महाश्वेता देवी को ममता बनर्जी ने किया याद

कोलकाता । प्रख्यात लेखिका महाश्वेता देवी को जयंती के मौके पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने याद कर श्रद्धांजलि दी है। सोमवार सुबह सीएम ने इस बारे में ट्वीट किया। ममता ने लिखा कि जयंती के मौके पर आज मैं प्रख्यात लेखिका महाश्वेता देवी को याद कर रही हूं। मुश्किल घड़ी में उन्होंने मेरा साथ दिया था। वह मेरे और कई अन्य लोगों के लिए प्रेरणा रही हैं। आज उनकी कमी काफी खलती है। साहित्य में योगदान के अलावा उन्होंने आदिवासियों और पिछड़े वर्ग के लिए जो लगातार काम किया है वह हमेशा ही प्रेरणा देने वाला रहेगा। उन्हें श्रद्धांजलि।


उल्लेखनीय है कि 14 जनवरी 1926 को ब्रिटिश भारत में ढाका में जन्म लेने वाली महाश्वेता देवी सामाजिक कार्यकर्ता और लेखिका थीं। उन्हें 1996 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उनकी स्कूली शिक्षा ढाका में हुई। भारत विभाजन के समय किशोरवस्था में ही उनका परिवार पश्चिम बंगाल में आकर बस गया। बाद में उन्होने विश्वभारती विश्वविद्यालय, शांतिनिकेतन से स्नातक (प्रतिष्ठा) अंग्रेजी में किया और फिर कोलकाता विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर अंग्रेजी में किया। कोलकाता विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में मास्टर की डिग्री प्राप्त करने के बाद एक शिक्षक और पत्रकार के रूप में अपना जीवन शुरू किया। तदुपरांत आपने कलकत्ता विश्वविद्यालय में अंग्रेजी व्याख्याता के रूप में नौकरी भी की। 14 जनवरी 2018 को महाश्वेता देवी की 92वें जन्मदिवस पर गूगल ने उन्हें सम्मान देते हुए उनका गूगल डूडल बनाया।


महाश्वेता देवी का नाम ध्यान में आते ही उनकी कई-कई छवियां आंखों के सामने प्रकट हो जाती हैं। दरअसल उन्होंने मेहनत व ईमानदारी के बलबूते अपने व्यक्तित्व को निखारा। उन्होंने अपने को एक पत्रकारीका, लेखिका, साहित्यकारी का और आंदोलनधर्मी के रूप में विकसित किया। महाश्वेता जी ने कम उम्र में लेखन का शुरू किया और विभिन्न साहित्यिक पत्रिकाओं के लिए लघु कथाओं का महत्वपूर्ण योगदान दिया। पहली उपन्यास, “नाती”, 1957 में अपनी कृतियों में प्रकाशित किया गया था ‘झाँसी की रानी’ महाश्वेता देवी की प्रथम गद्य रचना है। जो 1956 में प्रकाशन में आया। स्वयं उन्हीं के शब्दों में, “इसको लिखने के बाद मैं समझ पाई कि मैं एक कथाकार बनूँगी।” इस पुस्तक को महाश्वेता जी ने कलकत्ता में बैठकर नहीं बल्कि सागर, जबलपुर, पुणे, इंदौर, ललितपुर के जंगलों, झाँसी ग्वालियर, कालपी में घटित तमाम घटनाओं यानी 1857-58 में इतिहास के मंच पर जो हुआ उस सबके साथ-साथ चलते हुए लिखा। अपनी नायिका के अलावा लेखिका ने क्रांति के तमाम अग्रदूतों और यहाँ तक कि अंग्रेज अफसर तक के साथ न्याय करने का प्रयास किया है। उनकी कुछ महत्वपूर्ण कृतियों में ‘नटी’, ‘मातृछवि ‘, ‘अग्निगर्भ’ ‘जंगल के दावेदार’ और ‘1084 की मां’, माहेश्वर, ग्राम बांग्ला हैं। पिछले चालीस वर्षों में,उनकी छोटी-छोटी कहानियों के बीस संग्रह प्रकाशित किये जा चुके हैं और सौ उपन्यासों के करीब (सभी बंगला भाषा में) प्रकाशित हो चुकी है।


इनकी कई रचनाओं पर फ़िल्म भी बनाई गई। इनके उपन्यास ‘रुदाली ‘ पर कल्पना लाज़मी ने ‘रुदाली’ तथा ‘हजार चौरासी की माँ’ पर इसी नाम से 1998 में फिल्मकार गोविन्द निहलानी ने फ़िल्म बनाई। इन्हें 1979 में साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1986 में पद्मश्री ,1997 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। ज्ञानपीठ पुरस्कार इन्हें नेल्सन मंडेला के हाथों प्रदान किया गया था। इस पुरस्कार में मिले 5 लाख रुपये इन्होंने बंगाल के पुरुलिया आदिवासी समिति को दे दिया था। साहित्य अकादमी से पुरस्कृत इनके उपन्यास ‘अरण्येर अधिकार’ आदिवासी नेता बिरसा मुंडा की गाथा है। उपन्यास ‘अग्निगर्भ’ में नक्सलबाड़ी आदिवासी विद्रोह की पृष्ठभूमि में लिखी गई चार लंबी कहानिया है।28 जुलाई 2016 को कोलकाता में उनका देहावसान हो गया। पश्चिम बंगाल में उनकी राजनीतिक भूमिका को भी याद किया जाता है। 2006 और 2007 के समय जब ममता बनर्जी सिंगूर आंदोलन की लड़ाई लड़ रही थीं तब महाश्वेता देवी ने उनका समर्थन किया था। इसके बाद राज्य की मुख्यमंत्री बनने के बाद से लेकर देहावसान तक ममता बनर्जी ने उनका काफी सम्मान किया था।

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