खुद को बखानते मोदी: मीडिया और राजनीति की नई खिचड़ी

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बनारस के जिस ’अस्सी घाट’ पर गंगा की लहरों पर इठलाते हुए ’आज तक’ के तीन दिग्गज पत्रकारों ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का लंबा इंटरव्यू लिया, उस ’अस्सी’ की सांस्कृतिक और सामाजिक सच्चाइयों का अपना मिजाज है। हिंदी के जाने-माने हस्ताक्षर काशीनाथ सिंह का उपन्यास ’काशी का अस्सी’ पढ़ें तो पाएंगे कि इंटरव्यू का मिजाज बनारस की खरी, खिलंदड़ और खटाकेदार तासीर से मेल नहीं खाता है। काशीनाथ की नजर में उनका उपन्यास ’अस्सी’ कई वर्षों से भारतीय समाज में पक रही राजनीतिक-सांस्कृतिक खिचड़ी की पहचान के लिए चावल का एक दाना भर है, बस…। उसी प्रकार बनारस के दक्खिनी छोर पर गंगा किनारे बसे ऐतिहासिक मुहल्ले ’अस्सी’…’अस्सी चौराहे’ अस्सी घाट पर गंगा की लहरों पर इठलाते-इतराते नाव पर सवार मोदी के साथ तीन दिग्गज पत्रकारों का इंटरव्यू भी मीडिया और राजनीति की खिचड़ी का नमूना है। खिचड़ी का यह मिक्स लोकतंत्र की सेहत के लिए खरतनाक है।

फिल्म एक्टर अक्षय कुमार के इंटरव्यू के समान आजतक के इंटरव्यू में भक्ति-काल की भाव-व्यंजनाओं से भरपूर प्रश्‍नों की बहुलता है। आजतक के एपीसोड में प्रश्‍नों और पूरक-प्रश्‍नों का तानाबाना कुछ इस प्रकार बुना गया है कि नरेन्द्र मोदी  राजनीति के अनंत-धाम में ’अहं ब्रह्मास्मि’ की शक्ल में फलक पर उभरते हैं। लोकसभा चुनाव के मध्य-काल में प्रायोजित साक्षात्कारों की यह श्रृंखला राजनीति के कैनवास पर मोदी को उदात्त राजनेता, उदार महामना, उत्कट राष्ट्र-भक्त, उन्मुक्त मनस्वी, उद्भट तपस्वी जैसे गहन-गंभीर और करुणा से ओतप्रोत मानवीय रंगों से पेंट करने का प्रयास है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सारे साक्षात्कारों में सवालों की प्रतिध्वनि एक है कि उन जैसा दूजा कोई नहीं है।

अभी तक मोदी कई राजनीतिक अवतारों में सामने आ चुके हैं। उनके जीवन पर आधारित कॉमिक्स ’बाल-नरेन्द्र’ की कथाओं का यह नया विस्तार है। लगता है कि ’बाल-नरेन्द्र’ में मोदी का वामन-अवतार इन दिनों महाप्रभु का वृहताकार धारण करके सारी दुनिया को नापने निकल पड़ा है। ’आजतक’ यह एपीसोड बाल-नरेन्द्र की मगरमच्छ-कथा से आगे बचपन की अमराइयों को पार करता हुआ कबीर के फलसफाना अंदाज में जिंदगी के सफर पर आगे निकलने की कहानियां बयां करता है। ’अविश्‍वसनीय, लेकिन सच’ तर्ज पर इंटरव्यू बताता है कि मोदी ने पैंतीस साल तक भिक्षा मांग कर अपना पेट भरा?  गंगा किनारे उन्होंने काफी वक्त गुजारा और आध्यात्मिकता उनका बुनियादी चरित्र है। उनका अपना कुछ नहीं है, सब कुछ देश और समाज के लिए है। उनके इर्ग-गिर्द जमा विवादों का सबब मीडिया है, जो उनकी भावनाओं को समझने और समझाने मे असमर्थ रहा है।   

मोदी नई इमेज गढ़ने के लिए प्रयासरत हैं। वो करुणा, कठोरता, वीरता और विवेकशीलता के गुणों को एक साथ अपने व्यक्तित्व में टांकना चाहते हैं। फकीरी के मुखौटों में राजा बने रहना उनका अंतिम लक्ष्य है। इस इमेज को गढ़ने के लिए वो अभूतपूर्व प्रयास करते हैं। गंगा में नौका-विहार के साथ ’आजतक’ से साक्षात्कार इसका ताजा उदाहरण है। एक भव्य स्टीमर पर आसपास की नौकाओं में ’मोदी-मोदी’ के उद्घोष के बीच इंटरव्यू का आयोजन, औचित्य के सवाल खड़े करता है। इंटरव्यू की शूटिंग की कीमत का आकलन भी करना जरूरी है।

खुद के मानवीय-चेहरे को ’रि-इन्वेंट’ करना मोदी की राजनीतिक मजबूरी है। उनके साक्षात्कारों की स्क्रिप्ट का आधार भी यही होता है। उनके बारे में धारणा है कि वो आत्म-केन्द्रित निरंकुश नेता हैं। सहयोगी दल तो दूर, वो भाजपा के अपने नेताओं को ही घास डालना पसंद नहीं करते हैं। इस प्रवृत्ति के कारण साढ़े चार सालों में उनके कई सहयोगी दल उनसे छिटक चुके हैं। भाजपा में उनकी कार्य-शैली को लेकर एक दहशतजदा माहौल हमेशा देखने को मिलता रहा है। परेशानी का सबब यह है कि एक राजनीतिक-आकलन के अनुसार 2014 की मोदी-लहर के अभाव में भाजपा लोकसभा-2019 के चुनाव में अपने बलबूते पर शायद बहुमत हासिल नहीं कर पाएगी। मोदी के रणनीतिकारों की चिंता है कि स्पष्ट बहुमत के अभाव में मोदी गठबंधन सरकार में सर्वमान्य नेता के रूप में मान्य नहीं होंगे। सर्वमान्यता की कसौटियों पर नितिन गडकरी पहली पसंद के रूप में उभर रहे हैं। इस गुत्थी को सुलझाने के लिए मोदी कुटिलता की कठोर काली लकीरों के ऊपर एक उदारमना, विशाल ह्रदय, वैश्‍विक राजनेता का मुखौटा पहनना चाहते हैं। इसका उदाहरण ’आजतक’ के ताजा इंटरव्यू में कश्मीर-नीति पर उनका यू-टर्न है। अब वो कह रहे हैं कि कश्मीर-समस्या का निदान अटलजी के फार्मूले ’इंसानियत, कश्मीरियत और जम्हूरियत’ के आधार पर ही संभव है। उनके यू-टर्न के बाद कश्मीर में आतंक के नाम जो कहर बरपा है, उस पर क्या रोक लगेगी? 

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