खेतड़ी के अजीत विवेक संग्रहालय का रविवार को होगा लोकार्पण

झुंझुनू, (एजेंसी.)। इतिहास पुरूष स्वामी विवेकानंद की यादें खेतड़ी के रग-रग में बसी हुई है। खेतड़ी से स्वामी जी का अजीत विवेक प्रेम एक महत्वपूर्ण उदाहरण था। उन्हीं यादों का ताजा करने के लिए अजीत विवेक संग्रहालय का निर्माण किया है, जिससे अब खेतड़ी के स्वर्णिम दिन आने की उमीद पूरी हो रही है। संग्रहालय का रविवार को लोकार्पण होगा। खेतड़ी में देश का ऐसा संग्रहालय बनाया गया है, जहां पूरे देश के लोग खेतड़ी में आकर राजा अजीत ओर विवेकांनद की दोस्ती की मिसाल को देख सकेंगे। खेतड़ी में देश का तीसरा सबसे बड़ा संग्रहालय बनाया गया है। संग्रहालय में विश्व स्तर की नामचीन चीजों का उपयोग किया है, जो देखने लायक होंगी। संग्रहालय को बनाने के लिए बेहतरीन कारीगरों द्वारा राजा अजीतसिंह ओर स्वामी विवेकानंद की जीवंत कहानियों के स्वरूप का उल्लेख किया गया है।

संग्रहालय में आने वाला हर व्यक्ति इसे देख कर अभीभूत हो जाएगा। स्वामी विवेकानंद का विश्व में पहचाने दिलाने में खेतड़ी की अहम भूमिका रही है। यहां राजा अजीतसिंह ने स्वामी विवेकानंद को इस जगह पर पहुंचाने का काम किया है। खेतड़ी से रामकृष्ण मिशन की शुरूआत कर इसे पूरे विश्व में विख्यात कर दिया। खेतड़ी नरेश अजीतसिंह स्वामी विवेकानंद का सानिध्य पाने वाले राज्य के पहले व्यक्ति थे। शिकागो (अमेरिका) के सर्वधर्म सम्मेलन ने उन्हें विश्वविख्यात कर दिया था। उनकी अमेरिका की यात्रा की व्यवस्था राजा अजीतसिंह की तरफ से की गई थी। रामकृष्ण मिशन के जरिए शिक्षा व समाजसेवा की शुरूआत स्वामी जी ने खेतड़ी से ही की थी। यहां तक स्वामी जी की पोषाक भी खेतड़ी में ही तैयार हुई थी।

राजस्थान में झुंझुनू जिले का खेतड़ी कस्बा स्वामी विवेकानंद के रिश्तों के कारण अपनी अलग पहचान बनाए हुए है। खेतड़ी नरेश अजीतसिंह चार जून 1891 में पहली बार स्वामी विवेकानंद से आबू में मिले थे। उस समय राजपूताना में अंग्रेजी गर्वनर जनरल शासन का ऑफिस आबू में था। 25 जुलाई 1891 को स्वामी जी राजा अजीतसिंह के साथ आबू से जयपुर पहुंचे और वहां से तीन अगस्त को रवाना होकर चार अगस्त को खेतड़ी रियासत के कोटपूतली पहुंचे। सात अगस्त 1891 को सुबह उस महान विभूति ने पहली बार खेतड़ी की पावन भूमि पर अपने कदम रखे थे। यही पर राजा अजीतसिंह ने स्वामी जी से भौतिक, रसायन एवं ज्योतिष शास्त्र की विद्या ग्रहण की। राज पंडित स्वामी नारायण दास शास्त्री की पुस्तक ‘पूर्व व्याकरण’ से प्रभावित होकर स्वामी जी ने अष्ठधायी एवं महाभाष्य ग्रंथों का अध्ययन किया। अजीतसिंह ने स्वामी जी की सहमति से प्रथम प्रयोगशाला की स्थापना की।

स्वामी जी जिस नाम की बदौलत से पूरे विश्व में जाने जाते है। वह भी खेतड़ी नरेश अजीतसिंह की देन है। स्वामी जी आरंभ में अपना नाम विविदिषानंद, जिसका अर्थ जानने का इच्छुक होता है, लिखा करते थे। जब स्वामी जी पहली बार खेतड़ी तो राजा अजीतसिंह ने मुस्कराते हुए कहा कि महाराज आपका नाम बड़ा कठिन है तथा इसका उच्चारण करना सहज नहीं है। स्वामीजी ने अजीतसिंह से पूछा कि आप किस नाम को पसंद करते है। इस पर अजीतसिंह ने कहा कि उनकी राय से आपका नाम विवेकानंद होना चाहिए। उस दिन से स्वामी जी ने अपना नाम विवेकानंद रख लिया। स्वामी जी ने इसी दौरान खेतड़ी में ही मोह-माया, ऊंच-नीच का त्याग किया।

खेतड़ी में राजा अजीतसिंह व स्वामी विवेकानंद की याद में बनाया गया अजीत विवेक संगहालय अत्याधुनिक सेवाओं से लैस किया गया है। खेतड़ी नरेश राजा अजीतसिंह से जुड़ी यादों व स्वामी विवेकानंद के जीवन परिचय की कहानियों को लेकर संग्रहालय बनाया गया है। संग्रहालय के लिए ऑनलाइन टिकट बुक की जा सकती है। लिफ्ट की व्यवस्था, स्पेशल गेजेटस के माध्यम से हैडफोन लगाकर पूरी जानकारी उपलब्ध करवाई जाएगी। मुख्य आकर्षण में शेखावाटी आर्ट के भिति चित्र, ज्ञान का कुआं, स्वामी विवेकानंद का ध्यान केंद्र स्थल, स्मृति मंदिर आदि का दीदार करवाया जाएगा। मुख्य द्वारा पर सिद्धी विनायक गणेश सभी को आर्शीवादित कर रहे है। संग्रहालय में प्रवेश में स्वामी विवेकानंद जी की बड़ी प्रतिमा यहां आने वाले हर व्यक्ति का ध्यान आकर्षित करती है। हिस

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