गोपाल भार्गव : नेता प्रतिपक्ष की भूमिका में थोड़ा बदले हैं, थोड़े बदलाव की जरूरत है

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भाजपा ने जब पंडित गोपाल भार्गव को मप्र विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष चुना तो इसका पैमाना उनकी आठ बार की विधायकी और ब्राह्मण नेता होना ही नहीं था बल्कि उनकी दबंग और खरे बोल वाली राजनीतिक शैली भी थी। वे मन की राजनीति करते हैं और जो सोचते हैं सीधा बोलते हैं। भाजपा सरकारों में विपक्ष के हमलों को धराशायी करने वाले चुनिंदा मंत्रियों में से एक थे भार्गव। अब जबकि वे नेता प्रतिपक्ष हैं तो सदन और बाहर, सरकार के खिलाफ विपक्ष के हमलों के नेतृत्वकर्ता वे ही होंगे। अपनी इस भूमिका के मुताबिक भार्गव ने स्वयं में कुछ परिवर्तन किए हैं। कुछ और बदलावों की आवश्यकता जताई जा रही है। ऐसा होने पर न केवल मप्र बल्कि भाजपा की राजनीति में कुछ खास बदलाव दिखाई देंगे।
बुंदेलखंड के नेता भार्गव बुंदेलखंड की खड़ी शैली में ही राजनीति करते हैं। सीधे शब्दों में कहना, बोल में रियायत न बरतना और जो सोच लिया वह कर जाना उनकी फितरत कही जाती है। अपने बोलों से वे हमेशा सुर्खियों में रहते आए हैं। विधानसभा में 1991 की घटना के बाद से व्यवहार को लेकर कांग्रेस अब तक भार्गव को कठघरे में खड़ा करती है। भार्गव ने पार्टी के अंदर और बाहर अपने कई प्रतिद्वंद्वी बनाए और उनसे बराबर लोहा लिया। अपने क्षेत्र में पकड़ और जीवंत संपर्क के कारण राजनीतिक रूप से उनका नुकसान नहीं किया जा सका। वे उन गिने-चुने मंत्रियों में से रहे हैं जिनके बंगले पर समर्थकों की भीड़ लगी रहती थी। उनके स्वभाव के ये सब पहलू मिल कर उनकी ताकत बने।
नेता प्रतिपक्ष के रूप में उनकी पहली परीक्षा विधानसभा का बीता सत्र था मगर उस दौरान पूरी ताकत से विरोध के बाद भी भार्गव का रंग कुछ फीका नजर आया। उस समय तक पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की छाया उन पर हावी रही। वहीं, नेता प्रतिपक्ष की दौड़ में रहे डॉ. नरोत्तम मिश्र भी लगभग निष्क्रिय ही रहे। तब नेता प्रतिपक्ष भार्गव अपनी पूरी रंगत में दिखाई नहीं दिए थे। इधर, सदन के बाहर भी, पूर्व मुख्यमंत्री होने के कारण शिवराज ही पार्टी में हावी रहे। अब भार्गव के सामने चुनौती है कि वे अगले हफ्ते आरंभ हो रहे विधानसभा के बजट सत्र में अपनी शख्सियत के साथ मौजूदगी दिखाएं और पार्टी में मुख्यमंत्री,प्रदेश अध्यक्ष व संगठन महामंत्री वाले निर्णायक त्रिकोण की जगह नेता प्रतिपक्ष, प्रदेश अध्यक्ष और संगठन महामंत्री की त्रयी को स्थापित करें।
इन दोनों ही मोर्चों पर भार्गव ने कुछ काम शुरू किया हैं। एक तरफ, सरकार के खिलाफ नियमित बयान जारी कर उन्होंने अपनी सक्रियता को बढ़ाया है तो पार्टी के नियमित कामकाज में अपनी जगह बनाने की कोशिश भी की है। पूर्व मुख्यमंत्री चौहान ने जब कहा कि ‘वो जहां भी जाते हैं उनका हीरो जैसा स्वागत होता है, जनता कांग्रेस को वोट देकर पछता रही है।’ तो नेता प्रतिपक्ष भार्गव ने उन्हें इस तरह के बयानों से बचने की सलाह दी। भार्गव ने कहा कि जनता को तय करने दें कि हीरो कौन है।
मप्र भाजपा में भार्गव के लिए नई संभावनाएं देखी जा रही हैं। उन्होंने जिस शिद्दत से अपने क्षेत्र के लोगों से जमीनी संपर्क साध रखा है अब उसी हुनर से भाजपा विधायकों और जिलों के कार्यकर्ताओं से भी मुलाकातें करनी होंगी। ऐसा करने पर मिला मैदानी फीडबैक उन्हें सरकार को घेरने के लिए अधिक प्रामाणिक ताकत और राजनीतिक ऊर्जा देगा। राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाए जाने के बाद पूर्व मुख्यमंत्री चौहान की व्यस्त‍ताएं राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ गई हैं। अपनी सक्रियता बढ़ा कर भार्गव संगठन में रिक्त हुए उनके स्थान को भी भर पाएंगे।

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