21 वीं सदी के अंत तक पिघल जाएंगे हिमालय और हिन्दुकुश के एक तिहाई ग्लेशियर

काठमांडू, (हि.स.)। इस सदी के अंत तक हिमालय और हिन्दुकुश के कम से कम एक तिहाई ग्लेशियर पिघल जाएंगे। यह खुलासा एक अध्ययन से हुआ है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौता अनुपालन नहीं किया गया तो इस सदी के अंत तक हिमालय और हिंदुकुश की दो तिहाई ग्लेशियर पिघल जाएंगे।

बर्फ पिघलने की वजह से गंगा, सिंधु, ब्रह्मपुत्र, कोशी और बागमती, रावी, सतलज जैसी हिमालयी नदियों की दिशा या बहाव बदल सकता है। इससे चीन और भारत में फसलों के उत्पादन पर भी असर पड़ेगा। विदित हो कि हिंदुकुश में काफी ऊंचे-ऊंचे ग्लेशियर हैं जिसकी वजह से इसे आर्कटिक और अंटार्कटिक के बाद दुनिया का तीसरा ध्रुव कहा जाता है। अध्ययन की अगुवाई करने वाले फिलिप वेस्टर ने कहा कि यह ऐसी ‘ जलवायु समस्या ’होगी जिसके बारे में आप सोच भी नहीं सकते हैं।’ इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलेपमेंट (आईसीआईएमओडी) के उपमहानिदेशक एकलव्य शर्मा ने कहा कि साल 1970 से लेकर अब तक पूरी दुनिया में ग्लेशियर लगातार पिघल रहे हैं।

अगर पूरे हिंदुकुश की बर्फ पिघल जाएगी तो समुद्र का स्तर करीब डेढ़ मीटर बढ़ जाएगा। उल्लेखनीय है कि हिंदुकुश अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, चीन, भारत, नेपाल और पाकिस्तान में करीब 3500 किलोमीटर में फैला हुआ है। अध्ययन के मुताबिक, बर्फ पिघलने से यांगत्जे, मीकांग, सिंधु और गंगा के प्रवाह पर असर पड़ेगा। इन नदियों पर बड़ी संख्या में किसान निर्भर करते हैं। इसके अलावा करीब 25 करोड़ लोग पर्वतों में और 165 करोड़ लोग इन नदी की घाटियों में रहते हैं जिनके जीवन पर असर पड़ेगा।

हालांकि लंदन के एक वैज्ञानिक वूटर ब्यूटार्ट का कहना है कि इस मामले में अभी और ज्यादा शोध की ज़रूरत है, क्योंकि ग्लेशियर पिघलने के बाद नदियों में और भी जगहों से पानी मिल जाता है जो ग्लेशियर से निकले हुए पानी के असर को कम कर देता है। आईसीआईएमओडी के बोर्ड के सदस्य दाशो रिनजिन का कहना है कि ग्लेशियर के पिघलने से सिर्फ द्वीपों पर रहने वाले लोगों का ही जीवन प्रभावित नहीं होगा, बल्कि पहाड़ों पर रह रहें लोगों के जीवन पर भी असर पड़ेगा। 

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