निरंकुशता और निर्ममता का निवेश लोकतंत्र के लिए खतरा

0
166

देश इलेक्शन-मोड में है और देश के एक सौ तीस करोड़ नागरिक अपनी अंजुरी में मत-पत्रों के फूल-पत्तर लेकर लोकतंत्र के मंदिर में सत्रहवीं लोकसभा की घट-स्थापना के लिए कतारबध्द खड़े हैं। राजनीति के दबंग पंडे-पुजारियों ने लोकतंत्र के विचारशील महापंडितों को धकिया कर पूजा का आसन ग्रहण कर लिया है। इन दबंगों के गगनभेदी मंत्रोच्चार के बीच लोकतंत्र की खंड-विखंड प्रतिमा को नया चोला पहनाने की जुगत में सभी राजनेता बढ़-चढ़ कर बोली लगा रहे हैं। पांच वर्षों तक लोकतंत्र के मंदिर के महाव्दार पर बैठे गरीबों की खाली कटोरी में आश्‍वासनों के खोटे सिक्के खनकने लगे हैं। समस्याओं के मटमैले पहाड़ों के पथरीले सुराखों में सूखे दरख्तों के बीच रोजी-रोटी बीनती जनता एकाएक महत्वपूर्ण हो चली है।
सत्ता की खातिर लोकतंत्र का मोलभाव जारी है। सुविधाओं के राजनीतिक भंडारे और लंगरों की पांत में परोसकारी के लिए मौजूद यजमानों की भरमार भ्रमित कर रही है कि अब इस देश में कोई भूखा नहीं रहेगा, कोई नंगा नहीं रहेगा, कोई बेरोजगार नहीं होगा…। पांच साल से दर्द से कसमसाती जनता के घावों पर मरहम लगाने का नाटकीय अंदाज निराला है।
देश अभी तक सोलह लोकसभा चुनाव देख चुका है और हर चुनाव में लोकतंत्र का मोल अलग होता है। लेकिन इस मर्तबा भारतीय लोकतंत्र के सत्रहवें लोकसभा चुनाव के नजारे कुछ अलग नजर आ रहे हैं। देश के अंधेरे कोनों में समस्याओं से तरबतर सौ करोड़ मुफलिसों के चेहरे पर खिंची गरीबी की रेखाओं को सुर्ख-रू बनाने वाली कवायदों का मैकेनिज्म बदल सा गया है। राजनीतिक दलों के बीच सत्ता के मोल-भाव में हिंदुत्व के नाम पर निरंकुशता और निर्ममता का पूंजी-निवेश लोकतंत्र की मर्यादाओं का चीर-हरण करता प्रतीत हो रहा है। लोकतंत्र में चुनाव की अपनी अहमियत होती है। चुनाव राजनीति और जनता के रिश्तों को नए अंदाज में ढालते हैं। राजनीतिक दलों और नेताओं को मजबूर करते हैं कि वो खुद को खंगालें, तलाशें और खुद को नया आकार दें।
जनतंत्र में हर चुनाव किसी भी राजनीतिक दल और राज-नेताओं के लिए आत्मावलोकन के साथ-साथ आत्म-अन्वेषण का अवसर भी होता है। चुनाव में नई प्रतिबद्धताओं के साथ राजनीतिक-विचारक विकास की बुनियाद को मजबूत करने के रास्ते तलाशते हैं, ताकि गरीब की सूखी रोटी कुछ नरम और पौष्टिक हो सके। अभी तक देश की जनता ने अलग-अलग परिस्थितियों में बड़ी समझदारी और सूझबूझ के साथ चुनाव में हिस्सेदारी की है। साठ के दशक में युद्ध की विपरीत परिस्थितियों में भी जनता के फैसले देश के अनुकूल रहे और आपातकाल के धुंआते राजनीतिक परिदृश्य में भी लोकतंत्र के सितारों को गर्दिश में भटकने नहीं दिया।
पिछले सोलह चुनाव के अनुभव कहते हैं कि हर चुनाव के बाद देश ने नई उम्मीदों के साथ आगे बढ़ने के जतन किए, नई सुर्खियां हासिल करने के लिए कदम बढ़ाए। हर मर्तबा राजनीति की पुनर्रचना ने देश को नई दिशा की ओर बढ़ने के लिए उत्प्रेरित किया। लेकिन सत्रहवीं लोकसभा के गठन की पूर्व-बेला में राजनीतिक परिदृश्य पर जो धुंआ उठ रहा है, वह आने वाले समय में देश की लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के लिए शुभ-संकेत नहीं है। विभाजनकारी प्रवृत्तियों के कारण पहली मर्तबा देश अराजकता के कगार पर खड़ा है। सकारात्मक और विकासशील राजनीति के तंतु कमजोर पड़ते जा रहे हैं। पिछले पचास-साठ सालों में देश इतना बिखरा-बिखरा महसूस नहीं हुआ, जितना इस वक्त हो रहा है।
अंग्रेजों की तर्ज पर देशी नेताओं ने ’बांटो और राज करो’ का जो सिलसिला 60-70 में शुरू किया था, वह अपने चरम पर है। परिस्थितियां विकराल हैं, क्योंकि खुद सत्तारूढ़ भाजपा विभाजनकारी प्रवृत्तियों पर सवार होकर सिंहासन हासिल करना चाहती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सत्ता में बीते पांच सालों में लोकतंत्र के मामले में हमारा देश 48 प्रतिशत नीचे गिरा है। ब्रिटेन स्थित इकोनॉमिस्ट ग्रुप के डेमोक्रेसी इंडेक्स 2018 की रिपोर्ट के अनुसार भारत विश्‍व स्तर की सूची में लोकतंत्र की 41वीं पायदान पर है, जबकि 2014 में 27वीं और 2017 में 32वीं पायदान पर था। रिपोर्ट के अनुसार मोदी-सरकार के कार्यकाल में देश के लोकतांत्रिक ढांचे में जबरदस्त अवमूल्यन हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत में संकीर्ण धार्मिक विचार-धारा के बढ़ते प्रभाव के कारण लिंचिंग की घटनाएं बढ़ गई हैं। प्रेस की स्वतंत्रता पर भी नित आघात हो रहे हैं। संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता और स्वतंत्रता भी विवादास्पद हो चुकी है। प्रधानमंत्री मोदी चुनाव के बाजार में राष्ट्रवाद के निवेश और आतंकवाद के भयदोहन के जरिए लोकतांत्रिक शासन-प्रणाली को निरंकुश सत्ता में बदलना चाहते हैं।

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY