय पर परिवहन विभाग द्वारा जांच के बाद कार्रवाई भी करता है।
आरके अहाके, आरटीओ हरदा।

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