अगर बेरोजगारी मुद्दा है तो यह राजनीतिक सभाओं में दिखता क्‍यों नहीं है?

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क्रिकेटर युवराजसिंह ने कैंसर का इलाज विदेश में करवाया। अभिनेता इरफान खान बीमार हुए तो विदेश गए। मनीषा कोईराला, सोनिया गांधी, केंद्रीय मंत्री अनंत कुमार और मनोहर पर्रिकर ने भी विदेश में इलाज करवाया। वित्‍तमंत्री अरुण जेटली ने भी उपचार के लिए भारत के बाहर जाना ही उचित समझा। ये लोग इलाज करवाने विदेश क्यों गए? अगर हम लोगों को ऐसी बीमारी हो गयी तो हमारा मरना तय है। दरअसल, अच्छे अस्पताल, स्कूल और वैज्ञानिक दृष्टिकोण की जरूरत आम आदमी को ज्यादा है। लेकिन जिन पर इनकी जिम्‍मेदारी है वे हमें मन्दिर मस्जिद में बाँटकर खुद इलाज करवाने विदेश चले जाते हैं। इस चुनाव में अपने लिए अच्छे और सस्ते अस्पताल, स्कूल, रोजगार के लिए वोट कीजिए।

मप्र में छह सीटों पर पहले चरण के लिए 29 अप्रैल को होने वाले मतदान के पहले यह मैसेज सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। क्‍या 2019 के आम चुनाव में जनता के मुद्दे चुनावी मुद्दे बन पाए हैं? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में अच्छे दिन और दो करोड़ लोगों को रोजगार का वादा किया था। अब एक बार यही रोजगार जनता का सबसे बड़ा मुद्दा कहा जा रहा है, तो क्‍या यह चुनावी मुद्दा बन रहा है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्म (एडीआर) ने अपने सर्वे में कहा कि सबसे बड़ा मुद्दा बेरोजगारी है। 46 फीसदी लोगों ने चुनावी मुद्दे में रोजगार को पहली प्राथमिकता दी है। जनता की प्राथमिकता में बेहतर अस्पताल, साफ पानी, अच्छी सड़क, बेहतर पब्लिक ट्रांसपोर्ट पहले है।

हमारी बातों में प्रमुख रूप से उजागर हो रहे ये मुद्दे क्‍यों मैदान में दिखाई नहीं दे रहे? यदि ये मुद्दे मैदान में असर दिखा रहे हैं तो क्‍यों राजनीतिक मंचों से इन मुद्दों पर आवाज सुनाई नहीं दे रही है? प्रदेश में सबसे बड़ा वोट बैंक युवा ही हैं। मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी कार्यालय के हिसाब से 18 से 29 साल के मतदाताओं की संख्या डेढ़ करोड़ से ज्यादा है। ये निर्णायक वोटर जिधर भी रुख करेंगे, विजय का सेहरा उस पार्टी के उम्मीदवार के सिर बंध जाएगा। मप्र में नेताओं की सभाओं में वे ही मुद्दे सुनाई दे रहे हैं जो पार्टियों ने एक-दूसरे पर आरोप की शक्‍ल में लगाए हैं। नामदार और कामदार की बहस अलग-अलग चेहरे के साथ सामने आई है। किसान कर्ज माफी पर भाजपा प्रदेश में कांग्रेस सरकार को घेर रही है तो कांग्रेस इसे भाजपा का झूठ बता रही है। भाजपा राज्‍य में 15 सालों के अपने शासन की बात कम ही कर रही है। वह मोदी के चेहरे पर निर्भर है।

शहरी और ग्रामीण बेरोजगारी को लेकर कांग्रेस और भाजपा के अपने-अपने दावे भी हैं। कांग्रेस ने प्रदेश की सत्ता में आते ही बेरोजगारों को साधने के लिए युवा स्वाभिमान योजना के साथ उद्योगों में 70 फीसदी स्थानीय लोगों को रोजगार देने का नियम लागू करने की बात कही है। उधर, भाजपा अपने शासनकाल की मुख्यमंत्री के नाम से शुरू की गई रोजगारमूलक योजनाओं को उपलब्धि बताकर वोट मांग रही है। साथ ही भाजपा नेता यह दावा भी कर रहे कि केंद्र सरकार ने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर देश में दस करोड़ रोजगार के मौके पैदा किए हैं। लेकिन ये बातें कुल चुनाव प्रचार के बहुत कम हिस्‍से में हैं।

दोनों दल इस बात से मुंह पलट कर खड़े हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना के पिछड़ने की वजह से बेरोजगारी की समस्या खड़ी हो गई है। मालवा, निमाड़ से लेकर विंध्य क्षेत्र में बड़ी तादाद में मजदूर पलायन कर गए हैं। शहरी युवाओं के पास रोजगार नहीं है। अस्‍पतालों में उपचार नहीं है। प्रत्‍याशी मोदी और राहुल गांधी के भरोसे हैं। वे अपनी ओर से कोई योजना पेश नहीं कर रहे। ऐसे समय में मतदाताओं को क्‍या यह सुनिश्चित नहीं करना चाहिए कि उनके सांसद ‘मौन कठपुतली’साबित न हों? मतदान के पहले तो कम से कम यही विचार होना चाहिए।

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